भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीराधा माधुर्याधिष्ठात्री महाशक्ति है। तब तत्त्वज्ञानी भी आत्माराम होते हैं, तब पूर्णतम पुरुषोत्तमका रमण बाह्य वस्तुमें कैसे हो सकता है? उनका तो अपनेमें ही रमण बनता है। श्रीजानकीरमण, श्रीराधारमण, गिरा और अर्थकी तरह, जल और वीचिकी तरह अभिन्न हैं। गोस्वामी तुलसीदासजीने कहा है— 'गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न। बंदउँ सीता राम पद....।।' (रा०च०मा० १।१८)। महाकवि कालिदासने भी श्रीपार्वतीरमणको वाणी और अर्थकी तरह अभिन्न बतलाया है— 'वागर्थाविव सम्पृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये। जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ।।' (रघुवंश १।१) श्रीजानकी, श्रीराधा, श्रीपार्वती आदि उस अखण्ड, अनन्त, अचिन्त्य, अव्यक्त, आनन्दसागर परब्रह्मकी तरंग आदिकी तरह निजी अभिन्न वस्तु हैं। इससे भी अन्तरंग भाव जल और उसके माधुर्यके अभेदका है। यों उस परम तत्त्वका अपनेमें ही रमण सम्भव है। इन किरातिनियोंमें कुंकुम-सम्बन्धसे श्रीराधा- रूपका उदय हुआ। उससे उनमें वही अन्तरंगता आयी और उस दिव्य तत्त्वके रमणका अनुभव उन्हें हुआ। अतः उन्होंने 'आधिं जहुः' मानसी व्यथाको त्यागा और पूर्ण हो गयीं। जैसे प्रभु श्रीराधाको मिले, वैसे ही किरातिनियोंको भी मिले, क्योंकि 'ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्' (गीता १३।१७)- के अनुसार वह पूर्णतम तत्त्व सर्वत्र ही अव्याहत- रूपसे वर्तमान है। अतः दीन-हीन दशामें भी हताश होनेकी आवश्यकता नहीं है। आवश्यकता है उत्कट उत्कण्ठासे प्रभु-स्मरण और प्रभुके साथ सम्बन्ध स्थापित करनेकी। फिर तो किरातिनियोंकी ही तरह सभी पूर्ण हो सकते हैं।
वेणुगीत
श्रीवेणुगीतमें श्रीगोपांगनाओंकी आसक्तिका वर्णन है, पीछेके प्रकरणमें श्रीवृन्दावनधामकी वर्षा और शरद्-ऋतुओंका वर्णन हो चुका है। वहाँ कहा गया है कि वनसे आनेवाली परम सौगन्ध्य-सौरस्यसम्पन्न अनेकविध पुष्पोंके समशीतोष्ण वायुका आलिंगन करके श्रीवृन्दावन एवं व्रजके समस्त जनोंने तो तिग्मरश्मिजन्य ताप भुला दिया, किंतु गोपांगनाओंका अपने निरतिशय निरुपाधिक परमप्रेमास्पद प्रियतम श्रीकृष्णवियोगसे जन्य ताप शान्त नहीं हुआ— आश्लिष्य समशीतोष्णं प्रसूनवनमारुतम्। जनास्तापं जहुर्गोप्यो न कृष्णहृतचेतसः॥ (श्रीमद्भा० १०।२०।४५) राजा परीक्षित्से श्रीशुकदेवजीने कहा कि वर्षाकालके व्यतीत होनेपर जब शरद्-ऋतुका आगमन हुआ, तब श्रीवृन्दावनधामके सरित-सरोवर आदि जलाशयोंके जल स्वच्छ तथा निर्मल हो गये। नाना प्रकारके कमल-कमलिनी, कुमुद-कुमुदिनीके समुदायोंकी मनोहर सुरम्य सुगन्धिसे सुगन्धित मन्द शीतल समीरसे श्रीवृन्दारण्यधाम परम-रमणीय हो गया। उसी समय परमानन्दरसामृतमूर्ति भगवान् श्रीकृष्णने गौओं तथा गोपवृन्दोंके साथ श्रीवृन्दावनधाममें प्रवेश किया। इत्थं शरत्स्वच्छजलं पद्माकरसुगन्धिना। न्यविशद् वायुना वातं सगोपालोऽच्युतः॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।१) कुछ आचार्योंके मतानुसार इस अध्यायमें श्रीगोपांगनाओंका आसक्तिनिरोध वर्णित है। निरोध तीन प्रकारका होता है—(१) प्रेमनिरोध, (२) आसक्तिनिरोध और (३) व्यसननिरोध। पहले राग होनेसे कुछ काल-पर्यन्त प्रियतमसे अन्यका विस्मरण होता है, यही 'प्रेमनिरोध' या 'रागनिरोध' है। ऐश्वर्य-माधुर्यव्यंजक विभिन्न लीलाओंसे प्रेमनिरोधका वर्णन है। प्रियतमका अधिकाधिक स्मरण होनेसे उसमें आसक्ति होकर अन्यका विस्मरण होता है, वही 'आसक्तिनिरोध' कहा गया है। यहाँ गोपांगनाओंके