भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

पृष्ठ 904, कुल 1416 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 904

८७२ भैषज्यरत्नावली । [ प्रमेह-

वङ्गभस्म तथा ग्राह्यं रूप्यं चापि तथाऽर्द्धकम् । चातुर्जातं च संग्राह्यं सर्वमेकत्र चूर्णितम् ॥ १०८ ॥ शतमूलीरसेनैव भावयेत्सप्तवारकम् । ततो गुञ्जाप्रमाणेण वटिका भिषजा कृता ॥ १०९ ॥ अनुपानविशेषेण रोगाकरविनाशिनी ।

मोती, स्वर्णमाक्षिक, सुवर्ण इनकी भस्म, कपूर, जावित्री, जायफल, लौंग, वङ्ग-भस्म ये प्रत्येक एक एक तोला एवं रूप्यभस्म, दालचीनी, इलायची, तेजपात और नागकेशर ये प्रत्येक छः छः माशे लेवे । फिर सबको एकत्र पीसकर शतावरके रसमें सातवार भावना देकर एक एक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इनमेंसे एक गोली प्रतिदिन प्रातःकाल अनुपानविशेषके साथ सेवन करनेसे समस्त रोगोंके समूह नष्ट होते हैं ॥ १०७-११० ॥

शीतं पयोऽनुपानं च कामिनीः कामयेच्छतम् । वीर्यहीनो भवेद्यस्तु यो वा स्यात्पतितध्वजः ॥ सोऽशीतिवार्षिको भूत्वा युवेव रमतेऽङ्गनाः ॥ ११ भेषजैर्विविधैः किं स्यादन्यैश्च शतसंख्यकैः । फलं न किञ्चित्त्रास्ति केवलं गौरवंमुहुः ॥ १२ ॥ नातः परतरं किञ्चिदस्ति पुष्टिकारं च तत् । अतः सर्वप्रयत्नेन सेव्यो भूमिभुजा सदा ॥ १३ ॥

शीतल दूधके साथ इसको भक्षण करे तो सैकड़ों स्त्रियोंमें गमन कर सकता है । जो वीर्य्यहीन हैं या जिनकी ध्वजा भङ्ग होगई है वे पुरुष अस्सी वर्षके बूढे होकर भी इस रसके सेवनसे युवा पुरुषके समान असंख्य रमणियोंके साथ रमण कर सकते हैं । अन्यान्य नाना प्रकारकी सैकड़ों औषधियोंसे सिवा गुरुताके और फल नहीं होता । इससे बढकर पुष्टिकरनेवाली उत्तम औषधि कोई नहीं है, इसलिये राजा, महाराजाओंको इसका सप्रयत्न सेवन करना चाहिये ॥ ११-१३ ॥

विशेषाद्ध्वजभङ्गं च मन्दाग्निं श्वयथुं तथा । रक्तोद्भवञ्च नारीणां पानाद्दोषो विनश्यति ॥ प्रमेहं मूत्ररोगं च सप्ताहेन विनाशयेत् ॥ ११४ ॥

यह रस विशेषकर ध्वजभङ्ग, प्रमेह, मूत्रकृच्छ्र, मन्दाग्नि, सूजन और स्त्रियोंके रक्तोत्पन्न दोषोंको एक सप्ताहमेंही नाश करता है ॥ ११४ ॥