भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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८६ | भक्तिसुधा

विवाहका समय हो तो क्या पूछना ? दूल्हा नटसे भी अपनेको सुन्दर बनाना चाहता है। देव सदाके लिये विचित्र वेश बनाये रखते हैं। नरका तो विचित्र वेश कादाचित्क है, सदाके वेशमें विचित्रता नहीं। विचित्रताके लिये वेशविशेषकी आगन्तुकता विवक्षित है। इसीलिये यह पाठ लिया गया है कि— 'नटवरवपु:', 'नटश्चासौ वरश्च नटवरः तस्येव वपुर्यस्य सः।' नटका तात्पर्य द्विभुजत्वमें है। व्रजलीलाका सर्वस्व तो द्विभुजत्व ही है, इसलिये 'नटवरवपु:'। यदि भगवान्‌का विचित्र वेश होता और द्विभुज न बना होता तो वह आनन्द न आता, व्रजवासियोंमें उनके लिये ऐसा ममत्व न होता। व्रजवासी कहते हैं— श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दमें अगर परमेश्वरता व्यक्त हो जाय तो भगवान् फीके हो जायँ। चतुर्भुजमें किसीको प्रीति न होती, वे लोग आश्चर्यमें पड़ते। भावुकोंके माधुर्यभावमें ईश्वरभावकी अभिव्यक्ति नहीं। परमेश्वरसे लोग डरते हैं, उनसे संकोच होता है, यहाँ तो मनमोहन श्यामसुन्दर प्राणेश्वर, हृदयेश्वर अपने हृदयकी वस्तु हैं, परमेश्वर नहीं। अप्राकृतत्व अलौकिकताकी अभिव्यक्ति स्वाभाविकतामें बाधक होती है। जिस भगवान्‌के भ्रुकुटिभंगपर सब नाचें, अनन्तकोटि-ब्रह्माण्डनायक प्रभुके कोमल मंगलमय दोनों हाथोंको अपने एक हाथमें पकड़ नन्दरानी यशोदा—'सा गृहीत्वा करे कृष्णमुपालभ्य हितैषिणी।' (श्रीमद्भा० १०।८।३३) छड़ी दिखाकर कहती 'लाला मारूँ', अगर परमेश्वर समझती तो यह न होता, जब अपने मुखमें सम्पूर्ण विश्व दिखाकर परमेश्वरता व्यक्त की, तब छड़ी हाथसे गिर भी पड़ी, माधुर्यरस चला गया, अतः 'नटवरवपु:' यानी द्विभुज। इसका अर्थ यह नहीं कि हम चतुर्भुजत्वका खण्डन करते हैं, मगर जैसी जिसकी भावना उसके लिये भगवान् भी वैसे ही हैं। भगवान्‌द्वारा माधुर्यभावयुक्त विचित्र वेश धारण करना 'नटवरवपु:'—नटके समान और वरके समान वपु धारण किये कहा गया है। नटवरवपु देवताओंका सदा ही विचित्र वेश होता है। रस-विशेषास्वादनके लिये भगवान्‌के विचित्र वेशमें आगन्तुकता विवक्षित है। वैसे तो भगवान् सदा ही परमानन्दरसामृतमूर्ति हैं, मगर आज इच्छया परम मधुर वेश धारण किये हैं। यही कहा है—'नटवरवपु:'। नरवपु होनेसे ममता, निर्भर अनुराग अत्यन्त निःसंकोच भाव होता है, अन्यथा चतुर्भुजत्वमें ऐश्वर्याभिव्यक्ति होगी, अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायकता, सर्वज्ञता, सर्वशक्तिमत्ता पदे-पदे व्यक्त होगी, जिससे संकोच होनेके कारण भगवान्‌से प्रेममें स्वाभाविकता न आ सकेगी। प्रेममें स्वाभाविकताका होना ही उसका उत्कर्ष है। ईश्वरमें अनुरागका विधान किया जाता है, भगवान्‌में भक्तिकी विधि बतलायी जाती है। 'विधिरत्यन्तमप्राप्तौ' अत्यन्त अप्राप्तिमें ही विधि होती है, जैसे—'अग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकामः।' यहाँ अग्निहोत्रमें स्वाभाविक प्रीति नहीं, वैसे ही भगवान्‌में प्रीति स्वाभाविक नहीं, इसलिये विधि होती है, 'तस्माद् भारत सर्वात्मन् भगवान् हरिरीश्वरः। श्रोतव्यः कीर्तितव्यश्च' इत्यादि, अभय कामनावाला प्राणी भगवान्‌में भक्ति करे। इस तरह विधि जहाँ है, वहाँ उसकी अप्राप्ति समझी जाती है एवं प्राणिस्वभाव ऐसा है कि जहाँ विधि वहाँ प्रेम कम। जैसा माता-पितामें पुत्रका प्रेम तबतक, जबतक स्त्री नहीं; स्त्रीमें प्रीति, माता-पितामें नहीं; माता-पिताकी प्रीतिमें पुण्य कहा है। 'मातृदेवो भव। पितृदेवो भव' इत्यादि वाक्योंसे विधान किया है। इतना ही नहीं, मातृ-पितृ-प्रीति न रहनेपर हानि भी बतलायी गयी है, तात्पर्य, देवता-प्रीतिसे माता आदिमें प्रीति अधिक सम्भव है। मातृ-पितृ-प्रीतिसे देवता-प्रीति कठिन है, माता-जैसा प्रेम अगर भगवान्‌में हो तो क्या पूछना है, मगर न होनेसे ही भगवान्‌में प्रीतिका विधान किया गया। भगवान्‌की अपेक्षा मातृप्रीति स्वाभाविक है, आगे चलकर मातृप्रीतिसे भी स्त्रीप्रीति स्वाभाविक है। इसीलिये यहाँपर 'मातृदेवो भव' इत्यादिसे मातृप्रीतिका विधान किया गया है।