भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१३७८ भैषज्यरत्नावली । [ वीर्यस्तम्भना-
स्त्रीणां शतं गच्छति चातिरेकं न याति तृप्तिं सरसः समाङ्गः ।
अपुत्रिणीं पुत्रशतं करोति गतायुषं कामसमं बलिष्ठम् ॥ २१ ॥
महद्घृतं नाम तु छागलाद्यं विनिर्मितं वातनिषूदनं च ।
शिवं शुभं रोगभयापहं च चकार हारीतमुनिर्विशिष्टः ॥ ३२२ ॥
यह उत्तम रसायन-जठराग्नि, इन्द्रके समान बल, वीर्य और तेज देकर दीर्घायु-वाले पुत्रोंकी वृद्धि करता है । एवं वन्ध्यास्त्रियोंको शतशः पुत्रवती, वृद्धोंको बलिष्ठ और कामदेवके समान सुन्दरबनाता है । इस बृहच्छागलाद्यघृतको हारीतमुनिने बनाया है ॥ ३२०-३२२॥
भल्लातकाद्यतैल ।
भल्लातकबृहतीफलदाडिमफलवल्कलसाधितं कुरुते ।
लिङ्गं मर्दनविधिना कटुतैलं वाजिलिङ्गाभम् ॥ ३२३ ॥
भिलावे, बड़ी कटेरीके फल और अनारके छिल्के इनके कल्कद्वारा एक सेर सरसोंके तेलको विधिपूर्वक पकाकर लिङ्गपर मालिश करे तो लिङ्ग घोड़ेके लिङ्गके समान होता है ॥ ३२३ ॥
अश्वगन्धातैल ।
अश्वगन्धा वरीकुष्ठं मांसी सिंहीफलान्वितम् ।
चतुर्गुणेन दुग्धेन तिलतैलं विपाचयेत् ।
स्तनलिङ्गकर्णपालिवर्द्धनं म्रक्षणादिदम् ॥ ३२४ ॥
असगन्ध, शतावर, कूठ, बालछड और बडी कटेरीके फल इनके समान भाग मिश्रित कल्कके साथ और चौगुने दूधके साथ १ सेर तिलके तेलको यथाविधि पकावे । इस तेलकी मालिश करनेसे स्तन, लिङ्ग, कानकी पालिकी वृद्धि होती है ॥ ३२४ ॥
इति भैषज्यरत्नावल्यां वाजीकरणाधिकारः ॥
वीर्यस्तम्भनाधिकारः ।
शूरणं तुलसीमूलं ताम्बूलैः सह भक्षयेत् ।
न मुञ्चति नरो वीर्यमेकैकेन न संशयः ॥ १ ॥
जिमीकन्द अथवा तुलसीकी जडके चूर्णको पानमें रखकर खानेसे मैथुन करते समय सहसा मनुष्यका वीर्य स्खलित नहीं होता ॥ १ ॥