भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवेणुगीत ६५ आसक्तिनिरोधका वर्णन है। आगे चलकर उस आसक्तिके अधिकाधिक गाढ़ होनेसे उसका छूटना असम्भव हो जाता है। अतः वह व्यसनरूप हो जाता है। इसीलिये वह ‘व्यसननिरोध’ कहा जाता है। इसका वर्णन रासपंचाध्यायी, युगलगीतमें है। सर्वविस्मरणपूर्वक निरतिशय निरूपाधिक परमप्रेमास्पद प्रियतम श्रीकृष्ण स्वरूपमें श्रीव्रजांगनाओंकी तन्मयता ही ‘आसक्तिनिरोध’ है। जितनी अधिक तन्मयता, उतना ही अधिक विश्वविस्मरण होता है। अत्र सर्गो विसर्गश्च स्थानं पोषणमूतयः। मन्वन्तरेशानुकथा निरोधो मुक्तिराश्रयः॥ (श्रीमद्भा० २।१०।२) इस दशविध पुराणलक्षणान्तर्गत निरोधका लक्षण, अपनी समस्त शक्तियोंके सहित अखण्ड, अनन्त आत्मस्वरूप भगवान्का शयन कहा गया है— ‘निरोधोऽस्यानुशयनमात्मनः सह शक्तिभिः।’ (श्रीमद्भा० २।१०।६) इस मतमें महाप्रलय ही निरोध है। सृष्टिकालमें शक्तियाँ कार्यरूपमें परिणत होती हैं और प्रलयकालमें समस्त कार्य स्वकारणभूत शक्तियोंमें लीन हो जाता है और भगवान् स्वस्वरूपभूत उन शक्तियोंको साथमें लेकर उसे अपने स्वरूपमें लीन करके शयन करते हैं। जैसे अंकुर, नाल, स्कन्ध, शाखा, उपशाखा, पत्र, पुष्प, फल, सौगन्ध्य, सौरस्यादिके उत्पादनानुकूल समस्त शक्तियाँ बीजमें निहित होती हैं, वैसे ही परब्रह्म अखिल ब्रह्माण्डोत्पादिनी शक्तियोंको साथ लेकर प्रलयावस्थामें शयन करते हैं। यहाँ ब्रह्मका शयन वास्तविक न होकर सुप्तशक्तियोंके कारण औपचारिक है; क्योंकि ‘भागवत’ में ही अन्यत्र ब्रह्मको ‘सुप्तशक्तिरसुप्तदृक्’ (श्रीमद्भा० ३।५।२४) कहा गया है। ‘सुप्ताः शक्तयो यत्र असौ सुप्तशक्तिः’ इस तरह प्रलयावस्थामें शक्तियाँ विद्यमान होती हुई भी कार्यकरणक्षम नहीं रहतीं। ब्रह्म तो अखण्ड, अनन्त, स्वप्रकाशबोधस्वरूप होनेसे ‘असुप्तदृक्’ है। उपनिषदोंने भी कहा है कि ‘द्रष्टा- सर्वभासककी दृष्टिका स्वरूपभूत अखण्डभानका लोप कभी नहीं होता। हाँ, भगवान् भी महाप्रलयकालमें प्रपंचोत्पादनादि व्यापारसे विवर्जित होनेसे शयन-से सोते हुए-से प्रतीत होते हैं। उस अखण्ड अनन्तबोधका— ज्ञानका भी अस्त-उदय नहीं होता, वह सदा ही एकरस बना रहता है’—‘नास्तमेति न चोदेति।’ घटादिकी उत्पत्तिके पूर्व कुलालको उनका ज्ञान रहता है, फिर तदनुसार वह घटादिको उत्पन्न करता है। ‘आसीज्ज्ञानमथो ह्यर्थ एकमेवाविकल्पितम्।’ (श्रीमद्भा० ११।२४।२) अर्थात् प्रलयावस्थामें शुद्ध ज्ञान और प्रकृति-प्रपंचरूप अर्थ दोनों मिले हुए ही थे। यहाँ ज्ञान पदसे घटादि ज्ञान नहीं, अपितु ‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ यह ज्ञान लिया गया है। इस तरह समस्त दार्शनिक सिद्धान्तानुसार अपनी समस्त शक्तियोंके साथ आत्माका सो जाना ही निरोध है, परंतु कुछके मतानुसार अखिल विश्वका विस्मरणपूर्वक भगवान्में मनकी तन्मयता ही निरोध है। भगवान्के श्रीचरणोंमें अनुराग होना लोकोत्तर सौभाग्य है पहले प्रेमास्पदके अद्भुत गुण, उसकी अद्भुत अचिन्त्य महिमा एवं ऐश्वर्यके ज्ञान तथा सौरस्य, सौगन्ध्य आदिके अनुभवसे उसमें राग होता है। विष्णुसहस्रनाम, गीता आदिमें अनुराग होनेके लिये पहले उनके माहात्म्य-पाठका विधान है। अतः यहाँ भी पहले अध्यायोंमें पूतना-वध, गोवर्द्धनोद्धारण आदिसे भगवान् श्रीकृष्णमें राग-प्रेम उत्पन्न होनेके लिये उनका महत्त्व बतलाया गया है। यहाँ आसक्तिनिरोधका वर्णन है और व्यसननिरोध रासलीलाके बाद युगलगीतमें वर्णन किया गया है। राग, आसक्ति एवं व्यसन वैसे तो निन्द्य एवं त्याज्य ही हैं, किंतु कहीं-कहीं आलम्बनकी महत्तासे इनका महत्त्व बढ़ जाता है। लौकिक स्त्री, पुत्र, धनादिमें राग एवं आसक्ति पतनका मूल है, किंतु यही राग और आसक्ति यदि भगवान्के श्रीचरणोंमें हो जाय तो क्या कहना है, ऐसा तो किसी महानुभावको ही लोकोत्तर सौभाग्य हो सकता है।