भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ८७१
कुएँ ( कुप्पी ) पर रखकर इस रसको दो दो रत्ती प्रमाण शीतल जलके साथ सेवन करे ॥ ९८-१०१ ॥
अष्टादश प्रमेहांश्च जयेन्मासोपयोगतः ।
तुष्टिं तेजो बलं वर्णं शुक्रवृद्धिं च दारुणाम् ॥ २ ॥
अग्नेर्बलं वितनुते मेहकुञ्जरकेसरी ।
दिव्यं रसायनं श्रेष्ठं नात्र कार्या विचारणा ॥ ३ ॥
एक महीनेतक नियमानुसार इसका सेवन करनेसे १८ प्रकारके प्रमेह दूर होते हैं। मनमें प्रसन्नता, तेज, बल, वर्ण और वीर्यकी अत्यन्त वृद्धि और जठराग्नि प्रबल होती है। यह दिव्य रसायन मेहरूपी हाथीको नष्ट करनेके लिये सिंहकी समान है ॥ १०२ ॥ १०३ ॥
अपूर्व मालिनीवसन्त ।
वैक्रान्तमभ्रं रविताप्यरौप्यवङ्गं प्रवालं रसभस्म लौहम् ।
सटङ्कणं कम्बुकभस्म सर्वं समांशकं सेव्यवरीहरिद्राः ॥ १०४ ॥
द्रवैर्विभाव्यं मुनिसंख्यया च मृगाङ्कजाशीतकरेण पश्चात् ।
वल्लप्रमाणो मधुपिप्पलीभिर्जीर्णज्वरे धातुगते नियोज्यः ॥
गुडूचिकासत्त्वसितायुतश्च सर्वप्रमेहेषु नियोजनीयः ॥ १०५ ॥
कृच्छ्राश्मरीं निहन्त्याशु मातुलुङ्गाङ्घ्रिजैर्द्रवैः ।
रसो वसन्तनामाऽयमपूर्वो मालिनीपदः ॥ १०६ ॥
वैक्रान्तमणि, अभ्रक, ताँबा, सोनामाखी, चाँदी, वङ्ग, मोती, रससिन्दूर, लोहा, सुहागा और शङ्खभस्म इन सबको बराबर भाग लेवे। फिर एकत्र करके खस, शतावर और हल्दी इनके रसोंसे क्रमपूर्वक ७ दिनतक खरल करे। पश्चात् कस्तूरी और कपूरके जलमें खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे। इसको धातुस्थित जीर्णज्वरमें शहद और पीपलके चूर्णमें, सर्वप्रकारके प्रमेहोंमें गिलोयके सत्त्व और मिश्रीके साथ एवं मूत्रकृच्छ्र और अश्मरीरोगमें बिजौरेनींबूकी जडके क्वाथमें मिलाकर सेवन करे तो उक्त रोग और अन्यतर उत्कट व्याधियाँ तत्क्षण नष्ट होती हैं। यह अपूर्वमालिनीवसन्त नामवाला अत्युत्तम रस है ॥ १०४-१०६ ॥
बृहत्कामचूडामणिरस ।
मौक्तिकं माक्षिकं चैव सुवर्णभस्म पृथक् पृथक् ।
कर्पूरं जातिकोषं च जातीफललवङ्गकम् ॥ १०७ ॥