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भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 73

किरातिनियोंका स्मररोग ६३ पाप-तापोंको दग्ध कर देनेवाला जार है। यहाँ 'नातप्ततनुर्न तदामोऽश्नुते दिवम्' की बात ही नहीं रह जाती, जो फिर परिपक्व हो। पर यह तभी है, जब निर्निमित्त भावसे भक्ति हो। कहा है—'अनिमित्ता भागवती भक्तिः सिद्धेर्गरीयसी।' (श्रीमद्भा० ३। २५। ३३) चिन्तामणिमें दीपक-बुद्धिसे प्रवृत्त होनेपर भी जैसे मिलेगी चिन्तामणि ही, वैसे ही नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्तस्वभाव, पूर्णतम पुरुषोत्तममें जार-बुद्धिसे प्रवृत्त होनेपर भी मिलेगा वही तत्त्व, जो अखण्ड, अनन्त, अचिन्त्य, अव्यक्त, कूटस्थ, साक्षि-भास्य है। गोपियोंको उनकी एकान्त दृढ़ निष्ठासे वही मिला। इस तरह गोपियोंका काम विषयकी महत्तासे महत्त्ववान् हुआ है। श्रीकृष्ण-वियोग-ताप-शान्त्यर्थ कुंकुम-लिप्त श्रीव्रजदेवियोंके वक्षोजोंसे श्रीकृष्णके पादपद्मोंमें संलग्न जो कुंकुम था, वही उनके गोचारणार्थ वनमें आनेसे तृणोंमें लगा। उसके दर्शन करनेसे पुलिन्दियोंको— शबर रमणियोंको कामरूप रोग उत्पन्न हुआ अथवा 'स्मरो वा व आशायो भूयान्' से स्मरका अर्थ जब उत्कट उत्कण्ठा लिया गया, तब यह अर्थ हुआ कि उस कुंकुमके दर्शनसे उन किरातिनियोंको साक्षात् श्रीकृष्णकी दिव्य सौन्दर्य-माधुर्य-सौगन्ध्योपेत लावण्यामृतमूर्तिके दर्शनकी तीव्र अभिलाषा हुई। उसके पूर्ण न होनेसे हृदयमें श्रीकृष्ण-वियोग-तापका वेगवान् उदय हुआ। उसे मिटानेके लिये तृणोंमें संलग्न उसी कुंकुमको उन सबोंने अपने मुख और वक्षःस्थलमें लगाया—'लिम्पन्त्य आननकुचेषु....।' (श्रीमद्भा० १०।२१।१७) परंतु इससे भी उनकी व्याकुलता, व्यग्रता मिटी नहीं, प्रत्युत जब और भी बढ़ती गयी, तब उन्हें संशय हुआ कि कहीं यह कुंकुम ही तो हमारी आधि-मानसी व्यथाका कारण नहीं है? तुरंत उन्हें यही निश्चय भी हो गया और उसे उन्होंने 'आधिं मत्वा जहुः' अर्थात् मानसी व्यथाका कारण समझकर त्याग दिया। इसपर श्रीकृष्ण- प्रणय-प्रमत्त गोपियाँ कहती हैं—हमारे अंगमें लिप्त कुंकुम श्रीव्रजेन्द्रनन्दन श्यामसुन्दरके सुकोमल श्रीचरणोंमें लगा था। उसे देखनेमात्रसे ही इन पुलिन्दियोंको रोग उत्पन्न हुआ, असह्य मानसी व्यथा हुई, अतः इन्होंने उसे त्याग दिया। हाँ सखि! हम इतनी बड़ी हतभागा हैं कि जिनके अंग-संलग्न वस्तुके देखनेसे भी लोगोंमें रोग उत्पन्न होता है। अथवा 'तद्दर्शनस्मररुजः' का यह अर्थ है कि उन भिल्लपुरन्ध्रियोंने श्रीकृष्ण-चरणसंसक्त उस कुंकुमका दर्शन किया, अवघ्राण किया और स्पर्श किया। इससे उन सबोंने अपनी सब मनोव्यथाओंका त्याग किया— अर्थात् वे भगवद्भावापन्न हो गयीं। बात यह हुई कि उस विलक्षण आकर्षक कुंकुमके दर्शन आदिसे ही उन किरात-कामिनियोंको श्रीकृष्णदर्शनविषयक उत्कट उत्कण्ठा हुई और श्रीकृष्ण-दर्शन न होनेसे उन्हें तीव्रातितीव्र ताप हुआ। उत्कट उत्कण्ठासे जब तीव्र ताप होगा, तभी श्रीकृष्ण परब्रह्मका दर्शन हो सकेगा, नहीं तो कल्प-कल्पान्तरोंसे, युग-युगान्तरोंसे जीव भगवद्विमुख है, पर उसे कहाँ तीव्र वियोग ताप होता है? अतः उत्कट उत्कण्ठाकी ही प्रथम अपेक्षा है। उसका भी मूल वही कुंकुम है। वह कुंकुम साधारण कुंकुम नहीं, अपितु प्रथम वह श्रीवृषभानुनन्दिनीके उरोजमें संलग्न था, फिर वहींसे श्रीव्रजेन्द्रनन्दन श्यामसुन्दरके श्रीचरणोंमें संपृक्त हुआ। उसीके दर्शनसे पुलिन्दियोंको श्रीकृष्ण-दर्शनकी उत्कट उत्कण्ठा हुई और उसके पूर्ण न होनेके कारण उत्पन्न हुए तीव्रातितीव्र तापसे उनके हृदयमें इतना अधिक दुःखका आविर्भाव हुआ कि अनेक कल्पोंके दुःख उसमें समा गये और दग्ध हो गये। इनके साथ ही कुंकुम- परम्परासे पूर्णतम पुरुषोत्तमके श्रीचरणसम्पर्कसे इतना अधिक अनन्तानन्तगुणित आनन्द प्राप्त हुआ कि उससे वे पूर्ण हो गयीं, कृतकृत्य हो गयीं। श्रीमद्वल्लभाचार्य कहते हैं—उस कुंकुमके दर्शनसे, उसके विलिम्पनसे इन भिल्लिनियोंमें श्रीराधा-स्वरूपका अथवा श्रीलक्ष्मी-स्वरूपका प्रवेश हुआ। यह एक विलक्षण तत्त्व है; व्यापक वस्तु है। श्यामसमुद्रमें

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