भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८० भक्तिसुधा अनुमान आदि तो प्रमाण हैं, किंतु भावना प्रमाणकोटिमें परिगणित नहीं है, अतः भावनाभावित मनोमयीमूर्तिका साक्षात्कार विधुरपरिभावित कामिनी-साक्षात्कारके समान भ्रमात्मक है। किंतु ऐसा नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि पहले कह आये हैं कि विधुरपरि- भावितकामिनी-साक्षात्कारस्थलमें वहाँ कामिनीके न होनेके कारण प्रमाणान्तरके साथ विसंवाद होनेसे वह साक्षात्कार भले ही भ्रम हो, परंतु निर्गुण परब्रह्म- साक्षात्कारस्थलमें तो उपनिषदादि प्रमाणान्तर संवाद है अर्थात् शब्दप्रमाणभूत उपनिषद् ब्रह्मका जैसा स्वरूप बतलाती हैं, वैसा ही यहाँ साक्षात्कार भी हो रहा है। अतः इसको भ्रम नहीं कहा जा सकता। भगवान् सर्वव्यापक हैं, किंतु माया-जवनिकासे समावृत होनेके कारण सबको प्रकाशित नहीं होते—'नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः।' (गीता ७।२५) किंतु वही भगवान् भक्तकी भावनासे या स्वानुग्रहविशेषसे यहाँ उस माया-जवनिकाका अपसारण कर देते हैं, वहीं उनका प्राकट्य हो जाता है। अर्थात् भावनामयी मूर्ति ही प्राकृतत्वको छोड़कर अप्राकृतत्वको धारण कर लेती है। यह ध्यानकी महिमा है, ध्यानके बढ़नेसे अलौकिकत्व आता है। उत्तराके गर्भमें अश्वत्थामाके ब्रह्मास्त्रसे परीक्षित्की रक्षा करनेके लिये क्या कहीं बाहरसे आकर प्रविष्ट हुए ? प्रह्लादके रक्षार्थ खम्भेमें कहाँसे आये ? सर्वव्यापक होनेसे वे वहाँ पहलेसे थे ही, केवल अनुग्रहसे भक्त-रक्षार्थ माया-जवनिकाको दूरकर वहाँ प्रकट हो गये। ऐसे ही निर्गुणब्रह्म-साक्षात्कार-स्थलमें भी तत्त्व सर्वव्यापक होनेसे श्रवण-मननसे ही माया-जवनिकाका अपसरण हो जानेपर उसकी उपलब्धि हो जाती है; क्योंकि ज्ञान, ज्ञेय एवं ज्ञानगम्य सबके हृदयमें स्थित है— 'ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्॥' (गीता १३।१७) किंतु उस माया-जवनिकाका पुनः आवरण न हो जाय, इसलिये उस श्रुत, मत, साक्षात्कृत तत्त्वाकाराकारित विशुद्ध मानसीवृत्तिके निरन्तर आदरपूर्वक अखण्ड प्रवाहरूप निदिध्यासनकी अपेक्षा है। इस तरह निर्गुण-सगुण भगवान्का साक्षात्कार भ्रम नहीं, अपितु परमार्थ-भूत है। अस्तु, प्रकृतमें उद्बुद्ध सम्प्रयोगात्मक- विप्रयोगात्मक उभयविध शृंगारस्वरूप निखिल रसामृतमूर्ति श्यामसुन्दर व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण ही 'बर्हापीडं' आदि वेणुगीतरूपमें श्रीव्रजांगनाओंके मानसपंकजमें पधारे और भावनाविशेषद्वारा वृद्धिंगत होकर उन व्रजांगनाओंकी अन्तरात्मा, मन, प्राण, इन्द्रिय आदिमें भरपूर होकर उनको अप्राकृत बनाकर मधुर मनोहर मंगलमयमूर्तिमें अभिव्यक्त होकर उन्होंने श्रीव्रजांगनाओंके साथ आन्तररमण किया। यह आन्तररमण ही यथार्थ रमण है, यहाँ देहादिका व्यवधान नहीं है, बल्कि अन्तःकरणमें ही श्रीकृष्णका प्राकट्य होनेसे व्रजांगनाओंसे उनका व्यवधानरहित परम आन्तररमण सम्पन्न हुआ है। यहाँका वैलक्षण्य यह है कि एक कालमें ही सम्प्रयोग-विप्रयोग उभयात्मक शृंगाररसका अनुभव होता है और दोनों ही उद्बुद्ध-उद्वेलित हैं। इसी बातको दिखलानेके लिये 'वेणुरव' शब्दका प्रयोग हुआ है। 'र' अग्निबीज होनेसे उससे विप्रयोगात्मक उद्बुद्ध शृंगाररसका ग्रहण है और 'व' अमृतबीज होनेसे उससे सम्प्रयोगात्मक उद्बुद्ध शृंगाररस गृहीत हुआ है। अमलात्मा महायोगीन्द्र भी भगवान्के लोकोत्तर माधुर्यसे मुग्ध हो जाते हैं इस रसकी यही विशेषता है कि वह बड़े-बड़े निर्विकल्प समाधिसिद्ध निर्गुणब्रह्मस्वरूपनिष्ठ महायोगीन्द्र मुनीन्द्रोंको भी अपनी ओर बलात् आकर्षित कर लेता है। आत्मस्वरूपमें रमण करनेवाले, चिज्जड़ाध्यासरूप ग्रन्थिका छेदन करनेवाले शुकादि, सनकादि महामुनीन्द्रगण भी उस अखण्ड, अनन्त, असंग, कूटस्थ, स्वात्मस्वरूपमें स्थितिको छोड़कर उस अचिन्त्य, अनन्त, सुमधुर अखिलरसामृतमूर्ति श्रीकृष्णके परम मंगलमय, लोकोत्तर, अद्भुत, मनोहर सौन्दर्य, माधुर्यके समास्वादनमें आसक्त हो जाते हैं—