भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवेणुगीत ६७ भगवान्की लीला प्राकृत पदार्थोंसे नहीं हो सकती है, इसलिये निखिल रसामृतमूर्ति श्रीकृष्णने वृन्दावन- स्थित सकल तत्त्वोंमें अन्तरंगतया निविष्ट होकर उन्हें रसमय, अप्राकृत बना लिया। अब श्रीकृष्णकी उनसे क्रीड़ा ठीक-ठीक तरहसे हो सकेगी। श्रीवल्लभाचार्यके मतमें श्रीकृष्णका यह वृन्दावनधाममें निवेश सरित्-सरोवर वनतरुओंमें स्थित आधिदैविकी शक्तिके साथ रमण है। भगवत्-सम्मिलनके लिये केवल व्रजांगनाएँ ही नहीं, परा-अपरा प्रकृति सब लालायित हैं। वृन्दावनधामके तरु, लता, गुल्म, सरसी आदि सभी भगवत्-सम्मिलनके लिये लालायित हैं। अतः भगवान्ने निवेश एवं वेणुकूजनरूप उद्बोधनसे वनदेवताओंको निजागमन सूचित किया, जिससे वे परमात्मरतिके लिये सजग हो जायँ। लौकिक कामिनीका रमण प्राकृत होता है, किंतु यहाँ श्रीकृष्णका श्रीवनदेवियों आदिके साथ अप्राकृत आन्तर रमण है। उसी रमणके लिये वेणुकूजनद्वारा वनदेवताओंका उद्बोधन किया गया— कुसुमितवनराजिशुष्मिभृङ्ग- द्विजकुलघुष्टसरःसरिन्महीध्रम् । मधुपतिरवगाह्य चारयन् गाः सहपशुपालबलश्चकूज वेणुम् ॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।२) श्रीवृन्दारण्यकी शोभा श्रीवृन्दारण्यकी शोभाका वर्णन क्या किया जाय? फूले हुए वनोंकी पंक्तियोंसे सुशोभित मत्तभ्रमरावलीके मधुर गुंजार एवं पक्षिगणोंके मनोहर कलरवसे वृन्दावनधामके सरोवर, सरिता, वृक्ष, लता, पर्वतादि परम शोभित और निनादित हो रहे हैं। कहीं कांचनमयी भूमिमें मरकतमणिमयी श्यामल दूर्वाएँ सुशोभित हैं, कहीं मरकतमणिमयी भूमिपर कांचनमयी दूर्वाएँ शोभायमान हैं। कहीं पद्मरागमणिमय वृक्षोंपर स्फटिक मणिमयी दिव्य लताएँ विकसित हैं तो कहीं स्फटिक मणिमय स्वच्छ तरुपर पद्मरागमणिमयी सुन्दर लताएँ विराजमान हैं। कहीं महेन्द्रनीलमणिमयी भूमिपर कांचनमयी दिव्य दूर्वाएँ सुशोभित हो रही हैं तो कहीं कांचनमयी देदीप्यमान भूमिपर महेन्द्रनीलमणिमयी दूर्वाएँ विस्तृत हैं। यह प्राकृत कथाका वर्णन नहीं है। आजका मत तो कहता है कि जो दीखता नहीं, वह है ही नहीं। आज श्रीवृन्दावनकी वह लोकोत्तर शोभा दृष्टिगोचर नहीं होती, अपितु सर्वत्र रूक्षता एवं कण्टकाकीर्ण वृक्ष ही दिखलायी पड़ते हैं। वैसे ही काशीकी भी दिव्य अलौकिक शोभाका वर्णन पुराणोंसे जाना जाता है, किंतु लोगोंको यहाँ भी ईंट, चूना, पत्थर ही दिखलायी देते हैं। कहा जाता है कि आधुनिक वैज्ञानिकोंने समस्त भूमण्डलका पता लगा लिया है, उन्हें सुमेरु, सप्तद्वीप, क्षीरसिन्धु आदि मिले होते तो अवश्य दिखलायी पड़ते, परंतु कहना पड़ेगा कि कुछ ऐसी भी स्थिति है कि जो हो और दिखलायी न पड़े। प्रत्येक वस्तुके दर्शनमें कुछ सुख अथवा कुछ दुःख होता है। अतः मानना पड़ेगा कि वस्तु दिखलायी पड़नेमें पाप-पुण्य- रूप अदृष्टकी भी हेतुता है। क्यों किसी वस्तुको देखनेपर दुःख और घृणा होती है? कोई भी कार्य बिना कारणके नहीं होता। सुख-दुःखको देखकर उनके कारण पुण्य-पापका अनुमान करना चाहिये। अतः यह मानना पड़ता है कि वस्तुदर्शनमें अदृष्टहेतु होनेसे शास्त्रोक्त कुछ वस्तुओंका हमें दर्शन नहीं प्राप्त होता। इसमें हेतु हमारे वैसे अदृष्टका अभाव है, न कि उन वस्तुओंका अभाव। अदृश्य वस्तुकी सत्ताका दृष्टान्त ‘महाभारत’ में एक कथा है कि अलकनन्दामें बहकर आये हुए किसी एक दिव्य सौगन्ध्य, सौन्दर्यसम्पन्न पुष्पको देखकर द्रौपदीने उसकी जोड़ीका दूसरा पुष्प लानेके लिये भीमसेनसे आग्रह किया। भीमसेनने अलकनन्दाके तटसे जाते-जाते बहुत दूरतक जानेपर मार्गमें एक वृद्ध बानरको देखा, जो अपनी पूँछसे मार्गको रोके हुए सोया था। भीमने उससे अपनी पूँछ हटा लेनेके लिये कहा। बानरने उत्तर दिया कि ‘मैं अत्यन्त वृद्ध होनेके कारण उसे हटा सकनेमें