भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 95

वेणुगीत ८५ महर्षि सबको देखा, मगर मन तो उनका था 'सुमंगल' में। उनमें केवल दोष यही है कि 'काङ्क्षते हि माम्॥' वे सोचती थीं—'जो मुझे चाहते हैं, वे मुझे पसन्द नहीं हैं। जिसे मैं चाहती हूँ, वह मुझे नहीं चाहते। वे भी क्यों चाहें, वे स्वप्रकाश सच्चिद्घन परमानन्दरूपमें ही स्थित हैं, तब भी उन्हींको वरा। इसपर श्रीभगवान्‌ने उसको अपने परमसुभग वक्षःस्थलपर ही स्थान दिया। ऐसे ही सब गुण-गणोंका भी हाल है। भगवान् उन्हें नहीं चाहते, वे भगवान्‌को चाहते हैं। भगवती महालक्ष्मीको भगवान् श्रीशंकरमें भी गुण मिले, पर लक्ष्मी उनके वेशसे डर गयीं। संसारमें सामान्यतः जामाता (दामाद) कैसा ही हो, सासको अच्छा लगता है, पर पार्वती-विवाहमें हिमालयपत्नी मैना भी डर गयी थी। माता गौरी नहीं डरी। गौरीको जैसा शिवका साक्षात्कार था, वैसा महालक्ष्मीको नहीं था। उसे तो शुद्धत्वादिसर्वगुण ठीक जँचे, पर अमंगलत्वसे डर गयी।' 'महोक्षः खट्वाङ्गं परशुरजिनं भस्म फणिनः।' लक्ष्मीके लिये शिवके मोहक स्वरूपका प्रादुर्भाव न होना, भावके अनुकूल ही था। सुमंगलमें तो चमक-दमक सब कुछ, पर वह तो चाहते ही नहीं। भावुक कहते हैं कौस्तुभादिने न जाने कितनी तपस्या की। इसलिये कि भगवान् हमें स्वीकार करें, तब भगवान्‌ने स्वीकार किया। कौस्तुभादिकी कितनी भाग्यमहिमा? गोपांगनाएँ कहती हैं— सखि हों ब्रजरज क्यों न भई। ब्रजरज होतीं तो उड़कर लगतीं भगवान्‌के श्रीअंगमें। उसमें कोई विघ्न नहीं हो सकता था। कौस्तुभ तो सदा वक्षःस्थलपर विराजमान है। यहाँतक कि वृषभानुनन्दिनी भी कौस्तुभसे ईर्ष्या करती हैं। वे कहती हैं—सखि, यदि भगवान् किसीको भी न मिलते तो सन्ताप न होता, मगर माला तो सदा ही प्रभुके वक्षःस्थलपर विहार करती है। कहो, माधुर्याधिष्ठात्री श्रीवृषभानुनन्दिनी जिससे ईर्ष्या करें, उसका कम सौभाग्य है? कुण्डलकी, जो नित्य भगवान्‌के कपोलोंका चुम्बन करता है, क्या कम महिमा है? इन्होंने कितनी तपस्या की होगी? 'गोपालचम्पू' में कहा है— कुण्डलोंपर मकरीकी भावनाकर कहती है—'हे मकरि! तू हमारे श्यामसुन्दर मनमोहनके कपोलोंका चुम्बन करती है।' यह सब गोपांगनाओंकी ईर्ष्या। अस्तु, गुण अपने आश्रयमें आनन्द और महत्त्वकी अतिशयताका आधान करते हैं और अनर्थका निवारण करते हैं। अनन्त आनन्दरूप श्रीकृष्णमें आनन्द और महत्त्व निरतिशय है, उसमें अतिशयताका आधान हो ही नहीं सकता एवं अनर्थोंका स्पर्श भी नहीं, फिर उनमें गुणोंकी जरूरत ही क्या? वैसे ही भूषणोंसे शोभा बढ़ानेकी जरूरत ही क्या? जहाँ स्वयं लक्ष्मी ही निवास करती है। भगवान्‌को किसीकी अपेक्षा नहीं, किंतु उन-उन वस्तुओंकी तपस्यापर प्रसन्न होकर भक्तिको देखकर उनको स्वीकार किया। रामजीकी जब बरात निकली, तब सब शकुन आप ही प्रकट हो गये। उन्होंने सोचा, अगर इस समय न गये तो फिर सफलता कब मिलेगी? एवं सब प्रकारके भूषणभूषित भगवान् अपने स्वरूपको देख विस्मयमें पड़ गये और नाच उठे। सुनि अस ब्याहु सगुन सब नाचे। अब कीन्हे बिरंचि हम साँचे॥ (रा०च०मा० १।३०४।३) नाचका मूल आनन्दोल्लास है, वह किससे? निज प्रतिबिम्ब-दर्शनसे। तात्पर्य, प्रभु-स्वरूप ही ऐसा है, जो चराचर विश्वको नचाये और भगवान्‌को भी नचाये, स्वगुण भी भुलाये, फिर जहाँ नटवरवपु हुए वहाँ क्या कहना है? नट सभ्योंको रसास्वादन करानेके लिये विचित्र प्रकारका वेश धारण करता है, यहाँ तो भगवान् अपनी ही रुचिसे स्वाभाविक ही वैसे हैं। नट सर्व सभ्योंको रसमें ओत-प्रोत करनेके लिये विशेष तैयारी करता है, यहाँ तो वह बात नहीं। 'नटेभ्योऽपि वरं वपुः यस्य सः।' वर—दूल्हाकी तरह जो स्वभावसे ही सुन्दर हैं। लोकमें जहाँ लगन शुरू हुआ, वहाँ उबटन वगैरह लगाना शुरू हुआ। अधिक दहेजके लिये सौन्दर्य- वृद्धिका प्रयत्न करना, चमक-दमक शुरू और जब