भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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पृष्ठ 354
३२२भैषज्यरत्नावली ।[ ग्रहणी-

पंक्तिशूलमम्लपित्तं वातरक्तं वमिं भ्रमिम् ।
अष्टादशविधं कुष्ठं प्रमेहान् विषमज्वरान् ॥
चतुर्विधमजीर्णं च मन्दाग्नित्वमरोचकम् ॥ ८५ ॥
जीर्णोऽपि पर्पटीमश्नन् वपुषा निर्मलः सुधीः ।
जीवेद् वर्षशतं श्रीमान् वलीपलितवर्जितः ॥ ८६ ॥
जराव्याधिसमाकीर्णं विश्वं दृष्ट्वा पुरा हरः ।
चकार पर्पटीमेतां यथा नारायणः सुधाम् ॥ ८७ ॥

शुद्ध पारा, हीरा, सुवर्ण, चाँदी, मोती, ताँबा और अभ्रक प्रत्येककी भस्म एक एक तोला एवं शुद्ध गन्धक सबको बराबर अर्थात् ७ तोले लेवे। सबको एकत्र मर्दन करके कज्जली बनालेवे। फिर उसको पिघलाकर रसपर्पटीकी विधिके अनुसार पर्पटी तैयार कर लेवे। यह पर्पटी भी पूर्वोक्त पर्पटीकी समान संग्रहणी आदि समस्त रोगोंको दूर करती है। एवं इसके अन्यान्य गुण पथ्यापथ्य और नियमादि पूर्वोक्त विजयपर्पटीके समानही जानने चाहिये। यह तन्त्रान्तरोक्त विजय पर्पटी है ॥ ८२–८७ ॥

हिरण्यगर्भपोट्टली रस ।

एकांशो रसराजस्य ग्राह्यौ द्वौ हाटकस्य च ।
मुक्ताफलस्य चत्वारो भागाः षड्दीर्घनिःस्वनात् ॥ ८८ ॥
त्र्यंशं बलेर्वराट्याश्च टङ्कणो रसपादिकः ।
पक्वनिम्बुकतोयेन सर्वमेकत्र मर्दयेत् ॥ ८९ ॥
मूषामध्ये न्यसेत् कल्कं तस्य वक्त्रं निरोधयेत्।
गर्त्तेऽरत्निप्रमाणे तु पुटेत् त्रिंशद्धनोपलः ॥ ९० ॥
स्वाङ्गशीतलतां ज्ञात्वा रसं मूषोदरात्नयेत् ।
ततः खल्लोदरे मर्चं सुधारूपं समुद्धरेत् ॥ ९१ ॥

शुद्ध पारा १ भाग, सुवर्णभस्म २ भाग, मोतीकी भस्म ४ भाग, काँसेकी भस्म ६ भाग, शुद्ध गन्धक ३ भाग, कौडीकी भस्म ३ भाग और सुहागा ३ मासे इन सबको एकत्रित करके पकेहुए नींबूके रसमें खरल करे। फिर औषधिको मूषायंत्रमें रखकर उसके मुँहको बन्दकरके एक बालिश्त गहरे गड्ढेमें रखकर तीस आरने उपलोंकी अग्नि देवे। जब पककर स्वांगशीतल होजाय तब औषधिको मूषायन्त्रमेंसे निकालकर उत्तम प्रकारसे खरल करलेवे ॥ ८८–९१ ॥