भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
पृष्ठ 901, कुल 1416 में से
संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ८६९
यह रस साध्य व असाध्य २० प्रकारके प्रमेह, मूत्रकृच्छ्र, पाण्डु, धातुगत ज्वर, हलीमक, रक्तपित्त, वात-पित्त और कफके रोग, संग्रहणी, आमवात, अग्निमान्य और अरुचि आदि सम्पूर्ण विकारोंको शीघ्र दूर करता है ॥ ८६-८८ ॥
सूतं गन्धं मृतं लोहं मृतमभ्रं समांशिकम् ।
हेम वङ्गं च मुक्ता च ताप्यमेषां समं समम् ॥ ८९ ॥
सर्वेषां चूर्णितं कृत्वा कन्यारसविमर्दितम् ।
गुञ्जाद्वयप्रमाणेन वटिकां कुरु यत्नतः ॥ ९० ॥
२-शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, लोहा, अभ्रक, सुवर्ण, वङ्ग, मोती और सोनामाखी इन सबकी भस्म समान भाग लेकर एकत्र पीसकर घीग्वारके स्वरसमें यथाविधि खरल करे । तदनन्तर दो रत्ती प्रमाण गोलियाँ बनालेवे ॥ ८९ ॥ ९० ॥
बृहद्वङ्गेश्वरो ह्येष रक्तमूत्रे प्रशस्यते ।
बहुमूत्रं श्वेतमूत्रं मूत्रकृच्छ्रं तथैव च ॥ ९१ ॥
सर्वविधप्रमेहांस्तु नाशयेदविकल्पतः ।
अग्निवृद्धिं वयोवृद्धिं कान्तिवृद्धिं करोति च ॥ ९२ ॥
क्षयरोगं निहन्त्याशु कासं पञ्चविधं तथा ।
कुष्ठमष्टादशविधं पाण्डुरोगं हलीमकम् ॥ ९३ ॥
शूलं श्वासं ज्वरं हिक्कां मन्द मित्वमरोचकम् ।
क्रमेण शीलितो हन्ति वृक्षमिन्र्दाशनिर्यथा ॥ ९४ ॥
यह बृहद्वङ्गेश्वरनामक रस रक्तगतमूत्रमें प्रयोग करनेसे विशेष लाभ होता है । एवं बहुमूत्रादि उपर्युक्तलिखितसर्वप्रकारकेमूत्रविकार तथा अन्यान्य रोगोंको ऐसे नष्ट करता है जैसे कि इन्द्रका वज्र वृक्षोंके समूहको नष्ट करदेता है । इससे अग्निकी वृद्धि, आयुकी वृद्धि और शरीरमें कान्ति उत्पन्न होती ॥ ९१-९४ ॥
हरिशङ्कररस ।
मृतं सूताभ्रकं तुल्यं धात्रीफलनिजद्रवैः ।
सप्ताहं भावयेत्खल्ले योगोऽयं हरिशङ्करः ॥
माषमात्रां वटीं खादेत्सर्वमेहप्रशान्तये ॥ ९५ ॥
रससिन्दूर और अभ्रकभस्म इन दोनोंको आमलोंके रसमें सातदिनतकै भावना (खरल) देकर एकएक माशे की गोलियाँ निर्माण करे । इस योगका नाम हरिशंकर है । इसके खानेसे सब प्रमेह शान्त होते हैं ॥ ९५ ॥