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भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

६२ भक्तिसुधा

भाव लुप्त हो जाते हैं, पर यह बात उसी अवस्थामें है, जहाँ अवलम्बन या आश्रय दोषयुक्त है। व्रजांगनाओंको 'स्मर' है सही, पर किसमें? ‘नृणां निःश्रेयसार्थाय व्यक्तिर्भगवतो नृप' (श्रीमद्भा० १०।२९।१४) में, मनुष्योंका कल्याण करनेके लिये साकाररूपमें प्रकट हुए ब्रह्ममें। उसमें किसी भी तरह जीवोंकी प्रवृत्ति होनेसे उनका कल्याण-ही-कल्याण है। चाहे प्रेमसे, भक्तिसे और चाहे काम, क्रोध, भय, स्नेह आदिसे भी भगवच्चिन्तन होनेसे कल्याण होता है— कामं क्रोधं भयं स्नेहमैक्यं सौहृदमेव च। नित्यं हरौ विदधतो यान्ति तन्मयतां हि ते ॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।१५) कंसको भयसे, शिशुपालको द्वेषसे, गोपियोंको स्नेहसे पूर्णतम पुरुषोत्तम परब्रह्म कल्याण-गुण-गण- निलय, कल्याणदायकके प्रति एकान्त दृढ़निष्ठा हुई। कहा जा सकता है कि वेन भी तो द्वेषी था, उसको भगवद्विषयक एकान्त दृढ़ निष्ठा क्यों नहीं हुई—और शिशुपालको क्यों हुई, जिसने गिनकर भगवान् श्रीकृष्णको सौ गालियाँ दीं ? सबके देखते-देखते उसमेंसे एक ज्योति निकलकर श्रीकृष्णके मुखमें लीन हो गयी। कारण स्पष्ट है कि शिशुपालको भगवान्के अस्तित्वमें दृढ़ निश्चय था और वेन ईश्वरको मानता ही न था, वह तो अपनेको ही सर्वेश्वर प्रख्यात करता था। कहा है कि प्राणी भय या कामसे जितनी अधिक तन्मयताको प्राप्त होता है, उतना अन्य किसी प्रकारसे नहीं होता है—'यथा कामाद् भयाद्वाऽपि मर्त्यस्तन्मयता- मियात्।' शिशुपाल और कंसका भी यही हाल था—बैठते, सोते, चलते, खाते, घूमते हुए उन्हें कृष्ण-ही-कृष्ण दिखलायी पड़ते थे, सारा जगत् उनके लिये कृष्णमय था— आसीनः संविशंस्तिष्ठन् भुञ्जानः पर्यटन् महीम्। चिन्तयानो हृषीकेशमपश्यत् तन्मयं जगत्॥ (श्रीमद्भा० १०।२।२४) भृंगीकीटन्यायसे जीवमें तल्लीनता होनी चाहिये। दृढ़ अभिनिवेशवश जहाँ नहीं, वहाँ भी उसकी प्रतीति हो। सिद्धान्त भी तो यही है 'अस्तीत्येवोपलब्धव्यम्', परंतु वेनको यह निश्चय नहीं था। प्रसंगमें गोपांगनाओंका काम शिशुपालके द्वेषसे कहीं बढ़कर था। इनकी निष्ठा बहुत ऊँची थी। इस प्रकार इनका काम विषय या आलम्बनकी महिमासे महामहिम हुआ। अतः किसी वस्तुका माहात्म्य विषयकी महत्तासे महत्त्ववान् होता है। इस प्रसंगमें एक बड़ी सुन्दर सूक्ति है— प्रथयति नवनीतचोरतां ते व्रजयुवतीजनजारतां जनो यो। वितरसि निजभावमीश तस्मै स्वकृतधियो परिगोपनाय नूनम् ॥ अर्थात् हे प्रभो ! जो आपकी माखनचोरी और गोपियोंके साथ जारभावका प्रख्यापन करता है, आपको 'चोरजारशिखामणि' नामसे बदनाम करता है, उसे आप निजभाव—अपना रूप दे देते हैं, अपनेमें मिला लेते हैं, मुक्त कर देते हैं। यह इसलिये नहीं कि आप उसपर दया करते हैं, अपितु इसलिये कि यह अलग रहकर हमारी निन्दा करता फिरेगा और जब अपनेमें मिला लिया तो वह भी अपने ही जैसा हो गया, फिर निन्दा किसकी करेगा ? यह भक्त कविकी अपने प्रसाधनपर मीठी व्यंग्य छार है। भाव यह है कि उस विशुद्ध पूर्णतम तत्त्वके चोर एवं जाररूपमें किये गये चिन्तनसे भी पूर्ण पद प्राप्त होता है। भगवान्को व्रजयुवतीजनका जार बताया, परंतु वह जार यह लौकिक जार नहीं जो 'जरयति आत्मविज्ञानं निःश्रेयसम्' से ख्यात होता है। गोपियोंका जार तो अलौकिक है। वह तो 'जरयति अविद्या तत्कार्यात्मकं प्रपञ्चं यः स जारः' है। 'जरयत्याशु या कोशं निगीर्णमनलो यथा ॥' (श्रीमद्भा० ३।२५।३३)— की तरह अथवा 'ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुतेऽर्जुन !' की तरह यह तो प्राणमय, अन्नमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनन्दमयादि पंच कोषोंको जलानेवाला जार है। उत्तप्त वियोगाग्निसे समस्त

