भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअसमर्थ हूँ, तुम हटा लो।' भीमने पहले हाथकी दो अंगुलियोंसे उसकी पूँछ हटाना चाहा, परंतु जब न हटा सके, तब एक हाथसे जोर लगाया। अन्ततः दोनों हाथोंकी पूर्ण शक्तिसे प्रयत्न करनेपर भी जब पूँछ अपने स्थानसे तिलमात्र भी न हटी, अपितु मूर्च्छित हो गये, तब थोड़ी देरमें सावधानी आनेपर आश्चर्यचकित होकर उन्होंने वानरसे कहा—'मैंने सुना है कि मेरे भाई कोई हनुमान् नामक हैं, जो अत्यन्त बलवान् हैं, उन्होंने त्रेतामें लंका-विजयमें रामचन्द्रकी बहुत सहायता की थी। क्या आप वही हनुमान् तो नहीं हैं?' यह श्रवणकर वानरने कहा 'हाँ, मैं वही हूँ।' तब भीमसेनने उनको प्रणामकर कहा कि मैं आपका वह दिव्य स्वरूप देखना चाहता हूँ, जिसको धारणकर आपने राक्षसोंका संहार किया था। हनुमान्ने कहा— 'उस रूपको देखनेकी तुम्हारी सामर्थ्य नहीं है। अतः उसको देखनेका आग्रह मत करो।' परंतु भीमने जब अपना आग्रह न छोड़ा, तब भीमके हठको देखकर हनुमान्ने अपना वह कनक भूधराकार परमतेजोमय दिव्यरूप धारण करना आरम्भ किया। अभी पूर्णरूप देख भी न पाये थे कि उसके प्रचण्ड तेजसे भीमकी आँखें झँप गयीं, मूर्च्छित हो गये। हनुमान्ने अपना रूप संवृत्तकर भीमको सावधान किया और कहा कि 'अब तुम यहाँसे ही पीछे लौट जाओ, आगेकी दिव्य सुवर्ण रत्नमयी भूमि आदि देखनेयोग्य तुम्हारी सामर्थ्य एवं योग्यता नहीं है।' ऐसे ही द्वित, त्रित नामक महर्षियोंको घोर तपस्याके बाद भी श्वेतद्वीपमें कुछ नहीं दिखायी दिया। बहुत तपस्याके बाद एक व्यक्तिका दर्शन हुआ। उसने कहा—'इस जन्ममें तुम्हें यहाँ और कुछ न दिखायी देगा, रामावतारमें तुम भगवान्का दर्शन कर सकोगे।' तात्पर्य यह कि प्रत्येक वस्तुके दर्शनमें योग्यताकी अपेक्षा होती है। वह योग्यता धर्माधर्मकृत ही है। इसलिये यह कहना भी संगत नहीं है कि भगवान् दिखलायी नहीं देते, अतः हैं ही नहीं; क्योंकि आजके मनुष्योंकी वैसी योग्यता न होनेसे—पुण्यकी कमीसे उनका दर्शन नहीं होता। अस्तु, श्रीमद्वृन्दावन- धामकी अलौकिक दिव्यशोभाका तो फिर कहना ही क्या है ? अरविन्द, मालती, चम्पक, मल्लिका आदि अनेकविध विकसित पुष्पोंके सौगन्धसे मत्त भृंग और हंस, कारण्डव, चक्रवाक, पारावत, शुक, मयूर आदि विहंगमोंके आनन्दोद्रेकमें—प्रेमोन्मादमें होनेवाले कलरवके झंकारसे जिसके वनराजि, सरोवर, सरित्, सरसी, निर्झर, पर्वत आदि प्रतिध्वनित-निनादित हो रहे हैं, ऐसे श्रीमद्वृन्दारण्यधाममें भगवान् श्रीकृष्ण, बलराम गोपालोंके साथ गौओंको चराते हुए पधारे— 'मधुपतिरवगाह्य चारयन् गाः।' (श्रीमद्भा० १०।२१।२) यहाँ श्रीकृष्णके लिये मधुपति पदका प्रयोग किया गया है। मधु अर्थात् वसन्तके पति— अधिपति ही मधुपति हैं। इसका आशय यह हुआ कि वनमें मधुका—वसन्तका संचार होनेसे ही शोभा बढ़ जाती है, फिर साक्षात् मधुपति—वसन्ताधिपति—का प्रवेश होनेपर तो कहना ही क्या ? इन सबसे यहाँ लीलाभूमि आदिकी महिमा कही गयी। रंगमंचकी सजावटके बिना जैसे वहाँ नाट्यलीला सम्पन्न नहीं हो सकती, वैसे ही यहाँ श्रीकृष्णकी अद्भुत मंगलमयी लीलाके लिये श्रीवृन्दावनकी सजावट अपेक्षित है। इसीलिये इस प्रसंगके पहले श्रीबलरामकी स्तुतिके व्याजसे श्रीवृन्दावनभूमि आदिकी स्तुति की गयी है। श्रीकृष्णने श्रीबलरामसे कहा—ये सब मुनिगण, देवगण हैं, जो वृक्ष, लता, तृण, गुल्म आदिके रूपसे आपके पादस्पर्शके लिये लालायित हैं अथवा आपके चरणोंसे स्पृष्ट भूमिका स्पर्श करके, वन्दन करनेके लिये फल-पुष्पोंसहित झुककर मानो उसका आलिंगन करते हैं अथवा महापुरुषके स्वागतार्थ मानो वृन्दावन स्वयं उनका आतिथ्य करता है। मन्द, सुगन्धित, शीतल वायुके बहनेसे मानो व्यजन कर रहा है, अनेकविध कुमुद-कुमुदिनियोंसे युक्त, उनके मधुर मकरन्दगन्धसे सुगन्धित उद्वेलित सरिताओंसे मानो पाद्य-अर्घ्य दे रहा है।