भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ऽ धकारः ] | भाषाटीकासहिता । | १३७९ |
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कृष्णमार्जारसव्यांघ्रिसम्भवास्थि रतोद्यमे ।
दक्षिणे ध्रियते येन तस्य वीर्यस्य न च्युतिः ॥ २ ॥
काली बिल्लीके बाँये पैरकी हड्डीको दइने अङ्गमें धारण करके स्त्रीप्रसङ्ग करे तो उस समय उस मनुष्यका वीर्य तत्काल स्खलन नहीं होता है ॥ २ ॥
चटकाण्डं तु संगृह्य नवनीतेन पेषयेत् ।
तेन लेपयतः पादौ शुक्रस्तम्भः प्रजायते ॥
यावन्न स्पृशते भूमिं तावद्वीर्यं न मुञ्चति ॥ ३ ॥
चिड़ियाके अण्डोंको नैनीघीके साथ पीसकर दोनों पावोंपर लेप करनेसे वीर्य-स्तम्भ होता है। और स्त्रीप्रसङ्ग करते समय जबतक मनुष्य भूमिका स्पर्श नहीं करता तबतक उसका वीर्य क्षरण नहीं होता ॥ ३ ॥
नीलोत्पलसितपङ्कजकेशरमधुशर्करावलिप्तेन ।
सुरते सुचिरं रमते दृढलिङ्गो नाभिविवरेण ॥ ४ ॥
नीलकमल, सफेद कमलकी केशर, शहद और मिश्री इन सबको एकत्र पीसकर नाभिके ऊपर लेप करके बहुत कालतक स्त्रीप्रसंग करनेपर भी वीर्य स्खलित नहीं होता और लिंग अत्यन्त दृढ होता है ॥ ४ ॥
सिद्धं कुसुम्भतैलं भूमिलताचूर्णमिश्रितं कुरुते ।
चरणाभ्यङ्गेन रतौ वीर्यस्तम्भाद्दृढं लिङ्गम् ॥ ५ ॥
कसुमके फूलोंके तेलको केंचुएके चूर्णके साथ मिलाकर सिद्ध करे उस तेलको चरणोंमें मालिश करके मैथुन करनेपर वीर्यस्तम्भ और लिंग दृढ होता है ॥ ५ ॥
गोरेकोन्नतशृङ्गत्वग्भवचूर्णेन धूपितं वस्त्रम् ।
परिधाय भजति ललनां नैकाण्डो भवति हर्षार्त्तः ॥ ६ ॥
गौके सींगके ऊपरकी छालको उतारकर चूर्णकर अग्निमें दग्धकरे । उसमेंसे जो धुआँ निकले उससे वस्त्रको धूपितकर शरीरपर धारण करे फिर आनन्दसे स्त्रीप्रसङ्ग करे तो वीर्यस्तम्भ होता है ॥ ६ ॥
उन्मुखगोशृङ्गोद्भवलेपो योगजध्वजभङ्गहरः ॥ ७ ॥
गौके उन्नत सींगके चूर्णको लेपकरनेसे योगजध्वजभङ्ग नष्ट होता है ॥ ७ ॥