किरातिनियोंका स्मररोग ६३ पाप-तापोंको दग्ध कर देनेवाला जार है। यहाँ 'नातप्ततनुर्न तदामोऽश्नुते दिवम्' की बात ही नहीं रह जाती, जो फिर परिपक्व हो। पर यह तभी है, जब निर्निमित्त भावसे भक्ति हो। कहा है—'अनिमित्ता भागवती भक्तिः सिद्धेर्गरीयसी।' (श्रीमद्भा० ३। २५। ३३) चिन्तामणिमें दीपक-बुद्धिसे प्रवृत्त होनेपर भी जैसे मिलेगी चिन्तामणि ही, वैसे ही नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्तस्वभाव, पूर्णतम पुरुषोत्तममें जार-बुद्धिसे प्रवृत्त होनेपर भी मिलेगा वही तत्त्व, जो अखण्ड, अनन्त, अचिन्त्य, अव्यक्त, कूटस्थ, साक्षि-भास्य है। गोपियोंको उनकी एकान्त दृढ़ निष्ठासे वही मिला। इस तरह गोपियोंका काम विषयकी महत्तासे महत्त्ववान् हुआ है। श्रीकृष्ण-वियोग-ताप-शान्त्यर्थ कुंकुम-लिप्त श्रीव्रजदेवियोंके वक्षोजोंसे श्रीकृष्णके पादपद्मोंमें संलग्न जो कुंकुम था, वही उनके गोचारणार्थ वनमें आनेसे तृणोंमें लगा। उसके दर्शन करनेसे पुलिन्दियोंको— शबर रमणियोंको कामरूप रोग उत्पन्न हुआ अथवा 'स्मरो वा व आशायो भूयान्' से स्मरका अर्थ जब उत्कट उत्कण्ठा लिया गया, तब यह अर्थ हुआ कि उस कुंकुमके दर्शनसे उन किरातिनियोंको साक्षात् श्रीकृष्णकी दिव्य सौन्दर्य-माधुर्य-सौगन्ध्योपेत लावण्यामृतमूर्तिके दर्शनकी तीव्र अभिलाषा हुई। उसके पूर्ण न होनेसे हृदयमें श्रीकृष्ण-वियोग-तापका वेगवान् उदय हुआ। उसे मिटानेके लिये तृणोंमें संलग्न उसी कुंकुमको उन सबोंने अपने मुख और वक्षःस्थलमें लगाया—'लिम्पन्त्य आननकुचेषु....।' (श्रीमद्भा० १०।२१।१७) परंतु इससे भी उनकी व्याकुलता, व्यग्रता मिटी नहीं, प्रत्युत जब और भी बढ़ती गयी, तब उन्हें संशय हुआ कि कहीं यह कुंकुम ही तो हमारी आधि-मानसी व्यथाका कारण नहीं है? तुरंत उन्हें यही निश्चय भी हो गया और उसे उन्होंने 'आधिं मत्वा जहुः' अर्थात् मानसी व्यथाका कारण समझकर त्याग दिया। इसपर श्रीकृष्ण- प्रणय-प्रमत्त गोपियाँ कहती हैं—हमारे अंगमें लिप्त कुंकुम श्रीव्रजेन्द्रनन्दन श्यामसुन्दरके सुकोमल श्रीचरणोंमें लगा था। उसे देखनेमात्रसे ही इन पुलिन्दियोंको रोग उत्पन्न हुआ, असह्य मानसी व्यथा हुई, अतः इन्होंने उसे त्याग दिया। हाँ सखि! हम इतनी बड़ी हतभागा हैं कि जिनके अंग-संलग्न वस्तुके देखनेसे भी लोगोंमें रोग उत्पन्न होता है। अथवा 'तद्दर्शनस्मररुजः' का यह अर्थ है कि उन भिल्लपुरन्ध्रियोंने श्रीकृष्ण-चरणसंसक्त उस कुंकुमका दर्शन किया, अवघ्राण किया और स्पर्श किया। इससे उन सबोंने अपनी सब मनोव्यथाओंका त्याग किया— अर्थात् वे भगवद्भावापन्न हो गयीं। बात यह हुई कि उस विलक्षण आकर्षक कुंकुमके दर्शन आदिसे ही उन किरात-कामिनियोंको श्रीकृष्णदर्शनविषयक उत्कट उत्कण्ठा हुई और श्रीकृष्ण-दर्शन न होनेसे उन्हें तीव्रातितीव्र ताप हुआ। उत्कट उत्कण्ठासे जब तीव्र ताप होगा, तभी श्रीकृष्ण परब्रह्मका दर्शन हो सकेगा, नहीं तो कल्प-कल्पान्तरोंसे, युग-युगान्तरोंसे जीव भगवद्विमुख है, पर उसे कहाँ तीव्र वियोग ताप होता है? अतः उत्कट उत्कण्ठाकी ही प्रथम अपेक्षा है। उसका भी मूल वही कुंकुम है। वह कुंकुम साधारण कुंकुम नहीं, अपितु प्रथम वह श्रीवृषभानुनन्दिनीके उरोजमें संलग्न था, फिर वहींसे श्रीव्रजेन्द्रनन्दन श्यामसुन्दरके श्रीचरणोंमें संपृक्त हुआ। उसीके दर्शनसे पुलिन्दियोंको श्रीकृष्ण-दर्शनकी उत्कट उत्कण्ठा हुई और उसके पूर्ण न होनेके कारण उत्पन्न हुए तीव्रातितीव्र तापसे उनके हृदयमें इतना अधिक दुःखका आविर्भाव हुआ कि अनेक कल्पोंके दुःख उसमें समा गये और दग्ध हो गये। इनके साथ ही कुंकुम- परम्परासे पूर्णतम पुरुषोत्तमके श्रीचरणसम्पर्कसे इतना अधिक अनन्तानन्तगुणित आनन्द प्राप्त हुआ कि उससे वे पूर्ण हो गयीं, कृतकृत्य हो गयीं। श्रीमद्वल्लभाचार्य कहते हैं—उस कुंकुमके दर्शनसे, उसके विलिम्पनसे इन भिल्लिनियोंमें श्रीराधा-स्वरूपका अथवा श्रीलक्ष्मी-स्वरूपका प्रवेश हुआ। यह एक विलक्षण तत्त्व है; व्यापक वस्तु है। श्यामसमुद्रमें

