भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 98, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ें८८ भक्तिसुधा
यतीन्द्रोंका निर्मल चित्त पकड़नेमें समर्थ न हुआ, उसी पूर्णतम पुरुषोत्तम अनन्तकोटि-ब्रह्माण्डनायक निखिल- रसामृतमूर्ति प्रभुको नन्दगेहिनी 'लाला आज तो तुझे बता दूँगी' कहकर पकड़ना चाहती है। किसी तरह प्रभु पकड़में आयें। यशोदा कहती— 'लाला तू बड़ा लंगर हो गया है, मैं आज तेरा सब लंगरपन भुला दूँगी।' कुन्ती कहती— नाथ! इतना कहकर जब यशोदामैयाने रज्जु ली, तब तो आपकी विचित्र दशा हुई। आपके नील-कमल-कोशसमान कपोलपर अंजनमिश्रित अश्रुबिन्दु बड़े ही सुशोभित मालूम पड़े, सिर नीचा किया हुआ, आँखें डबडबायी हुईं; अंजनमिश्रित अश्रु कपोलोंपर ऐसे शोभित होते हैं, जैसे नीलकमलके कोशोंपर मोती विराजमान हों। क्या शोभा कही जाय! आप डर रहे हैं। भयभीत होकर अपने मुखारविन्दको नीचा किये रोते हैं, जिनके डरसे डर भी डरे, जो कालकाल महाकालेश्वर महामृत्युंजय— यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च उभे भवत ओदनः । मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः ॥ (कठोपनिषद् १।२।२५) —सकल प्रपंचको मृत्युरूप दाल-शाकके साथ मिलाकर जो खा जाय, वह व्रजगेहिनीकी छड़ीसे डरे। यह सब भाव जब अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायकता प्रकट होती, तब न रहता। एक जगह कहा है— 'मुक्तिं ददाति कर्हिचित्स्म न भक्तियोगम् ॥' (श्रीमद्भा० ५।६।१८) भगवान् भक्तोंको मुक्ति दे देते हैं, भक्ति जल्दी नहीं देते; क्योंकि भगवान्को भक्तिके भावबन्धनमें बँधकर परतन्त्र हो जाना पड़ता है, यहाँ स्वाभाविक प्रेम है। इसी कारण वृन्दारण्यमें ग्वालबालोंको, व्रजांगनाओंको विष्णु-शिव-तत्त्वात्मक परमात्मामें वैसी प्रीति न होती, वैसी उत्कण्ठा न होती, जैसी 'नटवरवपु' भगवान्में। कहीं एक ऐसी कथा सुनी है— भगवान् जब व्रजसे मथुरामें गये, तब गोपांगना विरहिणी होकर विलाप करने लगीं। किसीने कहा— 'मथुरा बहुत दूर थोड़ी है, तुम वहीं जाकर प्रभुसे मिल आओ'। व्रजांगनाओंने ऐसा विलाप किया कि उनके अश्रुसागरमें जग डूब जाय, लोगोंने बहुत कुछ कहा-सुना तो वहाँपर सब गयीं, भगवान्को द्वारपालके खबर देते ही प्रभुने कहा— 'आने दो'। व्रजांगनाएँ भीतर गयीं और श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दका ऐश्वर्य देखा, देखते ही चट सबने घूँघट काढ़ा, कहने लगीं— 'यह तो हमारे मनमोहन नहीं हैं; मुरलीमनोहर काली कमलीवाले नन्दलाल हमारे सर्वस्व हैं।' एक बारकी ऐसी कथा है कि कोई वासन्तिक रासोत्सव था। उसमें श्यामसुन्दर व्रजेन्द्रनन्दन भगवान् रासविलास कर रहे थे, इतनेमें भगवान् एक लताकी आड़में छिप गये, तब गोपांगनाएँ भगवान्को खोजतीं-पूछतीं डोल रही थीं। दैवात् वहाँ पहुँचीं, जहाँ भगवान् छिपे थे। इनको देखते ही प्रभुने चतुर्भुजरूप धारण किया, जब चतुर्भुजभगवान्को देखा तो भक्तिसे उनको केवल प्रणामकर कहा— 'भगवन् ! आप हमारे श्यामसुन्दर व्रजलालसे भेंट करा दो, उनसे हमें मिला दो।' भगवान्ने 'तथास्तु' कहा। वह चतुर्भुजसे बिलकुल न खिचीं, यही बात 'नटवरवपुः' में है। द्विभुज मोहन मुरलीधरमें जो प्रीति है, वह अन्यत्र नहीं। चतुर्भुजत्वादि भगवान्का ऐश्वर्यभाव है। उसका प्रभाव माधुर्यभावके प्राकट्यमें नहीं। इतना ही क्यों, जैसा सूर्यके सामने चन्द्रमाका प्रकाश नहीं, वैसा ही माधुर्यभावके विकासमें, माधुर्यभावके प्राखर्यमें ऐश्वर्यभावका प्रकाश नहीं, श्रीवृषभानुनन्दिनीमें माधुर्यभावका पूर्ण प्रकाश है। अस्तु, यहाँ जैसे कहा जा चुका है कि हो अलौकिक ही, पर प्रीति उसमें लौकिक दृष्टिसे हो, अलौकिकता उसकी छिपी हो, भगवान्ने व्रजमें तो बहुत ही साजात्य प्रकट किया। पहले नरत्वेन, पीछे गोपत्वेन, सगे-सम्बन्धीरूपसे। 'श्रीविष्णुपुराण' में कथा है—जब भगवान्ने गोवर्धनको उठाया, तब वह अद्भुत प्रभाव देखकर सब समझ गये कि यह गोप नहीं, गोपवेशधारी ईश्वर हैं। भगवान् समझे यह हमसे सन्देह करते हैं। बस, प्रभु रोने लगे, गोपालोंने देखा कन्हैया रो रहा है तो सब मनाने लगे कि 'क्यों