भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवेणुगीत ६९ वृन्दावनमें भगवान्का आतिथ्य भगवान् श्रीकृष्णकी मधुर मनोहर वंशीध्वनिका श्रवणकर ब्रजकी कामधेनुरूपा गौओंसे क्षीर अपने- आप प्रस्रवित होने लगता है। आनन्दविभोर होनेसे देहभान भूलकर वे गौएँ अविरत बहनेवाली क्षीरधाराको रोकनेमें असमर्थ होती हैं। स्तन्यपानके लिये प्रवृत्त हुए बछड़े भी उस आनन्दसिन्धुमें मग्न होनेके कारण उस क्षीरको पान करना भूल जाते हैं। अतः सतत प्रवाहित होनेवाले क्षीरसे समस्त वृन्दावन भरपूर हो जाता है, उसमें कतिपय अम्लफलोंके योगसे वह क्षीर जमकर दधि हो जाता है। उसमें कथंचित् प्रबल वायुसे आलोड़ित होनेपर हैयंगवीन—मक्खनका भी प्रादुर्भाव हो जाता है एवं उसमें वृक्षोंसे बहनेवाली मधुधाराओंका मिश्रण होनेसे एक विलक्षण मधुपर्क सम्पन्न हो जाता है। वृन्दावन उससे भगवान्का अर्हण करता है। मधुधारा, पत्र, पुष्प, पल्लव, फल आदि सामग्रियोंसे नैवेद्य आदि अर्पण करता है। इस तरह समष्टि-व्यष्टिरूपसे वृन्दावन एवं उसके समस्त तत्त्व भगवान्का आतिथ्य करते हैं— अहो अमी देववरामरार्चितं पादान्बुजं ते सुमनःफलार्हणम्। नमन्त्युपादाय शिखाभिरात्मन- स्तमोऽपहत्यै तरुजन्म यत्कृतम्॥ एतेऽलिनस्तव यशोऽखिललोकतीर्थं गायन्त आदिपुरुषानुपदं भजन्ते। प्रायो अमी मुनिगणा भवदीयमुख्या गूढं वनेऽपि न जहत्यनघात्मदैवम्॥ (श्रीमद्भा० १०।१५।५-६) यहाँ सन्देह किया जा सकता है कि ये जड़वृक्षादि आतिथ्य कैसे कर सकते हैं? इसलिये कहा गया कि ये वृक्षादि जड़ नहीं, अपितु भगवान्के परमप्रिय भक्तगण, योगीन्द्र, मुनीन्द्र एवं देवगण हैं। दूसरोंकी जड़ता मिटानेके लिये उन्होंने जडरूप धारण किया है। इनके दर्शन, श्रवण, स्पर्श करनेसे लोगोंकी जड़ता मिट जाती है—'अन्येषां तमोऽपहत्यै तरुजन्म यत्कृतम्।' अथवा 'तम' का दुःख भी अर्थ होता है, अतः दुःखनिवृत्तिके लिये उन्होंने तरुजन्म ग्रहण किया। आशय यह है कि भगवान्के विप्रयोगजन्य अपने तीव्रतापको भगवत्सम्मिलनसे मिटानेके लिये, तरु, लता, गुल्म आदि बनकर श्रीवृन्दावनमें अवतीर्ण हुए कि भगवान् जब गोचारणके लिये यहाँ पधारेंगे, तब उनके स्पर्शसे अपना सन्ताप मिटायेंगे। वे तरु अपनी अपेक्षा भ्रमर एवं विहंगमोंको अधिक सौभाग्यशाली मानते हैं; क्योंकि वे स्वयं स्थानस्वरूपमें होनेके कारण एक ही स्थानपर स्थिर रहते हैं, भगवान् श्रीकृष्ण जब कृपाकर स्वयं वृन्दावनधाममें पधारें, तब उनका सम्मिलन प्राप्त हो, पर ये भ्रमर, विहंगम तो उनके प्रियतम प्राणधन श्रीकृष्ण जहाँ विराजमान होते हैं, वहाँ जाकर उनका दर्शन प्राप्तकर अपना सन्ताप मिटाते हैं। वृन्दावनस्थ सभी तत्त्व भगवान् श्रीकृष्णकी आराधनामें अपना सौभाग्य मानते हैं। जिसके पास जो है, उसीसे वह प्रभुकी आराधना करने लगता है, इस प्रकार गम्भीर गुंजारसे मानो भगवान्का यशोगान करते हैं, मयूर नृत्यकर प्रभुको प्रसन्न करना चाहते हैं, हरिण-हरिणी अपने विशाल विस्तृत नेत्रोंसे दर्शन करते हैं, कोकिला प्रेमोन्मादमें अपनी मधुरसूक्तियोंसे प्रभुका स्तवन करती है। कोई यह न समझे कि इन्द्र, लक्ष्मी, कुबेर आदि दिव्यातिदिव्य सामग्रियोंसे पूजा करनेपर भी जिसको प्रसन्न नहीं कर पाते, उस अखिल ब्रह्माण्डनायक, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् भगवान्की आराधना मैं साधारण पुरुष कैसे करूँ? क्योंकि भगवान् तो भावप्रिय हैं, वे भावपूर्वक की हुई सबकी सेवा स्वीकार करते हैं। भावविहीन अनन्त पूजा-सामग्रियोंसे उन्हें प्रसन्न नहीं किया जा सकता। भावयुक्त प्रेमसहित अर्पण की हुई साधारण-से-साधारण वस्तुसे, एक तुलसीदल और चुल्लूभर जल चढ़ा देनेसे वे भक्तवत्सल भक्तोंके हाथ बिक जाते हैं— तुलसीदलमात्रेण जलस्य चुलुकेन च। विक्रीणीते स्वमात्मानं भक्तेभ्यो भक्तवत्सलः ॥