श्रीराधा माधुर्याधिष्ठात्री महाशक्ति है। तब तत्त्वज्ञानी भी आत्माराम होते हैं, तब पूर्णतम पुरुषोत्तमका रमण बाह्य वस्तुमें कैसे हो सकता है? उनका तो अपनेमें ही रमण बनता है। श्रीजानकीरमण, श्रीराधारमण, गिरा और अर्थकी तरह, जल और वीचिकी तरह अभिन्न हैं। गोस्वामी तुलसीदासजीने कहा है— 'गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न। बंदउँ सीता राम पद....।।' (रा०च०मा० १।१८)। महाकवि कालिदासने भी श्रीपार्वतीरमणको वाणी और अर्थकी तरह अभिन्न बतलाया है— 'वागर्थाविव सम्पृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये। जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ।।' (रघुवंश १।१) श्रीजानकी, श्रीराधा, श्रीपार्वती आदि उस अखण्ड, अनन्त, अचिन्त्य, अव्यक्त, आनन्दसागर परब्रह्मकी तरंग आदिकी तरह निजी अभिन्न वस्तु हैं। इससे भी अन्तरंग भाव जल और उसके माधुर्यके अभेदका है। यों उस परम तत्त्वका अपनेमें ही रमण सम्भव है। इन किरातिनियोंमें कुंकुम-सम्बन्धसे श्रीराधा- रूपका उदय हुआ। उससे उनमें वही अन्तरंगता आयी और उस दिव्य तत्त्वके रमणका अनुभव उन्हें हुआ। अतः उन्होंने 'आधिं जहुः' मानसी व्यथाको त्यागा और पूर्ण हो गयीं। जैसे प्रभु श्रीराधाको मिले, वैसे ही किरातिनियोंको भी मिले, क्योंकि 'ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्' (गीता १३।१७)- के अनुसार वह पूर्णतम तत्त्व सर्वत्र ही अव्याहत- रूपसे वर्तमान है। अतः दीन-हीन दशामें भी हताश होनेकी आवश्यकता नहीं है। आवश्यकता है उत्कट उत्कण्ठासे प्रभु-स्मरण और प्रभुके साथ सम्बन्ध स्थापित करनेकी। फिर तो किरातिनियोंकी ही तरह सभी पूर्ण हो सकते हैं।

वेणुगीत

श्रीवेणुगीतमें श्रीगोपांगनाओंकी आसक्तिका वर्णन है, पीछेके प्रकरणमें श्रीवृन्दावनधामकी वर्षा और शरद्-ऋतुओंका वर्णन हो चुका है। वहाँ कहा गया है कि वनसे आनेवाली परम सौगन्ध्य-सौरस्यसम्पन्न अनेकविध पुष्पोंके समशीतोष्ण वायुका आलिंगन करके श्रीवृन्दावन एवं व्रजके समस्त जनोंने तो तिग्मरश्मिजन्य ताप भुला दिया, किंतु गोपांगनाओंका अपने निरतिशय निरुपाधिक परमप्रेमास्पद प्रियतम श्रीकृष्णवियोगसे जन्य ताप शान्त नहीं हुआ— आश्लिष्य समशीतोष्णं प्रसूनवनमारुतम्। जनास्तापं जहुर्गोप्यो न कृष्णहृतचेतसः॥ (श्रीमद्भा० १०।२०।४५) राजा परीक्षित्से श्रीशुकदेवजीने कहा कि वर्षाकालके व्यतीत होनेपर जब शरद्-ऋतुका आगमन हुआ, तब श्रीवृन्दावनधामके सरित-सरोवर आदि जलाशयोंके जल स्वच्छ तथा निर्मल हो गये। नाना प्रकारके कमल-कमलिनी, कुमुद-कुमुदिनीके समुदायोंकी मनोहर सुरम्य सुगन्धिसे सुगन्धित मन्द शीतल समीरसे श्रीवृन्दारण्यधाम परम-रमणीय हो गया। उसी समय परमानन्दरसामृतमूर्ति भगवान् श्रीकृष्णने गौओं तथा गोपवृन्दोंके साथ श्रीवृन्दावनधाममें प्रवेश किया। इत्थं शरत्स्वच्छजलं पद्माकरसुगन्धिना। न्यविशद् वायुना वातं सगोपालोऽच्युतः॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।१) कुछ आचार्योंके मतानुसार इस अध्यायमें श्रीगोपांगनाओंका आसक्तिनिरोध वर्णित है। निरोध तीन प्रकारका होता है—(१) प्रेमनिरोध, (२) आसक्तिनिरोध और (३) व्यसननिरोध। पहले राग होनेसे कुछ काल-पर्यन्त प्रियतमसे अन्यका विस्मरण होता है, यही 'प्रेमनिरोध' या 'रागनिरोध' है। ऐश्वर्य-माधुर्यव्यंजक विभिन्न लीलाओंसे प्रेमनिरोधका वर्णन है। प्रियतमका अधिकाधिक स्मरण होनेसे उसमें आसक्ति होकर अन्यका विस्मरण होता है, वही 'आसक्तिनिरोध' कहा गया है। यहाँ गोपांगनाओंके

