भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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रोते हो लाला?' तब प्रभुने कहा 'इसलिये कि तुम हमें अपना नहीं समझते, अजनबी समझते हो।' प्रीतिमें अलौकिकता बिलकुल प्रकट न हो, सन्देह यत्किंचित् न हो। एक समय जब भगवान्ने मिट्टी खायी, तब बलदाऊने अम्बासे आकर कहा कि कन्हैयाने मिट्टी खायी। सुनकर वह चली मारनेको और प्रभुको पकड़कर कहा- 'लाला तूने मिट्टी क्यों खायी?' तो प्रभुने डरकर कहा- 'नाहं भक्षितवानम्ब'- मैया मैंने मिट्टी नहीं खायी। यह ऐश्वर्य दिखलानेके लिये नहीं, किंतु प्राकृत शिशुके समान अम्बासे डरकर। तब अम्बा कहती है- 'सब यही कहते हैं'। प्रभुने कहा- 'सब झूठे हैं', मैया बोली- 'बलराम भी तो कह रहे हैं।' भगवान्ने कहा- 'आज ग्वालबालोंने दाऊको मिला लिया है, इसीलिये वह भी झूठ बोल गये, अगर विश्वास न हो तो मुँह देख ले।' भाव यह कि मुँह दिखानेको तैयार हो जानेसे अम्बा समझ लेगी कि मिट्टी नहीं खायी है, अगर मिट्टी खायी होती तो मुँह दिखानेके लिये तैयार न होता, एक झूठ छिपानेके लिये दुगुनी-तिगुनी झूठ बोलनी पड़ती है, पर अम्बा भी बड़ी जबर। उसने कहा- 'मुँह खोल, देखूँ तो सही' सुनकर भगवान्ने मुँह खोल दिया। खोल क्या दिया, भावुक कहते हैं कि मातृकोपसूर्यरश्मिसे प्रभुमुखकमल खिल गया। जब खिला तो भीतर ब्रह्माण्ड! यह कैसा हुआ? इसका कारण यह कि भगवान्‌की ऐश्वर्याधिष्ठात्री महामाया प्रभुके पीछे- पीछे सेवाका अवसर ढूँढ़ती हुई घूम रही थी। माया कहती- 'भगवन्! लोग आपको बड़ा तंग करते हैं, यह मुझसे नहीं सहा जाता।' प्रभुने कहा- 'तू चुपचाप रहकर तमाशा देख, कुछ करनेके फेरमें न पड़' तथापि उसे न मानती हुई, जब माँ मुँहमें मिट्टी देखने लगी तो ऐश्वर्याधिष्ठात्री महाशक्तिने सोचा कि अगर माँ मिट्टीको देख लेगी तो मेरे प्रभुको पीटेगी, यह मेरे होते ठीक नहीं। इसीलिये उस ऐश्वर्याधिष्ठात्री शक्तिने मुँहमें ब्रह्माण्ड दिखाया। मैयाके हाथकी छड़ी गिर गयी। भगवान्ने सोचा, मामला बिगड़ रहा है। झट 'व्यतनोद् वैष्णवीं मायाम्', यशोदामैया आँख खोलकर देखते ही समझ गयी कि मेरे लालाको कुछ अलाय-बलाय है, तब उसके निवारणके लिये थूः थूः करने लगी। भगवान् मायाको कहते हैं- 'ले, तूने मुझे बचाया क्या, थू थू करा दिया।' अस्तु, यह सब भाव नटवरवपुमें ही सम्भव है। कहा है- 'मायाश्रितानां नरदारकेण साकं विजहुः कृतपुण्यपुञ्जाः ॥' (श्रीमद्भा० १०।१२।११) इस तरह आगे 'बिभ्रत्' है। क्यों? 'एवं नटवरस्येव वपुः नटवरवपुः तादृशं बिभ्रत्।' पहले कहा गया कि भगवान् रसात्मा हैं तो भी रस अमूर्त होनेके कारण चल-फिर नहीं सकता, परम तत्त्व भी चलता-फिरता नहीं, उद्बुद्ध उभयविध सम्प्रयोग- विप्रयोग शृंगाररसात्मा एक अमूर्त पदार्थ है, रस वस्तु हृदयस्थ है, केवल अमूर्तरस वेणु न बजाता, न चलता, न फिरता, वह तो केवल वृषभानुनन्दिनीके हृदयमें है, इसीसे कहा- 'बिभ्रत्'। अमूर्तरस यहाँ मूर्त बना, इसलिये कि भावुक उसे सर्वेन्द्रिय-ग्राह्यरूपसे ले सकें। अमूर्तरस तो मनोग्राहामात्र है, वेदान्तमें परम वस्तुका आस्वाद मनोग्राहा ही कहा है- 'बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्', (गीता ६।२१) 'स्वयं तदन्तःकरणेन गृह्यते' अतः कहा उसमें सर्वेन्द्रियग्राह्यता नहीं, भावुकोंको तो मनोग्राहातामात्रसे सन्तोष नहीं, किंतु सर्वेन्द्रियोंमें, अन्तरात्मामें, अन्तःकरणमें, प्राणमें, रोम-रोममें उसका अनुभव हो, इन्हीं भावुकोंकी इच्छापूर्तिके लिये 'बिभ्रत्'। अमूर्त उद्बुद्ध उभयविध सम्प्रयोग-विप्रयोगात्मक शृंगाररसमूर्ति श्रीकृष्णचन्द्र- परमानन्दकन्दके रूपमें मूर्त होकर देखा जाय, जैसा रसका ही परिणाम शर्करादि, जैसे रसका ही निर्यास- गोंद, वैसे ही परमानन्दरसका निर्यास भगवान्, गोंद रसका ही घनीभाव होता है- आगे इसकी अभिव्यक्तिमें बड़ी ऊँचाई रखी है। यह मूर्त कैसे बना? अनाघातं भृङ्गैरनपहृतसौगन्ध्यमनिलैः अनुत्पन्नं नीरैस्खनुपहतमूर्मीकणभरैः ।