भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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९० भक्तिसुधा अदृष्टं केनापि क्वचन च चिदानन्दरससो यशोदायाः क्रोडे कुवलयमिवौजस्तदभवत् ॥ 'नटवरवपुः बिभ्रत्'—से कहा गया कि उद्बुद्ध उभयविध सम्प्रयोग-विप्रयोग शृंगाररस स्वयं अमूर्त होनेसे उसका गमनागमन न हो सकता—अतः 'बिभ्रत्'। है तो अमूर्त ही, पर भक्तानुग्रहविशेषात् उसीने नटवरवपु धारण किया, अमूर्तरस मूर्तरूपमें प्रकट हुआ, भक्त कहते हैं, वेदान्तियोंका ब्रह्म केवल मनोग्राह्य, बुद्धिग्राह्य है, सर्वेन्द्रियग्राह्य नहीं, पर वे तो चाहते हैं निखिलरसामृतमूर्ति भगवान्‌को सर्वेन्द्रियग्राह्य बनाना, सर्व इन्द्रियाँ मन-बुद्धिसे ईर्ष्या करती हैं, उनको पूर्णतम पुरुषोत्तमका आस्वादन करते देख नेत्र, श्रोत्र, सर्व ही लालायित हो जाते हैं और क्या रोम- रोम अपने प्रियतम प्राणधनके संश्लेषके लिये उत्कण्ठित होता है, व्याकुल हो उठता है। भगवान्‌का सम्मिलन कौन न चाहेंगे? कहते हैं—'पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयंभूस्तस्मात्पराङ्पश्यति नान्तरात्मन्'। (कठ० २।१।१) स्वयम्भूने इन्द्रियोंको बहिर्मुख रचा। 'व्यतृणत्' में तृहु धातु हिंसार्थक है। स्वयम्भूने इन्द्रियोंको बनाया अर्थमें व्यरचयत् कहते हैं, हिंसितवान् क्यों? तो उसने उन्हें बहिर्मुख बनाकर मार डाला, उनको सर्व प्राणियोंके परमप्रेमास्पद भगवान्‌के रसास्वादसे वंचित किया। 'पिय बियोग सम दुखु जग नाहीं', (रा०च०मा० २।६४।७) 'लोके नहि स विद्येत यो न राममनुव्रतः' लोकमें ऐसा कोई नहीं है, जो प्राणेश्वरका वियोग सहन करे, जो इन्द्रियोंको बहिर्मुख न बनाया होता तो अन्तरात्माका आस्वादन करते। इसलिये स्पष्ट है कि सर्व इन्द्रियाँ भगवत्तत्त्वके अनुभव बिना, भगवद्दर्शन बिना, भगवान्‌के स्वरूपरसके आस्वादन बिना, भगवान्‌के मंगलमय श्रीअंगके संस्पर्श बिना, अपनेको अकृतार्थ हतभाग्य समझती हैं, वह अपना हिंसन समझती हैं, जैसे मति ब्रह्माकार होकर रसका आस्वादन करती है, वैसे हम भी करें। यह भाव आगे 'अक्षण्वतां फलमिदं न परं विदामः' (श्रीमद्भा० १०।२१।७) इत्यादिमें और स्पष्ट होगा। वाल्मीकिने लिखा है— यश्च रामं न पश्येत्तु यं च रामो न पश्यति। निन्दितः सर्वलोकेषु स्वात्माप्येनं विगर्हते ॥ (वा०रा० २।१७।१४) जिसने रामको स्नेहभरी दृष्टिसे नहीं देखा और जिसे रामने कृपादृष्टिसे नहीं देखा, वह सर्वलोकमें निन्दित है, उसकी अन्तरात्मा भी उसकी विगर्हा करती है। इसी प्रकार सर्व इन्द्रियोंकी निरर्थकता है कि जिनका भगवान्‌में उपयोग न हुआ हो, इसीलिये भक्तगण इतनेमें ही सन्तुष्ट नहीं कि वह उद्बुद्ध उभयविध सम्प्रयोग-विप्रयोगात्मक शृंगाररसात्मक शृंगाररसात्मा भगवान् केवल बुद्धिग्राह्य हो, वह तो उसका रोम-रोमसे, सर्वेन्द्रियोंसे संस्पर्श अवगाहन चाहते हैं—अतः उनके मनोवासनानुसार उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररसात्मक तत्त्वने सर्वेन्द्रियग्राह्य होनेके लिये सर्व भावसे समास्वादन करा देनेके लिये नटवरवपु होकर वृन्दारण्यमें प्रवेश किया। 'बिभ्रत्''डुभृञ् धारणपोषणयोः'। इसके धारण-पोषण दोनों अर्थ हैं कि उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररसात्मक भगवान् वेणुवादन करते हुए जो वृन्दारण्यमें पधारते हैं, वह कौन? तो श्रीवृषभानुनन्दिनीके हृदयकी वस्तु, भावुकोंके हृदयकी वस्तु, यानी भावुकोंका भाव ही श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके रूपमें प्रकट हुआ, एवं च भगवान् भक्तमनोभावनामय हैं। 'स्वेच्छामयस्य न तु भूतमयस्य', (श्रीमद्भा० १०।१४।२) स्व-स्वीया तेषाम् इच्छा स्वेच्छा, तन्मयः न तु भूतमयः। यह वपु भूतमय, मायामय, प्रकृतिमय नहीं, किंतु भावुकोंके प्रीतिमय, इच्छामय है, उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररसात्मक स्वरूप कहा था तो श्रीवृषभानुनन्दिनीके अन्तःकरणमें, श्रीव्रजांगनाओंके अन्तःकरणमें। नायकविषयक शृंगार नायिकाके ही अन्तःकरणमें (हृदयमें) उद्बुद्ध होता है। यह अमूर्त रस श्रीवृषभानुनन्दिनीके हृदयकी वस्तु मूर्त होकर श्रीवृन्दारण्यधाममें कैसे? तो सर्वेन्द्रियग्राह्य होनेके