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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ७२१


अठारह प्रकारके कुष्ठ, दोनों प्रकारका वातरक्त, शरीरकी विवर्णता और त्वचासम्बन्धी सब विकार शीघ्र नाश होते हैं ॥ ९३–९५ ॥

रुद्रतैल ।

पुनर्नवा निशा निम्बं वार्त्ताकुबृहतीत्वचम् ।
कण्टकारी करञ्जश्च निर्गुण्डीवृषमूलकम् ॥ ९६ ॥
अपामार्गं पटोलं च धुस्तूरं दाडिमीफलम् ।
जयन्तीमूलकं दन्ती प्रत्येकं कार्षिकद्वयम् ॥ ९७ ॥
त्रिफलायाः प्रदातव्यं द्विकर्षं च पृथक् पृथक् ।
दत्त्वा छिन्नरुहायाश्च द्वात्रिंशच्च पलानि च ॥
पाचयेद्भाजने तोये चतुर्थांशावशेषितम् ॥ ९८ ॥
कटुतैलस्य च प्रस्थं दुग्धं च तत्समं भवेत् ।
वासकस्वरसप्रस्थं मन्दमन्देन वह्निना ॥ ९९ ॥
गन्धं शठी च काकोली चन्दनं ग्रन्थिकं नखी ।
पूतिकं केशरं कुष्ठं प्रत्येकं कार्षिकं पुनः ॥ १०० ॥

काथके लिये गिलोयको ३२ पल लेकर ८ सेर जलमें पकावे । पकते पकते जब चौथाई भाग जलकर रहजाय तब उतारकर छान लेवे । फिर उस क्वाथमें पुनर्नवा, हल्दी, नीमकी छाल, बैंगन, बडीकटेरी, दारचीनी, कटेरी, दुर्गन्धकरञ्ज, सिहालु, अडूसेकी जड, चिरचिटा, पटोलपात, धतूरा, अनारका बक्कल, जयन्तीकी जड, दन्ती, हरड, बहेडा और आमला इन प्रत्येक ओषधिका कल्क दो दो कर्ष डालकर एवं सरसोंका तेल ६४ तोले, दूध ६४ तोले और अडूसेका स्वरस ६४ तोले इन सबको एकत्र मिलाकर मन्दमन्द अग्निके द्वारा तैलको पकावे । पश्चात् गन्धपाकके लिये काली अगर, कचूर, काकोली, सफेद चन्दन, गठिवन, नखी, दुर्गन्धकरञ्ज, नागकेशर और कूठ इन प्रत्येक औषधिका एक एक कर्ष परिमाण बारीक पीसकर मिला देवे ॥ ९६–१०० ॥

हस्तपादाङ्गुलीसन्धिगलितं स्फुटितं तथा ।
कृष्णं श्वेतं तथा रक्तं नानावर्णं सदाहकम् ॥ १ ॥
पामां विचार्चिकां कण्डूं त्वचं छायां च कालिनीम् ।
मसूरिकां मण्डलं च ज्वलनं च विसर्पकम् ॥ २ ॥
नाडीव्रणं मर्महीनं गात्रवैवर्ण्यदद्रुकम् ।
निहन्ति रक्तदोषं च भास्करस्तिमिरं यथा ॥ १०३ ॥

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ७३३


शतपुष्पाद्यचूर्ण ।

शतपुष्पा विडङ्गञ्च सैन्धवं मरिचं समम् ।
चूर्णमुष्णाम्बुना पीतमामवातहरं परम् ॥ ३० ॥

सोया, वायविडङ्ग, सेंधानमक कालीमिर्च समान भाग चूर्णको एकत्र मिलाकर गरम जलके साथ पान करनेसे अत्यन्त प्रबल आमवातरोग दूर होता है ॥ ३० ॥

हिंङ्ग्वाद्यचूर्ण ।

हिङ्गु चव्यं विडं शुण्ठी कृष्णाऽजाजी सपौष्करम् ।
भागोत्तरमिदं चूर्णं पीतं वातामजिद्भवेत् ॥ ३१ ॥

हींग एक भाग, चव्य दो भाग, विडनमक ३ भाग, सोंठ ४ भाग, पीपल ५ भाग, कालाजीरा ६ भाग और पोहकरमूल ७ भाग इन सब ओषधियोंके चूर्णको एकत्र मिलाकर शीतल जलके साथ पान करनेसे आमवात नष्ट होता है ॥

अलम्बुषाद्यचूर्ण १-२ ।

अलम्बुषां गोक्षुरकं त्रिफलानागरामृताः ।
यथोत्तरं भागवृद्धया श्यामाचूर्णं च तत्समम् ॥ ३२ ॥
पिबेन्मस्तुसुरातक्रकाञ्जिकेनोदकेन वा ।
पीतं जयत्यामवातं सशोथं वातशोणितम् ॥
त्रिकजानूरुसन्धिस्थं ज्वरारोचकनाशनम् ॥ ३३ ॥

१-गोरखमुण्डी १ भाग, गोखुरू २ भाग, हरड ३ भाग, बहेडा ५ भाग, सोंठ ६ भाग, गिलोय ७ भाग और इन सबकी बराबर निसोतका चूर्ण लेकर सबको एकत्र बारीक पीसलेवे । इस चूर्णको प्रतिदिन दहीके तोड, मद्य, तक्र, काँजी अथवा गरम जलके साथ सेवन करे । इसके सेवन करनेसे आमवात, शोथयुक्त वातरक्त एवं त्रिक, जानु, ऊरु और सन्धिगत वात, ज्वर और अरुचि ये सब रोग दूर होते हैं ॥ ३२ ॥ ३३ ॥

अलम्बुषां गोक्षुरकं गुडूचीं वृद्धदारकम् ।
पिप्पलीं त्रिवृतां मुस्तां वरुणं सपुनर्नवम् ॥ ३४ ॥
त्रिफलां नागरं चैव श्लक्ष्णचूर्णानि कारयेत् ।
मस्त्वारनालतक्रेण पयोमांसरसेन वा ॥
आमवातं निहन्त्याशु श्वयथुं सन्धिसंस्थितम् ॥ ३५ ॥

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