भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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वेणुगीत ८९ आगे बढ़कर 'स्वदाररति' की विधि बतलायी गयी है, इसलिये कि अपनी स्त्रीपर प्रीतिकी अपेक्षा उच्छृंखल मनोवृत्तिवालोंको कुलटामें, वेश्याओंमें प्रीति अधिक होती है, इसी स्वाभाविकतामें शास्त्रोंने लगाम लगायी। प्राणी स्वभावसे ही कामचार होता है। जो जल बहा जा रहा है, उसे रोकनेके लिये ही बाँध बाँधा जाता है। यही अर्थ श्रुति-सेतुका है। विधान- निषेध यह बन्ध है, वह प्राणीकी उच्छृंखलता, स्वाभाविकताको नियन्त्रित करनेके लिये है, किंतु जैसे बहते जलको रोकनेका प्रयत्न करो, तब वह तोड़ मारता है, वैसे ही स्वाभाविक प्रीतिको रोकनेसे वह अधिकाधिक बढ़ती ही जाती है। संसारमें यह दोष होनेसे सर्वथा हेय है, परंतु जो संसारमें दोष, वही भगवान्‌में गुण है। अर्थात् भगवान्‌के सम्बन्धसे गुण भी दोष हो जाते हैं, जो भगवान् अनन्तकोटि- ब्रह्माण्डनायक, सर्वान्तरात्मा, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् निरुपाधिक परप्रेमास्पद हैं, उनमें पुराण, शास्त्र, वेद कहते हैं कि अपनी मनोवृत्तियाँ सांसारिक तुच्छ वस्तुओंसे विमुख होकर भगवान्‌की ओर प्रवाहित हो उठें, इसीमें पूर्ण कृतकृत्यता है, लेकिन वह बड़ा कठिन है। कुछ बड़े-बड़े योगी अमलात्मा परमहंस मुनीन्द्र, यतीन्द्र, योगी समाधि आदिसे वैसा करनेमें समर्थ होते हैं। मगर यहाँ तो वैसी परिस्थिति नहीं है, यहाँ तो ऐसा हो जाय कि वही सच्चिद्घन पूर्णतम पुरुषोत्तम सर्वान्तरात्मा भगवान् स्वाभाविक परप्रेमास्पद हो जायँ। जैसे किसी कामिनीको प्रियतम श्रेष्ठतम प्राणेश्वरके उत्कट सम्मिलनकी उत्कण्ठा हो, वैसी स्वाभाविकी उत्कट उत्कण्ठा भगवान्‌में हो जाय। जो कोई रोकनेको उपस्थित हो उसे तोड़ मारे, वह स्थिति यहाँ आयी, श्यामसुन्दर व्रजेन्द्रनन्दन मनमोहन नटवरवपु हैं तो सामान्य जनोंको अलौकिकमें प्रीति नहीं, पर लौकिकमें प्रीति हो तो उससे नरक हो। प्रीतिमात्र तो विवक्षित है नहीं, उससे मतलब नहीं, नहीं तो सारा संसार किसी-न-किसीमें प्रीति होनेके कारण मुक्त हो जाय। नहीं, प्रीति हो अलौकिकमें। भगवान् हैं तो अलौकिक, किंतु बनेंगे नर, 'नटवरवपुः', अति अद्भुत विचित्र वेशधारी, अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायककी अलौकिकता कहीं प्रकट हो जाय तो काम बिगड़ जाय। इसलिये अलौकिकताको छिपाकर लौकिक स्वरूपमें प्रकट होना पड़ता है, जिससे लोगोंकी प्रीतिमें स्वाभाविकता हो। इसीलिये 'बबन्ध प्राकृतं यथा' जैसे प्राकृतको बाँधते हैं, वैसे यशोदा अपने लालाको बाँध लेती है। 'प्राकृतं यथा'—हैं तो अप्राकृत, पर बाँध लेती है प्राकृत-जैसे। कहा ही है— ताहि अहीरकी छोहरियाँ, छछियाभरि छाछपै नाच नचावैं॥ (भजन-संग्रह ७३७) यही अलौकिकमें लौकिकता व्यक्त है, कुन्ती माता कहती हैं— गोप्याददे त्वयि कृतागसि दाम तावद् या ते दशाश्रुकलिलाञ्जनसम्भ्रमाक्षम्। वक्त्रं निनीय भयभावनया स्थितस्य सा मां विमोहयति भीरपि यद्विभेति ॥ (श्रीमद्भा० १।८।३१) हे नाथ! आपकी वह लीला व्यामोह-सिन्धुमें उन्मज्जन-निमज्जन कराती है— तामात्तयष्टिं प्रसमीक्ष्य सत्वर- स्ततोऽवरुह्यापससार भीतवत्। गोप्यन्वधावन्न यमाप योगिनां क्षमं प्रवेष्टुं तपसेरितं मनः॥ (श्रीमद्भा० १०।९।९) नवनीत-भांडोंको फोड़कर उलूखलपर विराजमान श्यामसुन्दर नवनीतको अपने मुखमें छोड़ते, अपने ग्वालबालोंके मुखमें छोड़ते, रामावतारके साथी बन्दरोंके मुखमें देते हैं तथा लौट-लौटकर देखते हैं कि कहीं मैया तो नहीं आती। इतनेमें देखा तो मैया आयी, प्रांगणमें भागते लालाको देखकर अम्बा छड़ी लेकर दौड़ी, अम्बाको देख प्रभु भी भयभीत होकर उलूखलसे कूदकर भागे। यशोदामैया व्रजरानी भी पीछा करने लगी, किसका? 'न यमाप योगिनां क्षमं प्रवेष्टुं तपसेरितं मनः॥' जिसको अमलात्मा परमहंस