भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवेणुगीत ८३ रन्ध्रान् वेणोरधरसुधया पूरयन् गोपवृन्दै- वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद् गीतकीर्तिः॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।५) भगवान् परमानन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्र नटवरवपुको धारण किये, बर्हमय आपीड़को धारण किये, वैजयन्ती मालाको पहने, कानोंमें कर्णिकार पहने, गोपवृन्दके संग वेणुको अधरसुधासे पूरित करते हुए श्रीवृन्दारण्य- धाममें पधारे। अनन्त ब्रह्माण्डके प्राणियोंको आनन्दित करनेवाले, रसोंके उद्गम-स्थान, निखिलरसामृत- सिन्धुसारसे प्रभु श्रीकृष्णके अंगोंका निर्माण है। निखिलरसामृतमूर्ति होते हुए भी विशेषतः उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररससे आपके श्रीअंगका निर्माण है। अन्यत्र सम्प्रयोगात्मक-विप्रयोगात्मक दोनों ही शृंगार एक-कालावच्छेदेन उद्बुद्ध एवं उद्वेलित नहीं होते। यहाँ परस्परविरुद्धधर्माश्रय ‘अणोरणीयान् महतो महीयान्' प्रभु श्यामसुन्दरमें तो दोनों ही प्रकारके शृंगाररस एककालावच्छेदेन व्यक्त होते हैं। तुव मुखचन्द्र चकोरी मेरे नयना। अरबरात निशदिन मिलिवे को, मिलेइ रहत मानो कबहुँ मिले ना॥ अद्भुत प्रेमोन्मादमें श्रीकृष्ण और वृषभानुनन्दिनीको सम्प्रयोगमें भी विप्रयोग और विप्रयोगमें भी सम्प्रयोगकी स्फूर्ति होती है। अस्तु, इस तरह उद्वेलित सम्प्रयोगात्मक- विप्रयोगात्मक उभयविध शृंगाररससारसर्वस्वसे ही नटनागरके श्रीअंगका निर्माण हुआ है। अतः वे नटवरवपु हैं, अथवा 'नटवरवपुः-नटेभ्योऽपि वरं वपुः यस्य सः।' नटोंसे भी वरशोभन, सुन्दर वपुको धारण किये हुए भगवान् पधारे। नट तो बहुत हैं, नाचनेवाले सब ही हैं, पर ब्रजमोहन श्रीकृष्णचन्द्रका नटवरवपु कुछ लोकोत्तर ही है, भगवान् श्रीशंकर विश्वनाथका तांडवनृत्य प्रसिद्ध है, जिसको देखनेके लिये सम्पूर्ण इन्द्र, चन्द्र, वरुणादिक देवता, अप्सरा, सिद्ध, महर्षि, यक्ष, किन्नरादिक सब पधारते हैं। प्रदोषकालमें जब भगवान् नटराजराज भूतभावन विश्वनाथका तांडवनृत्य होता है, तब सब देव तो क्या, स्वयं श्रीकृष्णचन्द्र भी पधारते हैं, उनका ऐसा अद्भुत नृत्य है, इसीलिये वे नटराजराज हैं। उनके जैसा तांडवनृत्य किसीका नहीं, पर श्रीकृष्ण परमानन्द- कन्द मनमोहन व्रजेन्द्रनन्दनका तांडवनृत्य तो ऐसा विलक्षण है, जो कालियनागके फणोंपर हुआ। उसकी सामग्री भी विचित्र है, जब प्रभु कालिय हृदमें प्रविष्ट हुए, उसके उन्नत फणोंपर जब नृत्य करने लगे, तब देवता, अप्सरागण वाद्य बजाने लगे। इस नृत्यके लिये दूसरा उदाहरण ही नहीं है, इसलिये ‘नटवरवपुः’ कहते हैं। नटसे, नटराजसे, नटराजराजसे भी शोभन वपुको भगवान्ने धारण किया। यह स्वरूप ऐसा है, जिसे देखकर चर-अचर, जड़-चेतन सब नाच उठे, इसलिये 'नटनं आनन्दोल्लासविकारं राति ददातीति नटवरं तद् वपुरिति नटवरवपुः'—जो स्थावर- जंगम सबको आनन्दोल्लास प्रदान करे, वह नटवर है। इसकी विशेषता क्या कही जाय, औरोंकी तो बात ही क्या, वह स्वरूप स्वयं व्रजेन्द्रनन्दन श्यामसुन्दर मनमोहन भगवान्को ही नचा देता है। भगवान् नाचे ही— यन्मर्त्यलीलोपयिकं स्वयोग- मायाबलं दर्शयता गृहीतम्। विस्मापनं स्वस्य च सौभगर्द्धेः परं पदं भूषणभूषणाङ्गम्॥ (श्रीमद्भा० ३।२।१२) भावुक जन कहते हैं—भगवान् मानव-लीलाके उपयुक्त मायाबलको दिखाते हुए ऐसे स्वरूपको धारण करते हैं कि वह स्वरूप स्वयं उन्हें ही विस्मयमें डाल देनेवाला हो जाता है। अहो! वह सौन्दर्य, माधुर्य, सौरस्य अद्भुत है, वे भाग्यवान् हैं, जो ऐसे स्वरूप-रसका आस्वादन करते हैं। अपने अमृतमय मुखचन्द्रको देखनेका सौभाग्य तो स्वयं भगवान्को नहीं, वह तो वृषभानुनन्दिनीको, व्रजांगनाओंको, भक्तोंको ही है, भगवान् केवल मणिमय प्रांगणमें मणिस्तम्भोंमें आत्मप्रतिबिम्बोंको ही देखते हैं। रत्नस्थले जानुचरः कुमारः सङ्क्रान्तमात्मीयमुखारविन्दम्। आदातुकामस्तदलाभखेदान्निरीक्ष्य धात्रीवदनं रुरोद॥