भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवेणुगीत ७३ पहले श्रीकृष्ण-प्राप्तिके लिये जैसे कात्यायन्यर्चन- व्रतका अनुष्ठान किया था, वैसे ही भगवान्ने वंशी- आराधन किया, वंशी साक्षात् भगवान् रुद्र हैं— ‘रुद्रस्तु भगवान् वंशः।’ बिना भगवान् शिवकी आराधना किये क्या अभीष्ट फल कभी प्राप्त हो सकता है?—‘इच्छित फल बिनु सिव अवराधें। लहिअ न कोटि जोग जप साधें॥’ (रा०च०मा० १।७०।८) इसलिये श्रीकृष्णने श्रीमद्व्रजांगनाओंकी प्राप्तिके लिये वंशीरूप भगवान् रुद्रका आराधन आरम्भ किया। आराधनाका प्रकार भी विचित्र था। अपने सुमधुर कोमल अधरपल्लवपर वंशीको शयन कराते हैं, अपने अनेक दिव्य रसमणिजटित मुकुटका उसपर छत्र करते हैं, परम देदीप्यमान सुवर्ण मणिमय कुण्डलोंसे आरती उतारते हैं, सुमधुर अधरसुधाका भोग लगाते हैं और अपने कोमल अंगुलिदलोंसे उसका पादसंवाहन करते हैं—पैर दबाते हैं। इस प्रकार आराधन करते-करते श्रीकृष्णको यह जाननेकी इच्छा हुई कि अभी इष्टदेव प्रसन्न हुए या नहीं। इसके लिये वंशीकी परीक्षा चली। एक दिन उसकी ध्वनिसे यमुनाकी गति रुक गयी। वंशीके उस दिव्य प्रभावको देखकर विश्वास बढ़ा, श्रद्धा बढ़ी, इससे पूजा भी बढ़ी, आराधना और तन्मयतासे चलने लगी। एक दिन वृन्दावनके पाषाण वंशीकी ध्वनिको श्रवणकर द्रवीभूत हो गये, पशु-पक्षी, देवताओंके विमान आदिकी गति रुक गयी, सब स्तब्ध हो गये। इस प्रकारसे जब पूर्ण रीतिसे वंशीकी परीक्षा हो गयी, तब श्रीकृष्णने आज गोपांगनाओंके लिये उसे बजाया— ‘तद् व्रजस्त्रिय आश्रुत्य वेणुगीतं स्मरोदयम्।’ (श्रीमद्भा० १०।२१।३) उस वेणुगीतको जैसे श्रीव्रजांगनाओंने सुना, वैसे ही औरोंने भी सुना, परंतु रसिकताके अभाववश औरोंपर उसका प्रभाव न हुआ। ठीक ही है, अरसिकोंसे रसका निवेदन निष्फल ही होता है— ‘अरसिकेषु कवित्वनिवेदनं शिरसि मा लिख मा लिख मा लिख।’ अतः समस्त व्रजवासियोंने उसे सुना, पर रसिकशिरोमणिका कुछ व्रजांगनाओंपर प्रभाव अधिक व्यक्त हुआ। यहाँ आश्रुत्य पदका प्रयोग है, अतः आ ईषत् श्रुत्वा यह अर्थ हुआ। अर्थात् वेणुवादन दूर वृन्दावनमें हुआ और गोपांगनाएँ व्रजमें थीं। अतः उन्होंने दूर होनेके कारण स्पष्ट नहीं सुना, अपितु ईषत्—थोड़ा सुना। सुनते ही मूर्च्छित हो गयीं, कुछ देरके बाद उनकी मूर्च्छा भंग हुई। श्रीव्रजसीमन्तिनियोंने वेणुगीत सुना और दूसरोंने वेणुकूजन सुना। कूजनमें अर्थविहीन केवल ध्वनि होती है, परंतु गीत सार्थक—अर्थयुक्त होता है। इसीलिये जिन व्रजदेवियोंने गीत सुना, उनके अन्तःकरणमें गीतके अर्थ श्रीमद्व्रजेन्द्रकिशोर मनमोहन श्यामसुन्दरका सुन्दर स्वरूप अभिव्यक्त हुआ, किंतु अन्योंने कूजन सुना, अतः उनके मनमें उस मधुरमूर्तिका उदय नहीं हुआ। ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र आदिने भी वेणुकूजन सुना, सभी एक भावविशेषमें मुग्ध तो हुए। किसीकी समाधि भी भंग हुई, परंतु किसीको उसका तत्त्वरहस्य निश्चितरूपेण ज्ञात न हो सका— ‘शक्रशर्वपरमेष्ठिपुरोगाः।’ .... ‘कश्मलं ययुर- निश्चिततत्त्वाः॥’ (श्रीमद्भा० १०।३५।१५) चतुर्दश भुवनोंमें वंशीका रव हुआ। सभी मुग्ध हुए, जिनपर विशेष प्रभाव पड़ा, वे भावावेशमें प्रेमोन्मादमें मूर्च्छित हो गये। आज भी श्रीकृष्णकी नित्य लीलाएँ चल रही हैं, आज भी वंशीवादन हो रहा है। भगवान् जैसे श्रीव्रजांगनाओंको चाहते हैं, वैसे प्रत्येक प्राणीको चाहते हैं। प्रत्येकके लिये उनका वेणुगीत सदा गाया जा रहा है। उस गीतकी मनोहरता भी सर्वजनोंके लिये है—‘सर्वभूतमनोहरम्।’ (श्रीमद्भा० १०।२१। ६)। परंतु महामोहावृतमनस्क होनेके कारण लोगोंकी प्रवृत्ति उधर नहीं होती। ‘काश्चित् परोक्षं कृष्णस्य स्वस- खीभ्योऽन्ववर्णयन्॥’ (श्रीमद्भा० १०।२१।३) यहाँ ‘काश्चित्’ पदसे यह भाव निकला कि कान्तभाववती व्रजांगनाओंको तो स्मरोदय हुआ, परंतु श्रीमन्नन्दगेहिनी श्रीयशोदा, श्रीरोहिणी आदि मान्याओंमें