भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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३१०भैषज्यरत्नावली ।[ ग्रहणी-

फिर तोतेकी पूँछके समान या नवनीतके समान कान्तिवाला, कोमल कठिन और स्निग्ध ऐसा गन्धक श्रेष्ठ होता है । ऐसे गन्धकको ८ तोले लेकर उसके चावलोंके समान छोटे-छोटे टुकड़े करके पत्थरके पात्रम भाँगरेके रसकी ७ बार भावना देवे और ७ बार धूपमें सुखावे, फिर धूलिकी समान बारीक चूर्ण करके उसको लोहेकी करछीमें रखकर धुएँरहित बेरीके अंगारोंपर पकावे । यह तेलकी समान पिघला होजाय तब भाँगरेके रसमें डाल देवे । उसमें डालतेही गन्धक सख्त होजाता है । उसको निकालकर और धूपमें सुखाकर केतकीके फूलोंकी रजकी समान चूर्ण करलेवे ॥ ४-८ ॥

शुद्धे सूते शोधितगन्धकचूर्णेन तुल्यता कार्या ।
तावन्मर्दनमनयोर्यावन्न कणोऽपि दृश्यते सूते ॥ ९ ॥
पश्चात् कज्जलसदृश चूर्णं लौहीस्थितं प्रयत्नेन ।
निर्धूमबदरकाष्ठाङ्गारे न्यस्तं विलाप्य तैलसमम् ॥ १० ॥
सद्यो गोमयनिहिते कदलदले चालयेन्मृदुनि ।
लौहीस्थितमवशिष्टं कठिनं तन्न ग्रहीतव्यम् ॥
पश्चात् पर्पटरूपा पर्पटिका कीर्त्यते लोकैः ॥ ११ ॥

इस प्रकार शोधित पारे और गन्धकको समान भाग लेकर कज्जली करे, दोनों को तबतक मर्दन करे—जबतक पारेके सूक्ष्म कण दीखने बन्द होजाय. जब घुटते २ सब चूर्ण कजलकी समान कृष्णवर्ण होजाय तब उसको लोहेकी करछीमें रखकर धुएँरहित बेरकि लकडीके अंगारोंपर तेलकी समान पतला करके गोबरके ऊपर एक केलेके कोमल पत्तेको रखकर उसमें उक्त पिघलीहुई कज्जलीको ढालदेवे और तत्कालही दूसरे केलेके पत्तेसे ढककर उसपर गोबर रखकर किसी कपडे की पोटलीसे उसे दाब देवे, जिससे कि वह रस पर्पटीके आकारमें होजाय और जो करछीमें पिघली हुई कज्जलीका कठिन अंश शेष रहजाय उसको ग्रहण नहीं करना चाहिये । इस प्रकार यह रसपर्पटी सिद्ध होती है ॥ ९-११ ॥

मयूरचन्द्रकाकारं लिङ्गं यत्र तु दृश्यते ।
तत्र सिद्धं विजानीयाद्वैद्यो नैवात्र संशयः ॥ १२ ॥

पर्पटीकी परीक्षा यह है—कि, जो पर्पटी मोरकी पूँछकी चन्द्रिकाके समान कान्ति हो वह पर्पटी उत्तम प्रकारसे सिद्ध हुई जाननी चाहिये ॥ १२ ॥