भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७८ भक्तिसुधा करपादमुखोदरादिः ।' भगवान्का श्रीमुखचन्द्र पूर्णानुराग रससार-सागर- समुद्भूत है। कमल जैसे प्राकृत सरोवरसे उत्पन्न होता है, वैसे भगवान्का मंगलमय मनोहर श्रीवदनारविन्द पूर्णानुरागरससार-समुद्भूत है। प्राकृत जलके सरोवरमें पंक-मृण्मय होता है, उस पंकसे उत्पन्न होनेवाला पंकज कितना सौरस्य, सौगन्ध्य, सौन्दर्य, सुस्पर्श- सम्पन्न होता है ? अब यदि क्षीरमय सरोवर हो तो उसमें पंक भी क्षीरसार नवनीतमय ही होगा और उससे समुत्पन्न पंकजका सौन्दर्य, सौगन्ध्य, सौरस्यादि भी अलौकिक ही होगा। यहाँ तो श्रीश्रीकृष्णमुख- पंकज पूर्णानुरागरससारसरोवर-समुद्भूत है। अतः उस सरोवरका पंक भी पूर्णानुरागरससारसर्वस्व ही होगा। उससे प्रादुर्भूत श्रीकृष्णमुखेन्दीवरकी शोभा, सौन्दर्य, माधुर्य, सौगन्ध्य, सौरस्य आदिका तो कहना ही क्या ? भगवान्का विग्रह फलात्मक है, साधन नहीं अतः श्रीकृष्णका समस्त विग्रह फलात्मक है, साधन नहीं। विधिनिषेध साधनमें ही हुआ करते हैं, फलमें नहीं। अघासुरहनन आदिकी कहीं-कहीं श्रीकृष्णमें साधनता भी थी, परंतु ध्यानकालमें तो वे सुखमात्र स्वरूप होनेसे शुद्ध फलात्मा ही हैं। यदात्मक श्रीकृष्ण होंगे, तदात्मक ही उद्बुद्ध सम्प्रयोगात्मक-विप्रयोगात्मक उभयविध शृंगाररसस्वरूप भगवद्भोग्या अधरसुधा भी होनी चाहिये। अन्यान्य अंगोंमें साधनत्वका निवेश होनेपर भी अधरसुधामें तो केवल फलात्मकता ही है। लौकिक रस तो अनुभव करते-करते कुछ कालमें विरस हो जाते हैं, परंतु इस रसकी यह विशेषता है कि यह कभी विरस नहीं होता, अपितु जैसे-जैसे अधिकाधिक अनुभूत होता है, वैसे-वैसे वृद्धिंगत होता है। कामिनी सम्प्रयोगादिमें यह बात नहीं है, वहाँ तो कामिनी आदिमें विरसता आ जाती है, पर यहाँका रस तो कभी विरस होता ही नहीं-'यह रस विरस होत नहिं कबहूँ।' हाँ तो यह रस गोपिकाओंकी अन्तरात्मा, अन्तःकरण, प्राण, इन्द्रिय, रोम-रोममें भरपूर होकर श्रीव्रजांगनाके अधरपल्लवद्वारा- बर्हापीडं नटवरवपुः कर्णयोः कर्णिकारं बिभ्रद् वासः कनककपिशं वैजयन्तीं च मालाम्। रन्ध्रान् वेणोरधरसुधया पूरयन् गोपवृन्दै- र्वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद् गीतकीर्तिः ॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।५) -इत्यादि वेणुगीतपीयूषरूपमें उद्वेलित होकर अभिव्यक्त हो गया। 'बर्हापीडं' यह साधारण श्लोक नहीं है, अपितु साक्षात् भगवद्भोग्या अधरसुधा ही है। पीछे कहा जा चुका है कि श्रीकृष्णके अधरमें रहनेवाली सुधा उन्हींके लिये सम्भोग्य कैसे हो सकती है ? यह रसशास्त्रके विरुद्ध है। परंतु भगवान्को उस सुधाका सम्भोग इष्ट है, पर यह तभी हो सकता है कि जब यह भगवद्भोग्या अधरसुधा श्रीव्रजांगनाओंके अधरपल्लवोंमें अभिव्यक्त हो। तब ही संप्रयोगात्मक शृंगारमें भगवद्भोग्या अधरसुधा भगवान्को प्राप्त हो सकेगी। इसीलिये भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दने उस सुधाको वेणुमें पूरितकर उसके छिद्रोंसे श्रीव्रजांगनाओंके कर्णकुहरद्वारा उनके हृदयमें प्रविष्ट किया। किंतु जब वह व्रजांगनाओंके द्वारा वर्णित होकर उनके अधरपल्लवपर विराजमान हो, तब उसमें भगवद्योग्यता आये। गोपिकाएँ तो विह्वल होकर उसका वर्णन करनेमें असमर्थ हो रही थीं, किंतु श्रीकृष्णको तो वर्णन कराना अभीष्ट था। अतः उन्होंने अपनी कृपाविशेषसे श्रीव्रजांगना-हृदयस्थ उस सुधाको भावनाद्वारा अभिवृद्धकर उनके मुखद्वारा वर्णन-व्याजसे अभिव्यक्त किया अर्थात् वह भगवद्भोग्या अधरसुधा वेणुगीतरूपमें श्रीव्रजांगनाओंके मुखपंकजमें आयी। वह वर्णन उद्गार होनेसे प्रयत्ननिरपेक्ष एवं बुद्धिनिरपेक्ष है, अतः स्वाभाविक है। वही 'बर्हापीडं नटवरवपुः' है, यही वेणुरव है-'इति वेणुरवं राजन्' (श्रीमद्भा० १०।२१।६) अर्थात् जो भगवद्भोग्या अधर-सुधा व्यक्त हुई, वह एतत् श्लोकात्मक है।