भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२ भक्तिसुधा
भाव लुप्त हो जाते हैं, पर यह बात उसी अवस्थामें है, जहाँ अवलम्बन या आश्रय दोषयुक्त है। व्रजांगनाओंको 'स्मर' है सही, पर किसमें? ‘नृणां निःश्रेयसार्थाय व्यक्तिर्भगवतो नृप' (श्रीमद्भा० १०।२९।१४) में, मनुष्योंका कल्याण करनेके लिये साकाररूपमें प्रकट हुए ब्रह्ममें। उसमें किसी भी तरह जीवोंकी प्रवृत्ति होनेसे उनका कल्याण-ही-कल्याण है। चाहे प्रेमसे, भक्तिसे और चाहे काम, क्रोध, भय, स्नेह आदिसे भी भगवच्चिन्तन होनेसे कल्याण होता है— कामं क्रोधं भयं स्नेहमैक्यं सौहृदमेव च। नित्यं हरौ विदधतो यान्ति तन्मयतां हि ते ॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।१५) कंसको भयसे, शिशुपालको द्वेषसे, गोपियोंको स्नेहसे पूर्णतम पुरुषोत्तम परब्रह्म कल्याण-गुण-गण- निलय, कल्याणदायकके प्रति एकान्त दृढ़निष्ठा हुई। कहा जा सकता है कि वेन भी तो द्वेषी था, उसको भगवद्विषयक एकान्त दृढ़ निष्ठा क्यों नहीं हुई—और शिशुपालको क्यों हुई, जिसने गिनकर भगवान् श्रीकृष्णको सौ गालियाँ दीं ? सबके देखते-देखते उसमेंसे एक ज्योति निकलकर श्रीकृष्णके मुखमें लीन हो गयी। कारण स्पष्ट है कि शिशुपालको भगवान्के अस्तित्वमें दृढ़ निश्चय था और वेन ईश्वरको मानता ही न था, वह तो अपनेको ही सर्वेश्वर प्रख्यात करता था। कहा है कि प्राणी भय या कामसे जितनी अधिक तन्मयताको प्राप्त होता है, उतना अन्य किसी प्रकारसे नहीं होता है—'यथा कामाद् भयाद्वाऽपि मर्त्यस्तन्मयता- मियात्।' शिशुपाल और कंसका भी यही हाल था—बैठते, सोते, चलते, खाते, घूमते हुए उन्हें कृष्ण-ही-कृष्ण दिखलायी पड़ते थे, सारा जगत् उनके लिये कृष्णमय था— आसीनः संविशंस्तिष्ठन् भुञ्जानः पर्यटन् महीम्। चिन्तयानो हृषीकेशमपश्यत् तन्मयं जगत्॥ (श्रीमद्भा० १०।२।२४) भृंगीकीटन्यायसे जीवमें तल्लीनता होनी चाहिये। दृढ़ अभिनिवेशवश जहाँ नहीं, वहाँ भी उसकी प्रतीति हो। सिद्धान्त भी तो यही है 'अस्तीत्येवोपलब्धव्यम्', परंतु वेनको यह निश्चय नहीं था। प्रसंगमें गोपांगनाओंका काम शिशुपालके द्वेषसे कहीं बढ़कर था। इनकी निष्ठा बहुत ऊँची थी। इस प्रकार इनका काम विषय या आलम्बनकी महिमासे महामहिम हुआ। अतः किसी वस्तुका माहात्म्य विषयकी महत्तासे महत्त्ववान् होता है। इस प्रसंगमें एक बड़ी सुन्दर सूक्ति है— प्रथयति नवनीतचोरतां ते व्रजयुवतीजनजारतां जनो यो। वितरसि निजभावमीश तस्मै स्वकृतधियो परिगोपनाय नूनम् ॥ अर्थात् हे प्रभो ! जो आपकी माखनचोरी और गोपियोंके साथ जारभावका प्रख्यापन करता है, आपको 'चोरजारशिखामणि' नामसे बदनाम करता है, उसे आप निजभाव—अपना रूप दे देते हैं, अपनेमें मिला लेते हैं, मुक्त कर देते हैं। यह इसलिये नहीं कि आप उसपर दया करते हैं, अपितु इसलिये कि यह अलग रहकर हमारी निन्दा करता फिरेगा और जब अपनेमें मिला लिया तो वह भी अपने ही जैसा हो गया, फिर निन्दा किसकी करेगा ? यह भक्त कविकी अपने प्रसाधनपर मीठी व्यंग्य छार है। भाव यह है कि उस विशुद्ध पूर्णतम तत्त्वके चोर एवं जाररूपमें किये गये चिन्तनसे भी पूर्ण पद प्राप्त होता है। भगवान्को व्रजयुवतीजनका जार बताया, परंतु वह जार यह लौकिक जार नहीं जो 'जरयति आत्मविज्ञानं निःश्रेयसम्' से ख्यात होता है। गोपियोंका जार तो अलौकिक है। वह तो 'जरयति अविद्या तत्कार्यात्मकं प्रपञ्चं यः स जारः' है। 'जरयत्याशु या कोशं निगीर्णमनलो यथा ॥' (श्रीमद्भा० ३।२५।३३)— की तरह अथवा 'ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुतेऽर्जुन !' की तरह यह तो प्राणमय, अन्नमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनन्दमयादि पंच कोषोंको जलानेवाला जार है। उत्तप्त वियोगाग्निसे समस्त