भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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६६ भक्तिसुधा यही बात व्यसनके सम्बन्धमें भी है, माता, पिता, गुरुजन, शास्त्र और स्वयं अपने-आपद्वारा सहस्रधा प्रयत्न करनेपर भी जो छुड़ाये न छूटे, वही व्यसन कहा जाता है। वही व्यसन यदि सांसारिक पदार्थोंका हो तो वह पतनका मूल है, उसका तो नाश ही इष्ट है, परंतु भगवत्प्रेम-व्यसन तो बड़ी कठिनाईसे सम्पादन किया जाता है। ऐसा व्यसन सनकादि, शुकादि, काकभुशुण्डि आदिमें ही देखनेमें आता है— 'आसा बसन ब्यसन यह तिन्हहीं। रघुपति चरित होइ तहँ सुनहीं।' (रा०च०मा० ७।३२।६) श्रीहनुमान्‌जीका भी ऐसा ही व्यसन है कि जहाँ-जहाँ श्रीमद्राघवेन्द्र भगवान् रामचन्द्रके मंगलमय परमपवित्र चरित्रोंका कीर्तन होता है, वहाँ-वहाँ मस्तकपर अपने अंजलिबद्ध हस्तको रखे हुए आनन्दाश्रुसे पूर्णलोचन होकर खड़े रहते हैं— यत्र यत्र रघुनाथकीर्तनं तत्र तत्र कृतमस्तकाञ्जलिम्। वाष्पवारिपरिपूर्णलोचनं मारुतिं नमत राक्षसान्तकम्॥ प्राकृतजनोंको कोई बात समझानी हो तो लौकिक दृष्टान्त रखना पड़ता है। इसीलिये श्रीरघुनाथजीके प्रति अपने प्रेमको दिखलानेके लिये श्रीगोस्वामी तुलसी-दासजीने कहा है— कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम। तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम॥ (रा०च०मा० ७।१३० (ख)) लाम्पट्य अत्यन्त निन्द्य है, परंतु मनोमिलिन्द यदि भगवच्चरणाम्बुजमकरन्दमधुका लम्पट हो तो यह कितने सौभाग्यकी बात हो? साधारण दृष्टिसे राग, आसक्ति एवं व्यसन अत्यन्त निन्द्य हैं, किंतु सर्वात्मा, सर्वाधिष्ठान, अचिन्त्यानन्त आनन्द- सुधाजलनिधि श्रीकृष्णमें प्रेम-निरोधादिका होना उनके बिना क्षणभर भी रह न सकना कितना दुर्लभ है? आज तो संसारकी यह स्थिति है कि विषयचिन्तन, स्त्री-पुत्र-धनादिके चिन्तनके बिना रहना कठिन हो रहा है, किंतु इस चिन्तनको वहाँसे हटाकर यदि भगवच्चरण-पंकजका चिन्तन न किया तो 'पुनरपि जननं पुनरपि मरणम्' के चक्रसे निकलना कठिन होगा। भगवान्‌का वृन्दावन-आगमन श्रीगोपांगनाओंके आसक्तिनिरोधको दिखलानेके लिये श्रीशुकदेवजीने कहा कि भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र गो, गोवत्स, गोपाल, बलराम आदिके साथ श्रीवृन्दारण्यधाममें पधारे— इत्थं शरत्स्वच्छजलं पद्माकरसुगन्धिना। न्यविशद् वायुना वातं सगोपालकोऽच्युतः॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।१) जल-क्रीड़ाके लिये स्वच्छ सुगन्धित जलका होना आवश्यक है। इसलिये श्रीवृन्दावनने भगवान्‌की क्रीड़ाके लिये आनन्द-सामग्रीको प्रस्तुत कर दिया। शरद्-ऋतुके सम्बन्धसे श्रीयमुना, राधाकुण्ड आदि सरित्-सरोवरोंके जल अत्यन्त स्वच्छ-निर्मल हो गये और एक पद्मकी कौन कहे, पद्मके आकर विकसित हुए। कुमुद-कुमुदिनी, कमल-कमलिनीके अनन्त समुदायके मादक मोहक दिव्य सौगन्ध्यसे मिश्रित समीरद्वारा समस्त वृन्दारण्यधाम आविष्ट हो गया— गमक उठा। पद्मका सौगन्ध्य बड़ा अलौकिक होता है। उसके आभोग, पत्र, पराग, मधु आदिमें भी विलक्षण सौगन्ध्य, सौन्दर्य, सौरस्य होता है। चम्पक, केतकी आदिमें भी आभोग, पराग, मधु, सौगन्ध्य आदि होते हैं, किंतु पद्मका मधुर, मन्द, मादक सौगन्ध्य कुछ और ही वस्तु है। भ्रमरको वह अन्यापेक्षया विशेष प्रिय है। इसीलिये कवियोंने पद्मकी ही शोभाका विशेषरूपसे वर्णन किया है। अतः ऐसे दिव्य सौगन्ध्यसम्पन्न पद्मोंके सुगन्धसे मिश्रित वायुसे व्याप्त वृन्दारण्यमें श्रीकृष्ण पधारे। वृन्दावनधामके तरु, लता, तृण, पल्लव, फल, पुष्प, सरित्, सरोवर, भूमि आदि सभीमें भगवान् श्रीकृष्णका अन्तरंग निवेश हुआ, एतावता वृन्दारण्यधाम श्रीकृष्णमय हो गया; क्योंकि श्लोकमें 'न्यविशत्' पदका प्रयोग हुआ है, जिसमें 'नि' का अर्थ नितरां— अत्यन्त है। बात ठीक भी है, क्योंकि अप्राकृत