वेणुगीत ६५ आसक्तिनिरोधका वर्णन है। आगे चलकर उस आसक्तिके अधिकाधिक गाढ़ होनेसे उसका छूटना असम्भव हो जाता है। अतः वह व्यसनरूप हो जाता है। इसीलिये वह ‘व्यसननिरोध’ कहा जाता है। इसका वर्णन रासपंचाध्यायी, युगलगीतमें है। सर्वविस्मरणपूर्वक निरतिशय निरूपाधिक परमप्रेमास्पद प्रियतम श्रीकृष्ण स्वरूपमें श्रीव्रजांगनाओंकी तन्मयता ही ‘आसक्तिनिरोध’ है। जितनी अधिक तन्मयता, उतना ही अधिक विश्वविस्मरण होता है। अत्र सर्गो विसर्गश्च स्थानं पोषणमूतयः। मन्वन्तरेशानुकथा निरोधो मुक्तिराश्रयः॥ (श्रीमद्भा० २।१०।२) इस दशविध पुराणलक्षणान्तर्गत निरोधका लक्षण, अपनी समस्त शक्तियोंके सहित अखण्ड, अनन्त आत्मस्वरूप भगवान्‌का शयन कहा गया है— ‘निरोधोऽस्यानुशयनमात्मनः सह शक्तिभिः।’ (श्रीमद्भा० २।१०।६) इस मतमें महाप्रलय ही निरोध है। सृष्टिकालमें शक्तियाँ कार्यरूपमें परिणत होती हैं और प्रलयकालमें समस्त कार्य स्वकारणभूत शक्तियोंमें लीन हो जाता है और भगवान् स्वस्वरूपभूत उन शक्तियोंको साथमें लेकर उसे अपने स्वरूपमें लीन करके शयन करते हैं। जैसे अंकुर, नाल, स्कन्ध, शाखा, उपशाखा, पत्र, पुष्प, फल, सौगन्ध्य, सौरस्यादिके उत्पादनानुकूल समस्त शक्तियाँ बीजमें निहित होती हैं, वैसे ही परब्रह्म अखिल ब्रह्माण्डोत्पादिनी शक्तियोंको साथ लेकर प्रलयावस्थामें शयन करते हैं। यहाँ ब्रह्मका शयन वास्तविक न होकर सुप्तशक्तियोंके कारण औपचारिक है; क्योंकि ‘भागवत’ में ही अन्यत्र ब्रह्मको ‘सुप्तशक्तिरसुप्तदृक्’ (श्रीमद्भा० ३।५।२४) कहा गया है। ‘सुप्ताः शक्तयो यत्र असौ सुप्तशक्तिः’ इस तरह प्रलयावस्थामें शक्तियाँ विद्यमान होती हुई भी कार्यकरणक्षम नहीं रहतीं। ब्रह्म तो अखण्ड, अनन्त, स्वप्रकाशबोधस्वरूप होनेसे ‘असुप्तदृक्’ है। उपनिषदोंने भी कहा है कि ‘द्रष्टा- सर्वभासककी दृष्टिका स्वरूपभूत अखण्डभानका लोप कभी नहीं होता। हाँ, भगवान् भी महाप्रलयकालमें प्रपंचोत्पादनादि व्यापारसे विवर्जित होनेसे शयन-से सोते हुए-से प्रतीत होते हैं। उस अखण्ड अनन्तबोधका— ज्ञानका भी अस्त-उदय नहीं होता, वह सदा ही एकरस बना रहता है’—‘नास्तमेति न चोदेति।’ घटादिकी उत्पत्तिके पूर्व कुलालको उनका ज्ञान रहता है, फिर तदनुसार वह घटादिको उत्पन्न करता है। ‘आसीज्ज्ञानमथो ह्यर्थ एकमेवाविकल्पितम्।’ (श्रीमद्भा० ११।२४।२) अर्थात् प्रलयावस्थामें शुद्ध ज्ञान और प्रकृति-प्रपंचरूप अर्थ दोनों मिले हुए ही थे। यहाँ ज्ञान पदसे घटादि ज्ञान नहीं, अपितु ‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ यह ज्ञान लिया गया है। इस तरह समस्त दार्शनिक सिद्धान्तानुसार अपनी समस्त शक्तियोंके साथ आत्माका सो जाना ही निरोध है, परंतु कुछके मतानुसार अखिल विश्वका विस्मरणपूर्वक भगवान्‌में मनकी तन्मयता ही निरोध है। भगवान्‌के श्रीचरणोंमें अनुराग होना लोकोत्तर सौभाग्य है पहले प्रेमास्पदके अद्भुत गुण, उसकी अद्भुत अचिन्त्य महिमा एवं ऐश्वर्यके ज्ञान तथा सौरस्य, सौगन्ध्य आदिके अनुभवसे उसमें राग होता है। विष्णुसहस्रनाम, गीता आदिमें अनुराग होनेके लिये पहले उनके माहात्म्य-पाठका विधान है। अतः यहाँ भी पहले अध्यायोंमें पूतना-वध, गोवर्द्धनोद्धारण आदिसे भगवान् श्रीकृष्णमें राग-प्रेम उत्पन्न होनेके लिये उनका महत्त्व बतलाया गया है। यहाँ आसक्तिनिरोधका वर्णन है और व्यसननिरोध रासलीलाके बाद युगलगीतमें वर्णन किया गया है। राग, आसक्ति एवं व्यसन वैसे तो निन्द्य एवं त्याज्य ही हैं, किंतु कहीं-कहीं आलम्बनकी महत्तासे इनका महत्त्व बढ़ जाता है। लौकिक स्त्री, पुत्र, धनादिमें राग एवं आसक्ति पतनका मूल है, किंतु यही राग और आसक्ति यदि भगवान्‌के श्रीचरणोंमें हो जाय तो क्या कहना है, ऐसा तो किसी महानुभावको ही लोकोत्तर सौभाग्य हो सकता है।

