भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवेणुगीत ७७ मनोहर शोभाका अवलोकनकर उनके मानसपंकजमें विराजमान अनुरागरसामृतसिन्धु उद्वेलित-विक्षुब्ध हो उठता है। जैसे पूर्णिमा आदि अवसरोंपर ही सागरकी वैसी स्थिति होती है, वैसे ही प्रसंगविशेषोंपर ही यह बात होती है। भक्तिका स्वरूप भगवान्का सगुण, निर्गुण दोनों रूपोंका कर्णरन्ध्रसे ही हृदयमें प्रवेश होता है। भगवान्के मधुर मनोहर सौन्दर्यादि गुणगणोंके श्रवणसे निर्मल, विशुद्ध, गंगाजलके अखण्ड प्रवाहकी तरह द्रुत मानसवृत्तिप्रवाहका श्रीभगवान्की ओर चल पड़ना ही भक्ति है अथवा भगवान्के दिव्य गुणगणोंके श्रवणमात्रसे लाक्षाकी तरह अत्यन्त द्रुत स्वच्छ अन्तःकरणमें भगवान्की परम मनोहर मंगलमयी मूर्तिका दृढ़ अंकित होना ही भक्ति है— मद्गुणश्रुतिमात्रेण मयि सर्वगुहाशये। मनोगतिरविच्छिन्ना यथा गङ्गाम्भसोऽम्बुधौ॥ (श्रीमद्भा० ३।२९।११) द्रुतस्य भगवद्धर्माद्धारावाहिकतां गता। सर्वेशे मनसोवृत्तिर्भक्तिरित्यभिधीयते॥ इसका मूल कथा-श्रवण है। उधर (निर्गुणोपासनामें) शब्दब्रह्म (महावाक्यरूप) है। परमानन्दरसामृतमूर्ति भगवान् ही कथासुधारूपमें भावुकोंके निरावरण कर्णकुहरद्वारा निर्मल हृदय-पंकजमें प्रविष्ट होते हैं और भावनासे वृद्धिंगत होकर भक्तके मन, इन्द्रिय, प्राण, रोम-रोममें भरपूर होकर कथासुधारूपमें परिणत होते हैं। इसपर यदि कोई तर्क करे कि भावुकके हृदयमें व्यक्त भगवान्की मूर्ति भावनामयी कही जा सकती है, यह कैसे कहा जा सकता है कि भगवान् ही स्वयं भक्तहृदयमें अभिव्यक्त होते हैं? परंतु यह ठीक नहीं है। क्योंकि— ब्यापक ब्रह्म निरंजन निर्गुन बिगत बिनोद। सो अज प्रेम भगति बस कौसल्या कें गोद॥ (रा०च०मा० १।१९८) -के अनुसार भगवान्को आना-जाना कहाँ है, वे तो सर्वव्यापक हैं, सर्वत्र हैं, केवल माया- जवनिकासे आवृत हैं, बस; उस माया-जवनिकाके अपसारणका ही विलम्ब है, वे अपनी दिव्य महिमासे जहाँ उसका अपसारण करते हैं, वहीं उनका प्राकट्य हो जाता है। उत्तराके गर्भमें परीक्षित्को जो भगवद्दर्शन हुआ, वहाँ भगवान्ने उत्तराके गर्भमें क्या कहीं बाहरसे प्रवेश किया था? वे तो सर्वप्रकाशक, सर्वव्यापक होनेसे वहाँ भी थे ही, केवल अपने परम मंगलमय दिव्य अनुग्रहसे माया-जवनिकाका अपसारण करके प्रकट हो गये। इन सब विवेचनोंसे स्पष्ट हो गया कि निःसन्देहरूपसे परमार्थ तत्त्व ही शब्दब्रह्मके रूपमें भावुकोंके मुखद्वारा निकलता है और वही भावुकोंके कर्णरन्ध्रद्वारा हृदयमें आविर्भूत होता है। यह असाधारण कथासुधाकी चर्चा है। इधर भगवान्ने सोचा कि स्मरवेगसे विक्षिप्त- मनस्क इन व्रजांगनाओंसे गीतार्थका वर्णन न बन सकेगा, अतः निखिलरसात्मक निज मूर्तिको निरावरण बनाकर वेणुगीतपीयूषरूपमें कर्णकुहरद्वारा गोपिकाओंके हृदय-पंकजमें पहुँचाएँ। यह गीत पूर्व कूजनादिकी अपेक्षासे अद्भुत है। भावुकोंने श्रीकृष्णको फलात्मक माना है, साधन नहीं। सुख फलात्मक होता है, अतः उसके ही स्त्री-पुत्रादि साधन हैं। जिसके लिये सब कुछ हो और जो स्वयं अन्य किसीके लिये न हो, वही फल होता है। स्त्री, पुत्र, धन-धान्यादि सब पदार्थोंकी अपेक्षा सुखके लिये है। यदि कहा जाय कि सुख किसलिये? तो कहना पड़ेगा कि सुख और किसीके लिये नहीं, सुख-सुखहीके लिये चाहिये। अतः स्त्री-पुत्रादि सब सुखके साधन हैं और सुख फलात्मक है। ऐसे ही भगवान् तो सुखके भी सुख होनेसे परम फलस्वरूप हैं; क्योंकि परम आनन्द- रसमूर्ति हैं। जैसे खाँडके खिलौनेके समस्त अवयव खाँडके ही होते हैं, वैसे ही निखिल रसामृतमूर्ति भगवान् श्रीकृष्णके हस्तारविन्द, पादारविन्द, मुखारविन्द सभी श्रीअंग परमानन्दमय ही हैं— 'आनन्दमात्रं