भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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है। यद्यपि गोपांगनाएँ उस समय व्रजमें हैं और गोपालोंके साथ श्रीकृष्ण उनसे दूर हैं तथापि उन्हींके यह उद्बुद्ध सम्प्रयोग शृंगाररसात्मा श्रीकृष्ण अनुभूयमान हैं। सर्वविध क्रियाशक्तिका संचार गोपालोंमें एवं ज्ञानशक्तिका संचार बलभद्रमें है। यह सब स्थिति व्रजदेवियोंको पूर्णतया ज्ञात है। यह आसक्तिकी महिमा है, आसक्तिके प्राखर्यसे दूरस्थ श्रीकृष्णकी सब लीलाएँ व्रजस्थ श्रीगोपांगनाओंको प्रत्यक्ष अनुभूयमान हो रही हैं। विद्या जैसे पंचपर्वा है, वैसे अविद्या भी पंचपर्वा है। अविद्यामें अन्तिम आसक्ति और विद्यामें अन्तिम भक्ति है। इन दोनोंका स्वरूप प्रायः एक ही है। गोपांगनाओंकी श्रीकृष्णविषयिणी आसक्ति अत्यन्त उत्कट थी, उन्होंने समस्त सांसारिक सुख एवं तत्सामग्रियोंको तुच्छ समझ लिया था, श्यामसुन्दर व्रजेन्द्रनन्दन मनमोहन श्रीकृष्ण ही उनके ज्ञेय, ध्येय, परमाराध्यसर्वस्व थे। दूर रहनेपर श्रीव्रजांगनाओंको उनके समस्त रहन-सहन, गति, विलासादिका साक्षात् अनुभव होता है। इसलिये गोपांगनाएँ महायोगीन्द्रकी गतिपर अवस्थित थीं। उन्हें आसक्तिवशात् विप्रयोगकालमें ही भगवान्‌का मानस-सम्मिलन प्राप्त होनेसे संप्रयोगात्मक शृंगारका अनुभव हुआ। उस उद्बुद्ध सम्प्रयोगात्मक-विप्रयोगात्मक उभयविध शृंगाररसात्मक प्रियतम प्राणधन भगवान् श्रीकृष्णस्वरूप वेणुगीतका श्रवणकर व्रजदेवियोंको स्मरोदय हुआ—‘तद् व्रजस्त्रिय आश्रुत्य वेणुगीतं स्मरोदयम्।’ (श्रीमद्भा० १०।२१।३) उत्कण्ठापूर्वक स्मरण ही ‘स्मर’ है। ‘स्मरोवाव आशाया भूयान्’ इस श्रुतिके अनुसार स्मरका तात्पर्य यहाँ काममें नहीं है। अर्थात् वेणुगीतका श्रवणकर गोपांगनाओंको उस वेणुगीतके उद्गमस्थल श्रीकृष्णका अत्यन्त उत्कट उत्कण्ठापूर्वक स्मरण हुआ। ज्यों ही श्रीव्रजांगनाओंके निरावरण कर्णकुहरोंद्वारा वेणुगीत उनके अन्तःकरणमें प्रविष्ट हुआ, त्यों ही श्रीकृष्णस्वरूपके स्मरणकी धारा बह चली। कुछ व्रजांगनाओंके मनमें वस्तुतः कामका भी उदय हुआ। अथवा स्मरोदयका अर्थ ‘स्मरेण स्मरणेन उदयो यस्य’ ऐसा किया। अर्थात् श्रीकृष्ण जब श्रीमद्वृन्दावनमें पधारे, तब यहाँके पद्मामोदित वायुके संस्पर्श एवं भृंगविहंगमोंके कलरवका श्रवणकर उससे उन्हें व्रजदेवियोंका स्मरण हुआ और उसी स्मर— भावविशेषरूप उद्दीपन विभावसे वेणुगीतका उदय हुआ। भगवान् तो वेणुवादनविनोदपरायण हैं, वे रोज ही वेणु बजाते हैं, किंतु आजके वेणुगीतमें कुछ वैशिष्ट्य है। अथवा ‘तासामेव स्मरेण स्मरणेन उदयो यस्य, तं स्मरोदयम्’ अर्थात् विचित्र कोकिला आदिके मधुर शब्दके श्रवणसे वृषभानुनन्दिनी श्रीराधाका स्मरण होनेसे वेणुगीतका उदय हुआ। भगवत्सम्मिलनके लिये उत्कण्ठाके उत्कर्षकी आवश्यकता साधारण भक्त भगवान्‌से मिलनेका उपाय सोचा करता है और उत्कण्ठापूर्वक उनका स्मरण करता रहता है। जब उत्कण्ठा अत्यन्त बढ़ जाती है, तब यही उत्कण्ठा भगवान्‌में चली जाती है और पहले जैसे भक्त भगवान्‌से मिलनेके उपाय सोचा करता था, वैसे ही अब भगवान् भक्तसे मिलनेके उपाय सोचते हैं। कामुक जैसे कामिनीके सम्मिलनके लिये उत्कण्ठित होकर अनेक उपाय सोचता है, वैसे ही भगवान् भी अपनी भक्तिरूपा आह्लादिनीशक्ति परमान्तरंगा माधुर्याधिष्ठात्री महाशक्तिरूपा श्रीमद्वृषभानुनन्दिनी आदिके सम्मिलनके लिये उत्कण्ठित रहते हैं और सोचते हैं कि उनसे मिलनेका कोई उपाय निकालना चाहिये। जैसे कामुक कामिनीको वशमें करनेके लिये किसी मोहनमन्त्रका प्रयोग करें, वैसे ही श्रीकृष्ण श्रीराधा, ललिता, विशाखा आदि परमान्तरंगा ......माधुर्याधिष्ठात्री एवं तदंशभूता व्रजांगनाओंको वशमें करनेके लिये मोहनमन्त्र ढूँढ़ने लगे। फिर उन्होंने वंशीकी आराधना प्रारम्भ की। वेणु-कूजनका प्रभाव यहाँ एक बात बड़े महत्त्वकी है, व्रजांगनाओंने