६६ भक्तिसुधा यही बात व्यसनके सम्बन्धमें भी है, माता, पिता, गुरुजन, शास्त्र और स्वयं अपने-आपद्वारा सहस्रधा प्रयत्न करनेपर भी जो छुड़ाये न छूटे, वही व्यसन कहा जाता है। वही व्यसन यदि सांसारिक पदार्थोंका हो तो वह पतनका मूल है, उसका तो नाश ही इष्ट है, परंतु भगवत्प्रेम-व्यसन तो बड़ी कठिनाईसे सम्पादन किया जाता है। ऐसा व्यसन सनकादि, शुकादि, काकभुशुण्डि आदिमें ही देखनेमें आता है— 'आसा बसन ब्यसन यह तिन्हहीं। रघुपति चरित होइ तहँ सुनहीं।' (रा०च०मा० ७।३२।६) श्रीहनुमान्‌जीका भी ऐसा ही व्यसन है कि जहाँ-जहाँ श्रीमद्राघवेन्द्र भगवान् रामचन्द्रके मंगलमय परमपवित्र चरित्रोंका कीर्तन होता है, वहाँ-वहाँ मस्तकपर अपने अंजलिबद्ध हस्तको रखे हुए आनन्दाश्रुसे पूर्णलोचन होकर खड़े रहते हैं— यत्र यत्र रघुनाथकीर्तनं तत्र तत्र कृतमस्तकाञ्जलिम्। वाष्पवारिपरिपूर्णलोचनं मारुतिं नमत राक्षसान्तकम्॥ प्राकृतजनोंको कोई बात समझानी हो तो लौकिक दृष्टान्त रखना पड़ता है। इसीलिये श्रीरघुनाथजीके प्रति अपने प्रेमको दिखलानेके लिये श्रीगोस्वामी तुलसी-दासजीने कहा है— कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम। तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम॥ (रा०च०मा० ७।१३० (ख)) लाम्पट्य अत्यन्त निन्द्य है, परंतु मनोमिलिन्द यदि भगवच्चरणाम्बुजमकरन्दमधुका लम्पट हो तो यह कितने सौभाग्यकी बात हो? साधारण दृष्टिसे राग, आसक्ति एवं व्यसन अत्यन्त निन्द्य हैं, किंतु सर्वात्मा, सर्वाधिष्ठान, अचिन्त्यानन्त आनन्द- सुधाजलनिधि श्रीकृष्णमें प्रेम-निरोधादिका होना उनके बिना क्षणभर भी रह न सकना कितना दुर्लभ है? आज तो संसारकी यह स्थिति है कि विषयचिन्तन, स्त्री-पुत्र-धनादिके चिन्तनके बिना रहना कठिन हो रहा है, किंतु इस चिन्तनको वहाँसे हटाकर यदि भगवच्चरण-पंकजका चिन्तन न किया तो 'पुनरपि जननं पुनरपि मरणम्' के चक्रसे निकलना कठिन होगा। भगवान्‌का वृन्दावन-आगमन श्रीगोपांगनाओंके आसक्तिनिरोधको दिखलानेके लिये श्रीशुकदेवजीने कहा कि भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र गो, गोवत्स, गोपाल, बलराम आदिके साथ श्रीवृन्दारण्यधाममें पधारे— इत्थं शरत्स्वच्छजलं पद्माकरसुगन्धिना। न्यविशद् वायुना वातं सगोपालकोऽच्युतः॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।१) जल-क्रीड़ाके लिये स्वच्छ सुगन्धित जलका होना आवश्यक है। इसलिये श्रीवृन्दावनने भगवान्‌की क्रीड़ाके लिये आनन्द-सामग्रीको प्रस्तुत कर दिया। शरद्-ऋतुके सम्बन्धसे श्रीयमुना, राधाकुण्ड आदि सरित्-सरोवरोंके जल अत्यन्त स्वच्छ-निर्मल हो गये और एक पद्मकी कौन कहे, पद्मके आकर विकसित हुए। कुमुद-कुमुदिनी, कमल-कमलिनीके अनन्त समुदायके मादक मोहक दिव्य सौगन्ध्यसे मिश्रित समीरद्वारा समस्त वृन्दारण्यधाम आविष्ट हो गया— गमक उठा। पद्मका सौगन्ध्य बड़ा अलौकिक होता है। उसके आभोग, पत्र, पराग, मधु आदिमें भी विलक्षण सौगन्ध्य, सौन्दर्य, सौरस्य होता है। चम्पक, केतकी आदिमें भी आभोग, पराग, मधु, सौगन्ध्य आदि होते हैं, किंतु पद्मका मधुर, मन्द, मादक सौगन्ध्य कुछ और ही वस्तु है। भ्रमरको वह अन्यापेक्षया विशेष प्रिय है। इसीलिये कवियोंने पद्मकी ही शोभाका विशेषरूपसे वर्णन किया है। अतः ऐसे दिव्य सौगन्ध्यसम्पन्न पद्मोंके सुगन्धसे मिश्रित वायुसे व्याप्त वृन्दारण्यमें श्रीकृष्ण पधारे। वृन्दावनधामके तरु, लता, तृण, पल्लव, फल, पुष्प, सरित्, सरोवर, भूमि आदि सभीमें भगवान् श्रीकृष्णका अन्तरंग निवेश हुआ, एतावता वृन्दारण्यधाम श्रीकृष्णमय हो गया; क्योंकि श्लोकमें 'न्यविशत्' पदका प्रयोग हुआ है, जिसमें 'नि' का अर्थ नितरां— अत्यन्त है। बात ठीक भी है, क्योंकि अप्राकृत

वेणुगीत ६७ भगवान्‌की लीला प्राकृत पदार्थोंसे नहीं हो सकती है, इसलिये निखिल रसामृतमूर्ति श्रीकृष्णने वृन्दावन- स्थित सकल तत्त्वोंमें अन्तरंगतया निविष्ट होकर उन्हें रसमय, अप्राकृत बना लिया। अब श्रीकृष्णकी उनसे क्रीड़ा ठीक-ठीक तरहसे हो सकेगी। श्रीवल्लभाचार्यके मतमें श्रीकृष्णका यह वृन्दावनधाममें निवेश सरित्-सरोवर वनतरुओंमें स्थित आधिदैविकी शक्तिके साथ रमण है। भगवत्-सम्मिलनके लिये केवल व्रजांगनाएँ ही नहीं, परा-अपरा प्रकृति सब लालायित हैं। वृन्दावनधामके तरु, लता, गुल्म, सरसी आदि सभी भगवत्-सम्मिलनके लिये लालायित हैं। अतः भगवान्‌ने निवेश एवं वेणुकूजनरूप उद्बोधनसे वनदेवताओंको निजागमन सूचित किया, जिससे वे परमात्मरतिके लिये सजग हो जायँ। लौकिक कामिनीका रमण प्राकृत होता है, किंतु यहाँ श्रीकृष्णका श्रीवनदेवियों आदिके साथ अप्राकृत आन्तर रमण है। उसी रमणके लिये वेणुकूजनद्वारा वनदेवताओंका उद्बोधन किया गया— कुसुमितवनराजिशुष्मिभृङ्ग- द्विजकुलघुष्टसरःसरिन्महीध्रम् । मधुपतिरवगाह्य चारयन् गाः सहपशुपालबलश्चकूज वेणुम् ॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।