भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबाह्य रमण और आन्तर रमण यहाँ यह ध्यान रखना चाहिये कि इस श्लोक और अर्थ दोनोंमें अभेद है। नाम-नामी, शब्द-अर्थमें अभेद होता है। प्रियतम प्राणधन निरतिशय निरुपाधिक परप्रेमास्पद भगवान् श्रीकृष्णका श्रीव्रजांगनाओंके साथ बाह्य और अन्तर दोनों रमण विवक्षित है। बाह्यरमण प्रिया-प्रियतमके बाह्य देहके संसर्गसे होता है, किंतु अन्तररमण तो बाह्य देहसंसर्गनिरपेक्ष प्राणोंका, मनका, अन्तरात्माका सर्वांगीण तादात्म्यसे ही बन सकता है, पर श्रीगोपिकाओंसे श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दका आन्तररमण तो तब हो, जब सचमुच ही श्रीकृष्ण उन गोपिकाओंके अन्तरमें विराजमान हों। भावनाओंके प्राखर्यसे भी भावितका साक्षात्कार होता है, पर है वहाँ भावनामय मूर्ति ही। उसके साथ होनेवाले सम्प्रयोगको तात्त्विक नहीं कहा जा सकता, अपितु वह भ्रमात्मक है; क्योंकि वहाँ अनुभव संवाद नहीं है। स्वरूपका वर्णन होनेसे एक दिव्य तेजोमय तत्त्व अभिव्यक्त होता है, वही मनोमयी मूर्ति है। उस मूर्तिमें भी रमण होता है, परंतु वह साक्षात् भी है, ऐसा नहीं कहा जा सकता। यह भावनामूलक मनोमयी मूर्ति है। हाँ, भगवान्की मनोमयी मूर्तिकी भावना भी अनन्तमहिम है, इसमें कोई सन्देह नहीं। विधुरपरिभावितकामिनीके साक्षात्कार और भगवान्की मंगलमयी, भावनामयी, मनोमयीमूर्तिके सौन्दर्य, माधुर्य-समास्वादनमें बड़ा अन्तर है। पहला अनर्थका-पतनका मूल एवं द्वितीय परम कल्याणका मूल है। मनोमयी प्रतिमाका वैशिष्ट्य भगवान्की जैसे धातुमयी, पाषाणमयी, काष्ठमयी प्रतिमा होती है, वैसी ही मनोमयी प्रतिमा होती है। पाषाणादिमयी मूर्तिके अवलम्बसे जैसे शनैः-शनैः भगवदभिव्यक्ति होती है, वैसी ही मनोमयी मूर्तिके चिन्तनसे भगवत्साक्षात्कार होता है। विधुरपरिभावित- कामिनी-साक्षात्कार-स्थलमें कामिनी विद्यमान न होनेसे वह केवल भावना है, भ्रम है, किंतु भगवान् सर्वान्तरात्मा, सर्वव्यापक हैं, भावुकपरिभावित मनोमयी भगवन्मूर्तिकी भावनाके प्राखर्यसे होनेवाला भगवत्-साक्षात्कार तात्त्विक है; क्योंकि जहाँ भगवान्का भावनाभावित साक्षात्कार हो रहा है; वहाँ सर्वान्तरात्मा भगवान् स्वयं विराजमान हैं। इसीलिये अघासुर वध-प्रसंगमें कहा गया है कि श्रीशुकदेवजीने जब कहा कि द्विजमांसरुधिराशी महापापी अघासुरके मुखसे दिव्य ज्योति निकलकर भगवान् श्रीकृष्णके मुखमें प्रविष्ट हुई, तब यह सुनकर परीक्षित्को सन्देह हुआ कि 'यह क्या ? बड़े-बड़े योगीन्द्र-मुनीन्द्रोंको भी जो गति परम दुर्लभ है, वह उस दुष्ट दानव अघासुरको कैसे प्राप्त हुई ?' इसपर श्रीशुकदेवने कहा कि जिस अखण्ड, अनन्त, स्वप्रकाश, परमानन्दमूर्ति भगवान्के श्रीअंगकी केवल मनोमयी भावनामयी मूर्ति एक बार भावुकके स्वच्छ, समाहित अन्तःकरण पंकजपर आविर्भूत होकर भागवती गति-सायुज्य मुक्ति प्रदान करती है, वही सद्घन, चिद्घन, आनन्दघन, नित्य, स्वप्रकाश रूपसे माया एवं मायिक प्रपंचको तिरस्कृत करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं जिसके उदरमें प्रविष्ट हुए, उसकी मुक्तिमें क्या सन्देह है ? सकृद् यदङ्गप्रतिमान्तराहिता मनोमयी भागवतीं ददौ गतिम्। स एव नित्यात्मसुखानुभूत्यभि- व्युदस्तमायोऽन्तर्गतो हि किं पुनः॥ (श्रीमद्भा० १०।१२।३९) भक्तकी भावनाके अनुसार ही भगवान्का स्वरूपधारण भावुकका रसिक मन भगवान्को बनाता है, भक्त जैसी-जैसी मूर्तिकी भावना करता है, भगवान्को वैसा-ही-वैसा स्वरूप धारण करना पड़ता है— 'यद्यद्धिया त उरुगाय विभावयन्ति तत्तद्वपुः प्रणयसे सदनुग्रहाय॥' (श्रीमद्भा० ३।९।११) साधारण मनुष्योंकी कल्पना मनोराज्य है, परन्तु भावुककी कल्पना फलपर्यवसायिनी होती है। इसलिये भावनाका प्राखर्य होनेपर भक्तोपहृत वस्तु भगवान्में उपलब्ध हो सकती है। यहाँ तर्क हो सकता है कि प्रत्यक्ष,