भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 80

७० भक्तिसुधा यहाँ तो श्रीमद्वृन्दारण्यधामके तरु, लता, गुल्म, तृणादि सभी योगीन्द्र मुनीन्द्रगण भगवान्के परमभक्त होनेसे भगवदीयोंमें मुख्य हैं—'प्रायो अमी मुनिगणा भवदीयमुख्याः' अतः भगवान् उनकी की हुई सपर्याको अवश्य स्वीकार करते हैं। जब कोई राजा गुप्तवेषमें प्रयाण करता है, तब उसके नौकर-चाकर भी गुप्तवेषमें उसका अनुसरण करते हैं, वैसे ही यहाँ अनन्त ब्रह्माण्डनायक, अशब्द, अस्पर्श, अरूप, अव्यय, अचिन्त्य, अनन्त, अप्रमेय, नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्तस्वभाव, निर्गुण, निराकार, कूटस्थ, एकरस, सच्चिदानन्दघन, परब्रह्म ही जब अपने उस स्वरूपको छिपाकर अचिन्त्यानन्त अद्भुत सौगन्ध्य, सौरस्य, सौन्दर्य, माधुर्य, लावण्यादि सम्पन्न, परमानन्द- सुधासागर-सारसर्वस्व होकर श्रीमद्व्रजेन्द्रगेहिनी श्रीमन्नन्दरानीके परममंगलमय अंकमें अवतीर्ण हुए, तब उनके परमान्तरंग भक्तगण भी श्रीमद्वृन्दारण्यधाममें तरु, लता, तृण, सरित् आदिके रूपमें प्रादुर्भूत हुए हैं। अतः वे सब भगवदीय हैं, प्रभुने उनकी अर्पण की हुई साधारण पूज्य सामग्रीको बड़े प्रेमसे स्वीकार किया। पृथुने भगवान्से कहा था कि 'भगवन्! आपके मंगलमय जिस चरणारविन्दकी सेवा मैं करता हूँ, लक्ष्मी भी उसीका समाश्रयण करती हैं। ऐसी स्थितिमें लक्ष्मीके साथ कहीं हमारा झगड़ा न हो जाय? ऐसा होनेपर नाथ! आप किसका पक्ष लेंगे? मुझे विश्वास है कि आप तो आप्तकाम, पूर्णकाम, आत्माराम, निष्काम हैं, इसलिये, लक्ष्मीका पक्ष न लेकर मेरा ही साथ देंगे'— अप्यावयोरकपतिस्पृधोः कलि- र्न स्यात्कृतत्वच्चरणैकतानयोः॥ जगज्जनन्यां जगदीश वैशसं स्यादेव यत्कर्मणि नः समीहितम्। (श्रीमद्भा० ४।२०।२७-२८) भगवान्ने पृथुका साथ दिया। लक्ष्मीका निवास भगवान्के विशाल वक्षःस्थलपर है; भक्तोंकी अर्पित पुष्पमालाको भगवान् अपने श्रीकण्ठमें धारण करते हैं। भक्तोंकी दी हुई मालाका त्याग कैसे करें, इसलिये पुष्पोंके कुम्हला जानेपर भी प्रभु अपने वक्षःस्थलपरसे उस मालाका परित्याग नहीं करते। उस मालाके भारसे लक्ष्मी दब जाती हैं, यह सब कष्ट सहन न हो तो लक्ष्मी भले ही छोड़कर चली जायँ, पर भगवान् भक्तकी मालाकी उपेक्षा कैसे कर सकते हैं? बेचारी लक्ष्मी सब सह लेती हैं। सूखी मालाको अपने ऊपर पड़ी देखकर लक्ष्मीको अनुचित प्रतीत होता होगा, पर इससे क्या? परम चंचला लक्ष्मी भगवान्के चरणपंकजको प्राप्तकर पूर्ण निश्चला बन गयी हैं। सपत्नीके साथ भी उन्हें रहना स्वीकार है, पर प्रभुके श्रीचरणको छोड़कर वे नहीं जा सकतीं। ऐसा ही अद्भुत महत्त्व भगवान्के श्रीचरणोंका है। तुलसी भगवान्के श्रीचरणपंकजमें विराजमान है। लक्ष्मीको यद्यपि भगवान्के श्रीवक्षःस्थलपर सम्माननीय निवास प्राप्त है तो भी तुलसीरूप सपत्नीसे एवं भृत्यगणोंसे सेवित भगवान्के श्रीमतपदाम्बुजमकरन्दको ही वे प्राप्त करना चाहती हैं—'श्रीयत्पदाम्बुजरजश्चकमे तुलस्या लब्ध्वापि वक्षसि पदं किल भृत्यजुष्टम्। यस्याः स्ववीक्षणकृतेऽन्यसुरप्रयासः।' (श्रीमद्भा० १०।२९।३७) अस्तु, ऐसे परमसुन्दर श्रीमद्वृन्दारण्यधाममें क्रीड़ा करनेके लिये श्यामसुन्दर व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण पधारे। क्रीड़ा दो प्रकारकी होती है—जल-क्रीड़ा और स्थल-क्रीड़ा। वृन्दावनकी शोभा इस समय दोनों प्रकारकी क्रीड़ाओंके लिये उपयुक्त है। स्वच्छ जलसे परिपूर्ण सरसी, सरित्, सरोवरोंसे सज्ज होनेके कारण जल-क्रीड़ामें एवं पद्माकर सुगन्धि वायुसे व्याप्त होनेसे स्थल-क्रीड़ामें उपयुक्त है—'इत्थं शरत्स्वच्छजलं पद्माकरसुगन्धिना। न्यविशद् वायुना वातम्।' (श्रीमद्भा० १०।२१।१) एतावता उभयविध क्रीड़ाकी सामग्रीसे सज्यता कही गयी, पर जबतक जिस तत्त्वका भगवत्सम्बन्ध नहीं, तबतक वह नीरस है, अशोभन है, अमंगल है। हिरण्मय ब्रह्माण्डके उत्पन्न होनेपर वह अचेतन था। उसमें प्रविष्ट होकर वहि,