भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउसी वेणुगीतके श्रवणसे वात्सल्यभावका उदय हुआ। अस्तु, कुछ व्रजांगनाएँ वेणुगीतकूजनको श्रवणकर मूर्च्छित हुईं, कुछ कालमें पुन: सावधानता आनेपर वेणुगीत सुना, उसका तत्त्व समझकर प्रेमोन्मादमें पुन: मूर्च्छित हो गयीं। भगवान्के अनुग्रहविशेषसे पुन: सावधान होकर अपनी सखियोंसे उस तत्त्वका वर्णन करनेमें प्रवृत्त हुईं। तद् व्रजस्त्रिय आश्रुत्य वेणुगीतं स्मरोदयम्। काश्चित् परोक्षं कृष्णस्य स्वसखीभ्योऽन्ववर्णयन्॥ तद् वर्णयितुमारेभाः स्मरन्त्यः कृष्णचेष्टितम्। नाशकन् स्मरवेगेन विक्षिप्तमनसो नृप॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।३-४) जब भगवान् श्रीकृष्णने वेणुकूजन किया—वंशी बजायी—तब सभी श्रवणकर्ता उससे प्रभावित हुए। क्योंकि कूजन या ध्वनिका यह स्वभाव है कि श्रोतापर कुछ-न-कुछ प्रभाव अवश्य करती है। विशेषतः इस वेणुकूजनके श्रवणसे सबमें भगवदीयताका भाव आविर्भूत हुआ। कूजन, नादकी यह महिमा है कि जिससे यह सम्बन्धित हो, उसे भगवान्का बना दे। यहाँ कूजन, रव और गति भिन्न-भिन्न हैं; क्योंकि यह भगवदधर-सुधासे संवलित हैं। भगवान्की अधरसुधाके सभी समान अधिकारी नहीं हैं, अतः स्वस्वाधिकारानुसार उसमें अधरसुधा-वितरणके लिये वेणुवादनमें भी कूजनादि भेद हैं। अधरसुधाके तीन भेद हैं—१. देवभोग्या, २. भगवद्भोग्या, ३. सर्वभोग्या। ये तीनों सुधाएँ श्रीकृष्णके एक ही अधरमें रहती हैं। परंतु इनका दान उन योग्य अधिकारियोंको ही होता है, सबको नहीं। यहाँ भावुकोंका भाव यह है— 'अधर एव लोभः' इस उक्तिके अनुसार भगवान्का अधर ही साक्षात् मूर्तिमान् लोभ है। जैसे भगवान्का मन चन्द्रमा, सूर्य नेत्र आदि हैं, वैसे ही मूर्तिमान् लोभ अधर है। भाव यह है कि भगवान्ने अपने अधरसुधारूप कोषका अध्यक्ष लोभको बनाया। अध्यक्ष-भण्डारी कृपण होना चाहिये। वह जिसे जिस वस्तुका और जितनेका अधिकारी समझे, उसे उस वस्तुको उतना ही प्रदान करे। इसीलिये भगवान्ने स्वाधरसुधाका अध्यक्ष लोभको बनाया, जिससे वह एक ही अधरमें रहनेवाली तीन तरहकी सुधाको अधिकारानुसार प्रदान करे। अतः यहाँ यद्यपि वेणुकूजनको व्रजस्थ सभी प्राणियोंने सुना, परंतु उसके द्वारा वितरित होनेवाली अधरसुधाकी प्राप्ति श्रीवृषभानुनन्दिनी, ललिता, विशाखा आदि अधिकारिणी अन्तरंगभूता व्रजांगनाओंको ही हुई। पहले कहा जा चुका है कि वेणुछिद्रद्वारा निर्गत भगवान् श्रीकृष्णकी अधरसुधाके सम्बन्धसे सब रसात्मक हो गये। यों देखें तो निखिल विश्व आनन्दरूप ही है; क्योंकि यह समस्त चराचर जगत् एक अखण्ड, अनन्त, निर्विकार आनन्दसे उत्पन्न हुआ, उसीमें स्थित है और उसीमें लीन होता है, अतः आनन्दस्वरूप ही है। जैसे घट, शराव, उदंचनादि पदार्थ मृत्तिकासे उत्पन्न होते हैं, उसीमें स्थित होते हैं और अन्तमें उसीमें लीन होते हैं, अतः मृत्तिकास्वरूप ही हैं। तो भी विश्वकी आनन्दरूपता मायासे आवृत होने 'आनन्दाद्धयेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। आनन्देन जातानि जीवन्ति। आनन्दं प्रयन्त्यभि- संविशन्ति।' (तैत्तिरीय० ३।६) के कारण अभिव्यक्त नहीं है—'नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः।' (गीता ७।२५) जैसे काष्ठोंमें अग्नि व्यापक होते हुए भी अव्यक्त है, दाहकत्व-प्रकाशकत्व रूपमें व्यक्त नहीं है, परंतु दाहकत्व-प्रकाशकत्वविशिष्ट साक्षात् व्यक्त अग्निसे उन काष्ठादिका सम्बन्ध होते ही उनमें भी अग्नि व्यक्त हो जाता है, वैसे ही समस्त विश्व आनन्दरूप-रसात्मक होते हुए भी उसकी रसात्मकता अभिव्यक्त नहीं है। जब शुकादि ऐसे महापुरुषोंका, जिनकी साक्षाद्भगवत्सम्बन्धसे रसात्मकता व्यक्त हो गयी है, अनुग्रह प्राप्त होता है, तब उसकी स्वाभाविकी रसात्मकता अभिव्यक्त हो जाती है। 'देवो भूत्वा देवं यजेत्।' अर्थात् भक्त स्वयं भगवद्रूप होकर भगवान्का यजन करे, इस सिद्धान्तके अनुसार अचिन्त्य, अनन्त, परमानन्दमय निखिल रसामृतमूर्ति भगवान् श्रीकृष्णका अन्तरंग रमण उन्हींके साथ हो