२) श्रीवृन्दारण्यकी शोभा श्रीवृन्दारण्यकी शोभाका वर्णन क्या किया जाय? फूले हुए वनोंकी पंक्तियोंसे सुशोभित मत्तभ्रमरावलीके मधुर गुंजार एवं पक्षिगणोंके मनोहर कलरवसे वृन्दावनधामके सरोवर, सरिता, वृक्ष, लता, पर्वतादि परम शोभित और निनादित हो रहे हैं। कहीं कांचनमयी भूमिमें मरकतमणिमयी श्यामल दूर्वाएँ सुशोभित हैं, कहीं मरकतमणिमयी भूमिपर कांचनमयी दूर्वाएँ शोभायमान हैं। कहीं पद्मरागमणिमय वृक्षोंपर स्फटिक मणिमयी दिव्य लताएँ विकसित हैं तो कहीं स्फटिक मणिमय स्वच्छ तरुपर पद्मरागमणिमयी सुन्दर लताएँ विराजमान हैं। कहीं महेन्द्रनीलमणिमयी भूमिपर कांचनमयी दिव्य दूर्वाएँ सुशोभित हो रही हैं तो कहीं कांचनमयी देदीप्यमान भूमिपर महेन्द्रनीलमणिमयी दूर्वाएँ विस्तृत हैं। यह प्राकृत कथाका वर्णन नहीं है। आजका मत तो कहता है कि जो दीखता नहीं, वह है ही नहीं। आज श्रीवृन्दावनकी वह लोकोत्तर शोभा दृष्टिगोचर नहीं होती, अपितु सर्वत्र रूक्षता एवं कण्टकाकीर्ण वृक्ष ही दिखलायी पड़ते हैं। वैसे ही काशीकी भी दिव्य अलौकिक शोभाका वर्णन पुराणोंसे जाना जाता है, किंतु लोगोंको यहाँ भी ईंट, चूना, पत्थर ही दिखलायी देते हैं। कहा जाता है कि आधुनिक वैज्ञानिकोंने समस्त भूमण्डलका पता लगा लिया है, उन्हें सुमेरु, सप्तद्वीप, क्षीरसिन्धु आदि मिले होते तो अवश्य दिखलायी पड़ते, परंतु कहना पड़ेगा कि कुछ ऐसी भी स्थिति है कि जो हो और दिखलायी न पड़े। प्रत्येक वस्तुके दर्शनमें कुछ सुख अथवा कुछ दुःख होता है। अतः मानना पड़ेगा कि वस्तु दिखलायी पड़नेमें पाप-पुण्य- रूप अदृष्टकी भी हेतुता है। क्यों किसी वस्तुको देखनेपर दुःख और घृणा होती है? कोई भी कार्य बिना कारणके नहीं होता। सुख-दुःखको देखकर उनके कारण पुण्य-पापका अनुमान करना चाहिये। अतः यह मानना पड़ता है कि वस्तुदर्शनमें अदृष्टहेतु होनेसे शास्त्रोक्त कुछ वस्तुओंका हमें दर्शन नहीं प्राप्त होता। इसमें हेतु हमारे वैसे अदृष्टका अभाव है, न कि उन वस्तुओंका अभाव। अदृश्य वस्तुकी सत्ताका दृष्टान्त ‘महाभारत’ में एक कथा है कि अलकनन्दामें बहकर आये हुए किसी एक दिव्य सौगन्ध्य, सौन्दर्यसम्पन्न पुष्पको देखकर द्रौपदीने उसकी जोड़ीका दूसरा पुष्प लानेके लिये भीमसेनसे आग्रह किया। भीमसेनने अलकनन्दाके तटसे जाते-जाते बहुत दूरतक जानेपर मार्गमें एक वृद्ध बानरको देखा, जो अपनी पूँछसे मार्गको रोके हुए सोया था। भीमने उससे अपनी पूँछ हटा लेनेके लिये कहा। बानरने उत्तर दिया कि ‘मैं अत्यन्त वृद्ध होनेके कारण उसे हटा सकनेमें

असमर्थ हूँ, तुम हटा लो।' भीमने पहले हाथकी दो अंगुलियोंसे उसकी पूँछ हटाना चाहा, परंतु जब न हटा सके, तब एक हाथसे जोर लगाया। अन्ततः दोनों हाथोंकी पूर्ण शक्तिसे प्रयत्न करनेपर भी जब पूँछ अपने स्थानसे तिलमात्र भी न हटी, अपितु मूर्च्छित हो गये, तब थोड़ी देरमें सावधानी आनेपर आश्चर्यचकित होकर उन्होंने वानरसे कहा—'मैंने सुना है कि मेरे भाई कोई हनुमान् नामक हैं, जो अत्यन्त बलवान् हैं, उन्होंने त्रेतामें लंका-विजयमें रामचन्द्रकी बहुत सहायता की थी। क्या आप वही हनुमान् तो नहीं हैं?' यह श्रवणकर वानरने कहा 'हाँ, मैं वही हूँ।' तब भीमसेनने उनको प्रणामकर कहा कि मैं आपका वह दिव्य स्वरूप देखना चाहता हूँ, जिसको धारणकर आपने राक्षसोंका संहार किया था। हनुमान्ने कहा— 'उस रूपको देखनेकी तुम्हारी