भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 92

८२ भक्तिसुधा न्यौछावर करनेवाले इन व्रजवासियोंके साथ भी उचित होगा? क्या ‘टके सेर भाजी, टका सेर खाजा’ वाली बात होगी? पूतनाके कुल-कुटुम्बमें ही ऐसा कौन बचा है, जिसे आपने सद्गति न प्रदान की हो? तृणावर्त, अघासुरादि सभी पूतनाके कुटुम्बियोंको तो आपने आत्मसमर्पण किया है। अस्तु, तात्पर्य यह निकला कि विषप्रदान करनेवाली पूतनाको भी जिन्होंने आत्मसमर्पण किया, योगीन्द्र-मुनीन्द्रोंको स्वप्नमें भी जिनका दर्शन दुर्लभ है, उन कमलदलसे भी शतकोटि गुणित अधिक कोमल अपने श्रीचरणोंसे उसके अंगपर क्रीड़ा की, जिसके प्रभावसे पूतनाका शव जब जलाया गया, तब उसमेंसे ऐसी दिव्य सुगन्धिका प्रसार हुआ, जो तीन योजनकी आसमन्तात् भूमिमें व्याप्त हो गया, उस कृपासिन्धु भगवान् श्रीकृष्णसे अधिक दयालु कौन होगा? इस श्लोकको श्रवण करते ही श्रीशुकदेवजी गद्गद हो गये और व्यासजीके पास जाकर उनसे समस्त ‘भागवत’ का अध्ययन किया। भगवान्‌में सम्प्रयोगात्मक-विप्रयोगात्मक उभयविध शृंगारकी एक कालमें प्रतिष्ठा ऐसे योगीन्द्रोंके भी निर्गुण ब्रह्मनिष्ठ, शान्त, समाहित अन्तःकरणोंको अपने दिव्य सुमधुर मनोहर सौरम्य, सौगन्ध्य, सौन्दर्य आदि गुणगणोंसे आकर्षित करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण अपने ग्वालबालोंके साथ श्रीमद्वृन्दारण्यधाममें पधारे। कैसे पधारे? ‘नटवरवपुः बिभ्रत्’ अर्थात् नटके समान और वरके समान शृंगार धारण करके पधारे। यहाँ ‘नट’ पदसे विप्रयोगात्मक एवं ‘वर’ पदसे सम्प्रयोगात्मक शृंगाररस अभिप्रेत है। नट चन्द्रमा, वायु आदि वास्तविक सामग्रियोंके अभावमें भी अपने अभिनयोंद्वारा रसका अभिव्यंजन करता है। प्रियतमके साथ सर्वांगीण संश्लेष विद्यमान होनेपर भी अकस्मात् वियोगजन्य तीव्र तापका अनुभव होता है। ‘नट’ पदसे उसी विप्रयोगात्मक शृंगाररसका ग्रहण किया है। भावुकोंके यहाँ सम्प्रयोगात्मक शृंगारकी अपेक्षा विप्रयोगात्मक शृंगारका अधिक सम्मान है, इसीलिये अभ्यर्हितत्वात् नट पदका प्रयोग पहले किया। किसीने श्रीकृष्णसे कहा—‘महाराज! ललिता, विशाखा आदि आपकी प्रियतमाएँ आपके वियोगसे अत्यन्त दुःखी हैं, आप एक बार व्रजमें जाकर उन्हें दर्शन क्यों नहीं दे आते?’ श्रीकृष्णने उत्तर दिया कि ‘अब उन्हें हमारी आवश्यकता ही नहीं रही; क्योंकि हम जब उनके पास रहते हैं, तब उन्हें हमारा केवल बाह्य रमण ही अनुभूत होता है, किंतु मेरे समीप न रहनेपर मानस संस्मरणकी विशेषतासे उन्हें हमारे सर्वांगीण आन्तर-रमणका अनुभव होता है—इस तरह जैसे सम्प्रयोगकालमें भी विप्रयोगका अनुभव होता है, वैसे ही विप्रयोग-अवस्थामें कभी- कभी सम्प्रयोगका आनन्द प्राप्त होता है।’ इसी स्थितिका वर्णन इस श्लोकमें मिलता है— प्रासादे सा दिशि दिशि च सा पृष्ठतः सा पुरः सा पर्यङ्के सा पथि पथि च सा तद्वियोगातुरस्य। हंहो चेतः प्रकृतिरपरा नास्ति मे कापि सा सा सा सा सा सा जगति सकले कोऽयमद्वैतवादः॥ (सुभाषितरत्नभाण्डागार ६।६५) जब विप्रयोगात्मक शृंगार उद्वेलित होता है, तब सकल जगत् प्रभुमय हो जाता है, अतः ‘नटवत्’ कहा। सभ्योंको रसास्वादन करानेके लिये जैसे नट विचित्र स्वरूपको धारण करता है, वैसे ही श्यामसुन्दर व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णने श्रीव्रजांगनाओंके मनको आकर्षित करनेके लिये विचित्र वेश धारण किया है। एवंच ‘वर’ पदसे प्रत्यग्रभोक्ता दूल्हा लिया जाता है। विवाहार्थ जाते हुये वर जैसे सर्वापेक्षया अधिक सुन्दर वस्त्र, आभूषण आदि धारणकर अपनेको सुसज्जित करता है, वैसे ही श्रीकृष्ण भी सुन्दर वेश धारणकर श्रीमद्वृन्दारण्यधाममें पधारे। ‘वर’ पद सम्प्रयोगात्मक शृंगारका द्योतन करता है। इस तरह नटवरवपुसे उद्बुद्ध सम्प्रयोगात्मक, विप्रयोगात्मक उभयविध शृंगाररसात्मकता भगवान् श्रीकृष्णकी बतलायी गयी है। बर्हापीडं नटवरवपुः कर्णयोः कर्णिकारं बिभ्रद् वासः कनककपिशं वैजयन्तीं च मालाम्।

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