भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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वेणुगीत ७१ वायु, आदित्य आदि देवताओंने उसे उठानेका अपने सामर्थ्यभर बहुत प्रयत्न किया तो भी उस विराट्का उत्थान नहीं हुआ—'नोदतिष्ठत्तदा विराट्।' (श्रीमद्भा० ३।२६।६३) अन्तमें जब भगवान्ने उसमें प्रवेश किया, तब वह उठ सका— चित्तेन हृदयं चैत्यः क्षेत्रज्ञः प्राविशद्यदा। विराट् तदैव पुरुषः सलिलादुदतिष्ठत ॥ (श्रीमद्भा० ३।२६।७०) भगवान्के प्रवेशसे वृन्दावनधाम रसमय हो गया भगवान्के बिना कहीं भी शान्ति नहीं, शोभा नहीं। इसीलिये वृन्दावनके तरु, लता आदि समस्त भगवान्का अपनेसे समागम होनेपर अपनी कृतार्थता मानते हैं। जब सर्वत्र भगवत्प्रवेश हो, तब इनमें रसात्मकता आये। इसीलिये श्रीमद्वृन्दावनमें भगवान् श्रीकृष्णका प्रवेश हुआ। सच्चिदानन्दरूप भगवान् सर्वान्तरात्मा होनेसे सर्वव्यापक हैं, इसलिये यद्यपि वृन्दावनके समस्त तत्त्वोंमें सदंश एवं चिदंश अभिव्यक्त था और आनन्दांश अव्यक्त था, निखिल रसामृतमूर्ति अभिव्यक्त परमानन्द सुधासिन्धु भगवान् श्रीकृष्णके प्रवेशसे सच्चिदंश गौण होकर आनन्दांश पूर्णतया अभिव्यक्त हो गया और समस्त वृन्दावनधाम रसात्मक हो गया। अतएव यहाँ भगवान्का वृन्दावनमें आत्यन्तिक प्रवेश कहा गया है—'न्यविशद् वायुना वातम्।' (श्रीमद्भा० १०।२१।१) (न्यविशत्- नितराम्, अविशत्)। कुसुमित वनराजिसे उन्मत्त भृंग एवं विहंगमोंके निनादसे उद्बुद्ध हुई वनदेवताएँ, वनदेवियाँ श्रीकृष्ण- सम्मिलनके लिये सजग हो उठीं। तब मधुपतिरूपसे श्रीकृष्णका वृन्दावनमें निवेश हुआ। यहाँ 'मधु' चैत्रमासको भी कहते हैं और उसका पति वसन्त हुआ। अतः हरे, पीले, लाल पत्र-पुष्पोंसे सुसज्जित वसन्तके समान अनेकविध वर्णविशिष्ट पत्र-पुष्पादिसे सुशोभित सुन्दर वनमाला धारण किये हुए भगवान् श्रीकृष्ण वृन्दावनधाममें पधारे अथवा 'मधु' शब्दसे वसन्तका भी बोध होता है, अतः तदधिपति वसन्तमें भी अपूर्व शोभाका संचार करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण अपने लोकोत्तर अद्भुत सौरस्य, सौगन्ध्यादिसे वनस्थोंको आह्लादित करते हुए पधारे अथवा सरस शृङ्गाराधिपति ही मधुपति हैं, अतः निखिलरसामृतमूर्ति होनेपर भी विशेषतया शृङ्गाररसामृतमूर्ति श्रीकृष्णने श्रीमद्वृन्दारण्य- धाममें प्रवेश किया। रसमें रसान्तरका संचार होनेसे उसका महत्त्व अधिक हो जाता है और यदि शृङ्गाररसमें शृंगारका प्रवेश हो तो उसके महत्त्वका क्या कहना? ऐसे ही शृंगाररसामृतमूर्ति श्रीकृष्णके निवेशसे समस्त वृन्दावन आह्लादित हो उठा। वनमें निविष्ट होकर श्रीकृष्णने वेणु-कूजन किया। यहाँ 'चुक्कूज' का प्रयोग है अर्थात् 'कूजयामास'। आशय यह है कि श्रीकृष्णके मुखसंस्पर्शमात्रसे वेणु स्वयं गान करने लगा। जड़ वेणु भी शृंगाररसस्वरूप श्रीकृष्णकी अधरसुधाकी विशेषतासे गाने लगा— चेतनका कार्य करने लगा। कहा जा चुका है कि भगवान् श्रीकृष्ण सम्प्रयोगात्मक-विप्रयोगात्मक उद्बुद्ध उभयविध शृंगार- रसात्मा हैं। शृंगार रसके दो भेद हैं—(१) सम्प्रयोग (संयोग)-रूप और (२) विप्रयोग (वियोग)-रूप। श्रीकृष्णकी मूर्ति प्राकृत पुरुषोंके समान अस्थि, चर्म, मांसमय नहीं है, अपितु उभयविध शृंगाररसमय है और वे उभय रस भी उद्बुद्ध हैं, उद्वेलित हैं, पूर्णरूपेण अभिव्यक्त हैं। वैसे तो जिस समय संयोगात्मक शृंगार अनुभूयमान होता है, उस समय वियोगात्मक शृंगारका अनुभव नहीं होता और वैसे ही विप्रयोगात्मक शृंगाररसानुभवकालमें सम्प्रयोगात्मक शृंगाररसका अनुभव नहीं होता, परंतु भगवान् श्रीकृष्णमें यही विशेषता है कि यहाँ उभयविध शृंगाररसका एक कालावच्छेदेन पूर्णप्राकट्य है और दोनोंका अनुभव भी एक ही कालमें हो रहा है। वनदेवियोंको सम्प्रयोगात्मक श्रीकृष्ण और ब्रजदेवियोंको विप्रयोगात्मक श्रीकृष्ण अभिव्यक्त हैं। श्रीकृष्णका दिव्य स्वरूप वनमें है, उससे वनदेवियों-आधिदैविकी शक्तियोंका रमण सम्पन्न