भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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८४ भक्तिसुधा नन्दरानीके मणिमय प्रांगणमें घुटनोंको टेकते हुए चलते-चलते आप अपने मुखचन्द्रके प्रतिबिम्बको देखकर मुग्ध हो गये, नाच उठे। रूप रासि नृप अजिर बिहारी। नाचहिं निज प्रतिबिंब निहारी॥ (रा०च०मा० ७।७७।८) अपने श्रीअंगके सौन्दर्यको देखकर, अपने मुखचन्द्रका प्रतिबिम्ब देखकर स्वयं चाहते हैं कि मैं इसे ले लूँ, क्योंकि प्यारी वस्तु बिना हृदयमें रखे दूरसे देखनेमें सन्तोष नहीं होता। वास्तवमें यह भावना भक्तोंकी होती है, पर वही भावना व्रजेन्द्रनन्दन श्यामसुन्दर मनमोहनको अपने श्रीअंगका प्रतिबिम्ब देखकर हुई और वे उसे लेना, पकड़ना चाहते हैं, किंतु वह पकड़नेमें आता नहीं, इसलिये खिन्न हो गये और व्रजरानी अम्बाका मुख देखकर रोने लगे, अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायक जिसे देखकर मुग्ध हो गये, तब उसे चराचर विश्व देखकर नाच उठे, इसमें आश्चर्य ही क्या ? भगवान् अपनी सर्वज्ञता सर्वशक्तिमत्ता सब कुछ भूल गये, इस प्रकार स्वयं भगवान्को ही विस्मयमें डाल दिया, ऐसा वह स्वरूप है—'भूषणानां भूषणानि अंगानि यस्य सः॥' भगवान्के अंगसंगसे ही भूषणोंकी शोभा उनके एक-एक अंग भूषणोंको भूषित करनेवाले हैं, भगवान्के भूषण प्रभुके श्रीअंगको भूषित नहीं करते, प्रभुधारित किरीट, कौस्तुभ, कुण्डल, कटक, अंगद जो हैं, उनसे प्रभुका श्रीअंग सुशोभित हो; यह नहीं, किंतु प्रभुके सिरसे किरीट, कण्ठसे कौस्तुभ, कानोंके सम्बन्धसे कुण्डल, हाथोंसे कटक, बाहुसे अंगद आदि भूषण ही भूषित होते हैं। यही वास्तवमें ऊँचा सिद्धान्त है। यही कहा है—'चलापि यच्छ्रीर्न जहाति कर्हिचित्॥' (श्रीमद्भा० १।११।३३) लक्ष्मी, शोभा, श्री सर्वत्र चंचला कही जाती है। वस्तुमात्रमें शोभा रहती है, पर कबतक, जबतक 'जायते, अस्ति, वर्धते' बस! यहींतक, जहाँ 'विपरिणमते' आया कि शोभा घटी। वृक्षके अंकुर, पत्र, पुष्प, फलतक शोभा तथा बादमें घटना शुरू। इस रीतिसे जगत्के वस्तुमात्रमें शोभा चंचला-ही- चंचला है, किंतु अचला कहाँ ? केवल प्रभुके मंगलमय श्रीअंगमें। क्यों ? वहाँपर उसके स्वभावानुसार 'जायते, अस्ति, वर्धते' तक ही है, आगेके विकार नहीं। यों तो भगवान् षड्विकाररहित हैं, पर वह निर्गुण, निराकार सच्चिद्घन दृष्टिसे। भक्त भावुकोंकी दृष्टिमें तो वे सगुण, साकार, परमानन्द, निखिल- रसामृतमूर्ति हैं। तभी तो नन्दरानीसे जन्म 'जायते', व्रजराज नन्दबाबाके मंगलमय गोदमें शैशव-कौमार- पौगण्ड-कैशोरादि अवस्थाओंके कारण 'वर्धते' बस ! आगे विपरिणामादि नहीं। शोभा चंचला होनेपर भी घटे कैसे ? वहीं-की-वहीं पड़ी है। 'देवीभागवत' में गोलोकवर्णनके सम्बन्धमें बड़ी विचित्र गाथा है—गोलोकवासी श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दरूपके पास वृषभानुनन्दिनीका वास। यहाँ शोभा तथा प्रभा, क्षमा, शान्ति, दान्ति—ये सब गोपांगनाएँ हैं, ऐसा वर्णन है। वहाँ श्यामसुन्दर व्रजेन्द्रनन्दन भगवान्के साथ शोभा गोपांगना विहार करती थी। उस समय श्रीवृषभानुनन्दिनी पधारीं, उन्हें देखते ही लज्जा और भयसे शोभानें देह त्याग दिया और उसीमेंसे सब ब्रह्माण्डमें विद्वान्के मुख आदि वस्तुओंमें वह बँट गयी। ऐसी ही क्षमा, शान्ति, दान्ति इत्यादिकी कथा है। तात्पर्य यह कि वृषभानुनन्दिनीसे लज्जित शोभा, क्षमादि इतर वस्तुओंमें बँटी। आध्यात्मिकी, आधिभौतिकी, आधिदैविकी शक्तिरूपमें जो शोभादि भगवान्में रहा करती हैं, वे अपनी ही लालसासे रहती हैं, भगवान् उन्हें बुलाते नहीं। उद्धवसे प्रभु कहते हैं—'निर्गुणं मां गुणाः सर्वे भजन्ति निरपेक्षकम्'—सर्वगुण अपनी गुणत्वसिद्धिके लिये मुझे भजते हैं, मैं भी उनको स्वीकार कर लेता हूँ, अगर वह भक्तिपुरःसर होकर आयें तो। लक्ष्मीको भी भगवान्ने थोड़े ही चाहा, वही कहती है— 'सुमङ्गलः कश्च न काङ्क्षते हि माम्॥' (श्रीमद्भा० ८।८।२२) समुद्रमन्थनसे जब लक्ष्मीजीका जन्म हुआ, तब उन्होंने स्वयंवरके लिये देव, दानव, दैत्य,