भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसकता है, जिनकी भगवदीयता, रसात्मकता अभिव्यक्त हो चुकी हो। इसीलिये जिनकी भगवदीयता, रसरूपता पहले व्यक्त नहीं थी, उनकी वह रसस्वरूपता इस वेणुकूजनसे व्यक्त हुई। जहाँ वह पहलेसे ही व्यक्त थी, वहाँ स्मरका—स्मरणका उदय हुआ। नादसे उद्दीपन-विधया भी स्मृति हो सकती है। नादके श्रवणसे उसके उद्गमस्थलकी स्मृति होनी स्वाभाविक है। संसारके समस्त प्रवाहोंका स्वभाव है कि वह अपनेमें निपतित वस्तुको अपने गन्तव्य स्थानमें ले जाता है। जैसे गंगाके प्रवाहमें पड़ा हुआ पुष्प गंगाके गन्तव्य स्थानकी ओर बह जाता है, परंतु वेणुनादप्रवाहका इससे विपरीत स्वभाव है। वह अपनेमें निपतित वस्तुको गन्तव्य स्थलकी ओर न ले जाकर अपने उद्गमस्थानकी ओर ले जाता है। अतः भगवान् श्रीकृष्णके मुखचन्द्रनिर्गत वेणुगीतके अखण्ड प्रवाहमें निपतित श्रीव्रजांगनाओंका मन उस प्रवाहके उद्गमस्थान श्यामसुन्दर व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णकी ओर बह चला और मनके पीछे उनका शरीर भी बह चला। इस वेणुकूजनके प्रभावसे कुछ गोपांगनाओंको सचमुच ही स्मरका—कामका उदय हुआ; क्योंकि यह कूजननाद कामका मुख्य दूत है—'मन्मथस्याग्रदूतः।' यह नाद मोहनमन्त्र है, अतः इसे श्रवणकर श्रीव्रजगोपिकाएँ मूर्च्छित हुईं। यह मूर्च्छा संचारी भाव है। यहाँ तो मूर्च्छा क्या, अपस्मारतक रस है। संसारके रागमें तो सभी मूर्च्छित हैं, परंतु श्यामसुन्दर मनमोहन श्रीव्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णके लोकोत्तर सुमधुर अद्भुत सौरस्य, सौगन्ध्य, सौन्दर्यसम्पन्न माधुर्यपर मोहित होकर मूर्च्छित होनेका विलक्षण सौभाग्य तो माधुर्याधिष्ठात्री परमान्तरंगा श्रीवृषभानुनन्दिनी आदि कतिपय व्रजसीमन्तिनियोंका ही है। अस्तु, उस परम मनोहर मोहनमन्त्र वेणुकूजनके श्रवणसे मूर्च्छित होनेपर श्रीकृष्णके अनुग्रहविशेषसे कुछको सावधानता प्राप्त हुई। तब सावधान होकर उन्होंने उस कूजनकी ओर अपने नेत्र और मनको लगाया। पहले वेणुकूजनका प्रयोजन उन्हें सावधानकर संकेत करना था। जब वे सावधान हो गयीं, तब श्रीकृष्णने वेणुद्वारा गीत गाया, जो स्पष्टार्थक था। यह गीत भगवदीय रसका निरूपक है अर्थात् भगवान्के लीलाविशिष्ट तात्कालिक स्वरूपका स्पष्ट निर्देश इस वेणुगीतसे हुआ। जिन गोपिकाओंने उसे सुना, उनके अन्तःकरणमें भगवत्स्वरूप व्यक्त हुआ। उनके विविध हाव-भाव आदि व्यक्त हुए। इन सबसे वे फिर मूर्च्छित हुईं; क्योंकि इस समय गीतार्थद्वारा श्रीकृष्णके रसात्मक साक्षात् स्वरूपका उन्हें स्मरण हुआ। बारम्बार स्मरणके बाहुल्यसे कुछ गोपांगनाओंको तो अन्तःकरणमें प्रियतम प्राणधन श्रीकृष्णका आलिंगन प्राप्त हुआ। फिर उनमेंसे ही किन्हींने अपनी सखियोंसे उसका वर्णन करना आरम्भ किया— तद्वर्णयितुमारेभाः स्मरन्त्यः कृष्णचेष्टितम्। नाशकन् स्मरवेगेन विक्षिप्तमनसो नृप॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।४) उस वेणुगीतसे श्यामसुन्दर मनमोहन श्रीकृष्णका स्मरण हुआ, परंतु उसका वर्णन करनेमें स्मरवेगवश वे समर्थ न हो सकीं। मनसे एक बार एक ही कार्य हो सकता है, या तो वे अनुभव करें या स्मरण करें, परंतु अनुभव या स्मरणके साथ-साथ वर्णन नहीं हो सकता। शिव, काकभुशुण्डि, सनक, शुकदेव आदि सबकी यही स्थिति है। वे लोग या तो भगवान्के परम मंगलमय दिव्य सौन्दर्य-माधुर्यादिका अनुभव स्मरण करते हैं या वर्णन किया करते हैं। यह वर्णन भी बुद्धिपूर्वक नहीं, अपितु उद्गार है। भावना करते- करते रस जब अन्तःकरण, प्राण, इन्द्रिय, रोम-रोममें भर जाता है, तब वह मुखमें आकर उच्छालित हो उठता है, वही उनका उद्गार है। वर्णनकालमें श्रीकृष्णचेष्टितका स्मरण हो जानेसे वर्णन ही नहीं हो सकता, किंतु भगवान् श्रीकृष्णको तो गोपिकाओंद्वारा वर्णन कराना अभीष्ट है; क्योंकि तभी वह सुधा भगवद्भोग्या बन सकेगी। भगवान्के अधरमें रहनेवाली सुधा भगवद्भोग्या कैसे हो? भगवान् स्वयं अपने- आप ही स्वाधरोष्ठस्थित सुधाका पान करें, यह तो विपरीत है। तब यह हो कैसे? हाँ, इसका एक ही