भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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प्रकार है। जब भगवान्‌के अधरपल्लवोंसे सम्बन्धित वेणुमें भरपूर होकर उसके छिद्रोंसे निकलकर वह सुधा व्रजसीमन्तिनियोंके निरावरण कर्णकुहरोंद्वारा उनके अन्तःकरणमें निविष्ट होकर, वहाँसे उनके अन्तःकरण, प्राण, अन्तरात्मा, इन्द्रिय, रोम-रोममें भरपूर होकर मुखमें आकर उनके अधरपल्लवोंद्वारा वर्णित हो, तभी वह सुधा भगवद्भोग्या हो। यहाँ कुछ लोग सन्देह करते हैं कि यह असंगत है; क्योंकि पहले श्लोकमें 'चुक्कूज वेणुम्' से वेणुका कूजन कहा गया और दूसरे ही श्लोकमें 'आश्रुत्य वेणुगीतम्' से वेणुगीत कहा गया, यह कैसे? कूजन तो अर्थसम्बन्धविहीन ध्वनिमात्र है, किंतु गीतका तो कुछ अर्थ होता है। ऐसी स्थितिमें पहले श्लोकमें जिसे कूजन कहा गया, दूसरे ही श्लोकमें उसकी ही गीतोक्ति असंगत है। एवं च जब स्मरवेगसे विक्षिप्त-मनस्क होनेके कारण वर्णन न कर सकी—'तद् वर्णयितुमारब्धाः। नाशक्नुन् स्मरवेगेन।' तब बीचमें 'बर्हापीडं नटवरवपुः।' (श्रीमद्भा० १०।२१।५) इत्यादि वर्णन और 'इति वेणुरवं श्रुत्वा' यह सब कैसे ? इसका समाधान यह है कि यहाँ पहले श्लोकमें श्रीकृष्णका श्रीवृन्दावन- प्रवेश वर्णित है, दूसरेमें उनके द्वारा वेणुकूजन। इस कूजनद्वारा अन्तःकरणमें श्रीकृष्णस्वरूपका अनुभव करके ज्यों ही कोई व्रजांगना अपनी सखियोंसे अपने अनुभवका वर्णन करने लगीं, त्यों ही भावनाजन्य स्मरवेगसे मूर्च्छित हो गयीं। फिर सावधान होनेपर वर्णनका प्रयत्न करनेपर पुनः श्रीकृष्णका स्मरण हुआ, क्योंकि वर्णन करनेके लिये उस वर्णनीय तत्त्वका पहले स्मरण होना स्वाभाविक था, किंतु उसका स्मरण होनेसे पुनः मूर्च्छित हो गयीं। इस तरह जब-जब वर्णन करनेका प्रयत्न करती हैं, तब-तब स्मरवेगके कारण मूर्च्छा आ जानेसे वर्णन करनेमें असमर्थ हैं, परंतु भगवान् श्रीकृष्णको तो उनसे वर्णन कराना इष्ट है; क्योंकि जब व्रजांगनाओंके द्वारा उसका वर्णन हो, तभी वह भगवान्‌की अधरसुधा भगवद्भोग्यारूपमें अभिव्यक्त हो। अतः भगवान्‌ने कृपाकर अपने उद्बुद्ध संप्रयोगात्मक-विप्रयोगात्मक उभयविध शृंगाररसात्मकस्वरूपको अधरसुधारूपसे स्वाधरपल्लवपर विराजमान वेणुमें भरकर उस वेणुके छिद्रोंद्वारा निर्गत गीतपीयूषरूपसे श्रीव्रजसीमन्तिनियोंके निरावरण कर्णकुहरद्वारा उनके निर्मल स्वच्छ अन्तःकरण-पंकजमें प्रविष्ट होकर उनकी अन्तरात्मा, अन्तःकरण, प्राण, इन्द्रिय, रोम-रोममें भरपूर होते हुए उनके अधरपल्लवतक परिपूर्ण हो गये, अब वह परिपूर्ण अधरसुधा उन श्रीव्रजांगनाओंके प्रयत्न निरपेक्ष ही अपने-आप उनके अधरपल्लवोंसे 'बर्हापीडं नटवरवपुः' इस गीतरूपमें उच्छलित होकर अभिव्यक्त हो उठी। इसीलिये यह उस अनुभूत तत्त्वका उद्गार है, वर्णन नहीं। किसी अतिदिव्यपात्रमें कोई सुमधुर रस भरा हुआ हो और भरपूर होनेसे वायुके आघातसे वह रस उच्छलित होकर पात्रमेंसे निकल पड़ता है या स्वयं ही उस रसमें कोई अलौकिक उफान आनेसे वह रस स्वयं उद्वेलित होकर छलक पड़ता है। ऐसी ही अवस्था भावुकोंकी होती है। वे लोग किसी उद्दीपनादि सामग्रीको देखते ही अपने प्रियतमके स्मरणसे विह्वल होकर पुलकित हो उठते हैं, देहभान भूल जाते हैं, पुनः-पुनः स्मरणजन्य भावनाविशेषसे उनके मानस- पंकजमें विराजमान मूर्तिमान् वह दिव्यरस उनके रोम- रोममें भरपूर होकर स्वयं उनके मुखसे शब्द-ब्रह्मरूप कथासुधाद्वारा बरबस अभिव्यक्त हो उठता है। श्रीहनुमान्‌जीको भी भीमके दर्शनद्वारा जैसे अपने ध्येय, ज्ञेय, परमाराध्य, श्रीमद्राघवेन्द्र रामचन्द्रकी स्मृति हुई, वैसे ही भावुकोंको किसी उद्दीपन- सामग्रीके दर्शनसे अपने प्रियतम प्राणधनका स्मरण होता है। जैसे चन्द्रदर्शनसे समुद्र उद्वेलित होता है, वैसे ही उत्ताल तरंगोंसे परम सुन्दर श्रीमुखचन्द्रको देखकर श्रीवृषभानुनन्दिनी श्रीराधिकाके अन्तःकरणमें विराजमान अनुरागससारसागर उद्वेलित होकर कथारूपमें व्यक्त हो उठता है। यही अवस्था श्रीकृष्णकी भी है—वृषभानुनन्दिनीके दिव्य सौन्दर्यमय श्रीमुखचन्द्रकी