भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवेणुगीत ८१ आत्मारामाश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे। कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरिः॥ (श्रीमद्भा० १।७।१०) शौनकजीको इस बातपर बड़ा सन्देह हुआ कि 'उन शुकदेवजीने जो जन्मसे ही सजातीय, विजातीय, स्वगतभेदरहित, अखण्ड, अनन्त, स्वप्रकाश, निर्गुण परब्रह्ममें परिनिष्ठित थे, जिनकी अखण्ड स्थिति चाहे आकाश टूट पड़े, मेरु विशीर्ण हो जाय या समुद्र सूख जाय तो भी टस-से-मस नहीं होती थी, सांसारिक मायामोहके जालमें बँध जानेके भयसे जो द्वादश वर्षपर्यन्त माताके उदरसे बहिर्भूत न होकर वहीं निर्गुण, निराकार तत्त्वमें सर्वात्मना परिनिष्ठित रहे, जैसे-तैसे गर्भसे निकलते ही अरण्यकी ओर चल पड़े, तत्त्ववित् होनेके कारण स्त्री-पुरुष आदि भेद जिनकी दृष्टिमें आता ही न था, उन महायोगी श्रीशुकदेवने अष्टादशसहस्र श्लोकवाली भागवत महासंहिताको अपने पिता श्रीव्याससे कैसे अध्ययन किया?' इसपर सूतजीने कहा- बर्हापीडं नटवरवपुः कर्णयोः कर्णिकारं बिभ्रद् वासः कनककपिशं वैजयन्तीं च मालाम्। रन्ध्रान् वेणोरधरसुधया पूरयन् गोपवृन्दै- र्वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद् गीतकीर्तिः॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।५) श्रीव्यासजीने यह श्लोक अपने कतिपय शिष्योंको पढ़ाकर उन्हें श्रीशुकदेवके पास अरण्यमें भेजा। शिष्योंने अरण्यमें शुकदेवजीके पास जाकर बड़े मधुर स्वरमें उक्त श्लोकको पुनः-पुनः पढ़ा। उसे श्रवणकर और तद्वर्णित श्यामसुन्दर मदनमोहन भगवान् श्रीकृष्णकी मधुर मनोहर मूर्तिका चिन्तनकर उनकी समाधि भग्न हो गयी। प्रेममें विभोर होकर नाचने लगे। शिष्योंने जाकर व्यासजीसे सब हाल सुनाया। व्यासजीने सोचा कि उस श्लोकका प्रभाव तो पुत्रपर हुआ, पर वह अबतक आया क्यों नहीं? दिव्य दृष्टिसे देखनेपर उन्होंने निश्चित किया कि उसे यह सन्देह हो गया कि 'ऐसे लोकोत्तर सौन्दर्य लावण्यसम्पन्न भगवान् मुझ-जैसे दीनपर कृपा कैसे करेंगे?' बस, व्यासजीने एक दूसरा श्लोक पढ़ाकर शिष्योंको पुनः शुकदेवजीके पास भेजा। शिष्योंने उस श्लोकको मधुर स्वरसे गाकर शुकदेवजीको सुनाया- अहो बकी यं स्तनकालकूटं जिघांसयापाययदप्यसाध्वी । लेभे गतिं धात्र्युचितां ततोऽन्यं कं वा दयालुं शरणं व्रजेम॥ (श्रीमद्भा० ३।२।२३) अर्थात् 'आश्चर्य है कि जिस लोकबालघ्नी दुष्ट राक्षसी पूतनाने प्रभुको मार डालनेकी इच्छासे कालकूट हलाहल विषसंपृक्त स्तन्यपान कराया, पर उसको भी जिसने माताको प्राप्त होनेयोग्य सद्गति प्रदान की, उस भगवान्से अधिक दयालु, कृपामय और दूसरा कौन होगा?' श्रीब्रह्माजीको भी इस बातकी बड़ी चिन्ता हुई थी कि भगवान् इन व्रजनिवासी गोपोंसे कैसे ऋणमुक्त होंगे? ब्रह्माने जब भगवान्से कहा कि 'हे देव! मुझे यह सोचकर बड़ा मोह हो रहा है कि आप इन ग्वालोंको क्या देकर उनके ऋणसे मुक्त होंगे? यदि कहें कि इसकी क्या चिन्ता है? उन्हें त्रैलोक्य-सुख देकर उऋण हो जाऊँगा, परंतु भगवन्! आप ही सर्वफलात्मा-अनन्त सौख्य-सिन्धु हैं। निखिल ब्रह्माण्डके समस्त प्राणी जिस आनन्दसुधा- सिन्धुके एक बिन्दुको प्राप्तकर आनन्दित हो रहे हैं- 'अस्य मात्रामुपजीवन्ति' वही अनन्त, अखण्ड, महान् आनन्दसिन्धु मूर्तिमान् जिनके आँगनमें धूलि- धूसरित होकर विहरण कर रहा है, उन्हें आनन्दबिन्दुका लोभ क्या दिखलाया जाय? इसलिये उन्हें त्रैलोक्य सुख देकर भी आप उनके ऋणसे मुक्त नहीं हो सकेंगे। यदि कहें कि केवल इन व्रजवासियोंको ही नहीं, उनके समस्त कुलको मैं अपने-आपको देकर ऋणमुक्त हो जाऊँगा तो भगवन्! क्या जो व्यवहार आपको विषमिश्रित स्तन्यपान करानेवाली पूतनाके साथ, वही इन धाम, अर्थ, सुहृत्, प्रिय देह, पुत्र, प्राण एवं अन्तरात्मा आदि सब कुछ आपके श्रीचरणोंपर