भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८७० भैषज्यरत्नावली । [ प्रमेह-
बृहद्धरिशंकररस ।
रसगन्धकलौहं च स्वर्णं वङ्गं च माक्षिकम् ।
समभागं तु संपिष्य वटिकां कारयेद्भिषक् ॥
सप्ताहमामलद्रावार्भावितोऽयं रसेश्वरः ॥ ९६ ॥
शुद्ध पारा, गन्धक, लोहा, सोना, वङ्ग और सोनामाखी इनकी भस्मको समानांश लेवै। सबको आमलोंके रसद्वारा एक सप्ताहपर्यन्त भावना देकर अच्छे प्रकार खरल करके एक एक माशा प्रमाण गोलियाँ बनालेवे ॥ ९६ ॥
हरिशङ्करनामाऽयं गहनानन्दभाषितः ।
प्रमेहान्विंशतिं हन्ति सत्यं सत्यं न संशयः ॥ ९७ ॥
इस योगका हरिशंकरनाम है और यह सम्पूर्ण रसोंका ईश्वर है। इसको गहनानन्दनाथने प्रकाशित किया है। यह बीसों प्रकारके प्रमेहोंको सन्देहरहित नष्ट करदेता है। यह बिलकुल सत्य है ॥ ९७ ॥
मेहकुञ्जरकेशरीरस ।
रसगन्धायसाभ्राणि नगवङ्गौ सुवर्णकम् ।
वज्रकं मौक्तिकं सर्वमेकीकृत्य विचूर्णयेत् ॥ ९८ ॥
शतावरीरसेनैव गोलकं शुष्कमातपे ।
बद्ध्वा शुष्कं समुद्धृत्य शरावे सुदृढे क्षिपेत् ॥ ९९ ॥
सन्धिलेपं मृदा कुर्याद्गर्त्तायां गोमयाग्निना ।
पुटेद्यामचतुःसङ्ख्यमुद्धृत्य स्वाङ्गशीतलम् ॥ १०० ॥
श्लक्ष्णखल्ले विनिष्क्षिप्य गोलं तु मर्दयेद्दृढम् ।
देवब्राह्मणपूजां च कृत्वा धृत्वाऽथ कूपिके ॥
खादेद्वल्लद्वयं प्रातः शीतं चानु पिबेज्जलम् ॥ १०१ ॥
शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, लोहा, अभ्रक, शीशा, वङ्ग, सुवर्ण, हीरा और मोती इन सबकी भस्म समान भाग लेकर एकत्र पीसलेवे। फिर शतावरके रसमें सबको विधि-पूर्वक खरल करके गोलासा बनाकर धूपमें सुखालेवे। जब खूब सूख जाय तब उस गोलेका सुदृढ दो शरावोंमें स्थापन करे और मिट्टीसे शरावोंके छिद्रोंको लेपकर गड्डहेमे रख उपलोंकी अग्निद्वारा ४ प्रहरतक मृदु पुटपाक करे। जब पककर स्वाङ्ग-शीतल होजाय तब उक्त गोलेको निकालकर लोहेके खरलमें रखकर उत्तम विधिसे घोटलेवे। तदुपरान्त प्रतिदिन प्रातःकाल देवता तथा ब्राह्मणोंको पूजनकर और कुछ