सामर्थ्य नहीं है। अतः उसको देखनेका आग्रह मत करो।' परंतु भीमने जब अपना आग्रह न छोड़ा, तब भीमके हठको देखकर हनुमान्ने अपना वह कनक भूधराकार परमतेजोमय दिव्यरूप धारण करना आरम्भ किया। अभी पूर्णरूप देख भी न पाये थे कि उसके प्रचण्ड तेजसे भीमकी आँखें झँप गयीं, मूर्च्छित हो गये। हनुमान्ने अपना रूप संवृत्तकर भीमको सावधान किया और कहा कि 'अब तुम यहाँसे ही पीछे लौट जाओ, आगेकी दिव्य सुवर्ण रत्नमयी भूमि आदि देखनेयोग्य तुम्हारी सामर्थ्य एवं योग्यता नहीं है।' ऐसे ही द्वित, त्रित नामक महर्षियोंको घोर तपस्याके बाद भी श्वेतद्वीपमें कुछ नहीं दिखायी दिया। बहुत तपस्याके बाद एक व्यक्तिका दर्शन हुआ। उसने कहा—'इस जन्ममें तुम्हें यहाँ और कुछ न दिखायी देगा, रामावतारमें तुम भगवान्का दर्शन कर सकोगे।' तात्पर्य यह कि प्रत्येक वस्तुके दर्शनमें योग्यताकी अपेक्षा होती है। वह योग्यता धर्माधर्मकृत ही है। इसलिये यह कहना भी संगत नहीं है कि भगवान् दिखलायी नहीं देते, अतः हैं ही नहीं; क्योंकि आजके मनुष्योंकी वैसी योग्यता न होनेसे—पुण्यकी कमीसे उनका दर्शन नहीं होता। अस्तु, श्रीमद्वृन्दावन- धामकी अलौकिक दिव्यशोभाका तो फिर कहना ही क्या है ? अरविन्द, मालती, चम्पक, मल्लिका आदि अनेकविध विकसित पुष्पोंके सौगन्धसे मत्त भृंग और हंस, कारण्डव, चक्रवाक, पारावत, शुक, मयूर आदि विहंगमोंके आनन्दोद्रेकमें—प्रेमोन्मादमें होनेवाले कलरवके झंकारसे जिसके वनराजि, सरोवर, सरित्, सरसी, निर्झर, पर्वत आदि प्रतिध्वनित-निनादित हो रहे हैं, ऐसे श्रीमद्वृन्दारण्यधाममें भगवान् श्रीकृष्ण, बलराम गोपालोंके साथ गौओंको चराते हुए पधारे— 'मधुपतिरवगाह्य चारयन् गाः।' (श्रीमद्भा० १०।२१।२) यहाँ श्रीकृष्णके लिये मधुपति पदका प्रयोग किया गया है। मधु अर्थात् वसन्तके पति— अधिपति ही मधुपति हैं। इसका आशय यह हुआ कि वनमें मधुका—वसन्तका संचार होनेसे ही शोभा बढ़ जाती है, फिर साक्षात् मधुपति—वसन्ताधिपति—का प्रवेश होनेपर तो कहना ही क्या ? इन सबसे यहाँ लीलाभूमि आदिकी महिमा कही गयी। रंगमंचकी सजावटके बिना जैसे वहाँ नाट्यलीला सम्पन्न नहीं हो सकती, वैसे ही यहाँ श्रीकृष्णकी अद्भुत मंगलमयी लीलाके लिये श्रीवृन्दावनकी सजावट अपेक्षित है। इसीलिये इस प्रसंगके पहले श्रीबलरामकी स्तुतिके व्याजसे श्रीवृन्दावनभूमि आदिकी स्तुति की गयी है। श्रीकृष्णने श्रीबलरामसे कहा—ये सब मुनिगण, देवगण हैं, जो वृक्ष, लता, तृण, गुल्म आदिके रूपसे आपके पादस्पर्शके लिये लालायित हैं अथवा आपके चरणोंसे स्पृष्ट भूमिका स्पर्श करके, वन्दन करनेके लिये फल-पुष्पोंसहित झुककर मानो उसका आलिंगन करते हैं अथवा महापुरुषके स्वागतार्थ मानो वृन्दावन स्वयं उनका आतिथ्य करता है। मन्द, सुगन्धित, शीतल वायुके बहनेसे मानो व्यजन कर रहा है, अनेकविध कुमुद-कुमुदिनियोंसे युक्त, उनके मधुर मकरन्दगन्धसे सुगन्धित उद्वेलित सरिताओंसे मानो पाद्य-अर्घ्य दे रहा है।

वेणुगीत ६९ वृन्दावनमें भगवान्‌का आतिथ्य भगवान् श्रीकृष्णकी मधुर मनोहर वंशीध्वनिका श्रवणकर ब्रजकी कामधेनुरूपा गौओंसे क्षीर अपने- आप प्रस्रवित होने लगता है। आनन्दविभोर होनेसे देहभान भूलकर वे गौएँ अविरत बहनेवाली क्षीरधाराको रोकनेमें असमर्थ होती हैं। स्तन्यपानके लिये प्रवृत्त हुए बछड़े भी उस आनन्दसिन्धुमें मग्न होनेके कारण उस क्षीरको पान करना भूल जाते हैं। अतः सतत प्रवाहित होनेवाले क्षीरसे समस्त वृन्दावन भरपूर हो जाता है, उसमें कतिपय अम्लफलोंके योगसे वह क्षीर जमकर दधि हो जाता है। उसमें कथंचित् प्रबल वायुसे आलोड़ित होनेपर हैयंगवीन—मक्खनका भी प्रादुर्भाव हो जाता है एवं उसमें वृक्षोंसे बहनेवाली मधुधाराओंका मिश्रण होनेसे एक विलक्षण मधुपर्क सम्पन्न हो जाता है। वृन्दावन उससे भगवान्‌का अर्हण करता है। मधुधारा, पत्र, पुष्प, पल्लव, फल आदि सामग्रियोंसे नैवेद्य आदि अर्पण करता है। इस तरह समष्टि-व्यष्टिरूपसे वृन्दावन एवं उसके समस्त तत्त्व भगवान्‌का आतिथ्य करते हैं— अहो अमी देववरामरार्चितं पादान्बुजं ते सुमनःफलार्हणम्। नमन्त्युपादाय शिखाभिरात्मन- स्तमोऽपहत्यै तरुजन्म यत्कृतम्॥ एतेऽलिनस्तव यशोऽखिललोकतीर्थं गायन्त आदिपुरुषानुपदं भजन्ते। प्रायो अमी मुनिगणा भवदीयमुख्या गूढं वनेऽपि न जहत्यनघात्मदैवम्॥ (श्रीमद्भा० १०।१५।५-६) यहाँ सन्देह किया जा सकता है कि ये जड़वृक्षादि आतिथ्य कैसे कर सकते हैं? इसलिये कहा गया कि ये वृक्षादि जड़ नहीं, अपितु भगवान्‌के परमप्रिय भक्तगण, योगीन्द्र, मुनीन्द्र एवं देवगण हैं। दूसरोंकी जड़ता मिटानेके लिये उन्होंने जडरूप धारण किया है। इनके दर्शन, श्रवण, स्पर्श करनेसे लोगोंकी जड़ता मिट जाती है—'अन्येषां तमोऽपहत्यै तरुजन्म यत्कृतम्।' अथवा 'तम' का दुःख भी अर्थ होता है, अतः दुःखनिवृत्तिके लिये उन्होंने तरुजन्म ग्रहण किया। आशय यह है कि भगवान्‌के विप्रयोगजन्य अपने तीव्रतापको भगवत्सम्मिलनसे मिटानेके लिये, तरु, लता, गुल्म आदि बनकर श्रीवृन्दावनमें अवतीर्ण हुए कि भगवान् जब गोचारणके लिये यहाँ पधारेंगे, तब उनके स्पर्शसे अपना सन्ताप मिटायेंगे। वे तरु अपनी अपेक्षा भ्रमर एवं विहंगमोंको अधिक सौभाग्यशाली मानते हैं; क्योंकि वे स्वयं स्थानस्वरूपमें होनेके कारण एक ही स्थानपर स्थिर रहते हैं, भगवान् श्रीकृष्ण जब कृपाकर स्वयं वृन्दावनधाममें पधारें, तब उनका सम्मिलन प्राप्त हो, पर ये भ्रमर, विहंगम तो उनके प्रियतम प्राणधन श्रीकृष्ण जहाँ विराजमान होते हैं, वहाँ जाकर उनका दर्शन प्राप्तकर अपना सन्ताप मिटाते हैं। वृन्दावनस्थ सभी तत्त्व भगवान् श्रीकृष्णकी आराधनामें अपना सौभाग्य मानते हैं। जिसके पास जो है, उसीसे वह प्रभुकी आराधना करने लगता है, इस प्रकार गम्भीर गुंजारसे मानो भगवान्‌का यशोगान करते हैं, मयूर नृत्यकर प्रभुको प्रसन्न करना चाहते हैं, हरिण-हरिणी अपने विशाल विस्तृत नेत्रोंसे दर्शन करते हैं, कोकिला प्रेमोन्मादमें अपनी मधुरसूक्तियोंसे प्रभुका स्तवन करती है। कोई यह न समझे कि इन्द्र, लक्ष्मी, कुबेर आदि दिव्यातिदिव्य सामग्रियोंसे पूजा करनेपर भी जिसको प्रसन्न नहीं कर पाते, उस अखिल ब्रह्माण्डनायक, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् भगवान्‌की आराधना मैं साधारण पुरुष कैसे करूँ? क्योंकि भगवान् तो भावप्रिय हैं, वे भावपूर्वक की हुई सबकी सेवा स्वीकार करते हैं। भावविहीन अनन्त पूजा-सामग्रियोंसे उन्हें प्रसन्न नहीं किया जा सकता। भावयुक्त प्रेमसहित अर्पण की हुई साधारण-से-साधारण वस्तुसे, एक तुलसीदल और चुल्लूभर जल चढ़ा देनेसे वे भक्तवत्सल भक्तोंके हाथ बिक जाते हैं— तुलसीदलमात्रेण जलस्य चुलुकेन च। विक्रीणीते स्वमात्मानं भक्तेभ्यो भक्तवत्सलः ॥

७० भक्तिसुधा यहाँ तो श्रीमद्वृन्दारण्यधामके तरु, लता, गुल्म, तृणादि सभी योगीन्द्र मुनीन्द्रगण भगवान्के परमभक्त होनेसे भगवदीयोंमें मुख्य हैं—'प्रायो अमी मुनिगणा भवदीयमुख्याः' अतः भगवान् उनकी की हुई सपर्याको अवश्य स्वीकार करते हैं। जब कोई राजा गुप्तवेषमें प्रयाण करता है, तब उसके नौकर-चाकर भी गुप्तवेषमें उसका अनुसरण करते हैं, वैसे ही यहाँ अनन्त ब्रह्माण्डनायक, अशब्द, अस्पर्श, अरूप, अव्यय, अचिन्त्य, अनन्त, अप्रमेय, नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्तस्वभाव, निर्गुण, निराकार, कूटस्थ, एकरस, सच्चिदानन्दघन, परब्रह्म ही जब अपने उस स्वरूपको छिपाकर अचिन्त्यानन्त अद्भुत सौगन्ध्य, सौरस्य, सौन्दर्य, माधुर्य, लावण्यादि सम्पन्न, परमानन्द- सुधासागर-सारसर्वस्व होकर श्रीमद्व्रजेन्द्रगेहिनी श्रीमन्नन्दरानीके परममंगलमय अंकमें अवतीर्ण हुए, तब उनके परमान्तरंग भक्तगण भी श्रीमद्वृन्दारण्यधाममें तरु, लता, तृण, सरित् आदिके रूपमें प्रादुर्भूत हुए हैं। अतः वे सब भगवदीय हैं, प्रभुने उनकी अर्पण की हुई साधारण पूज्य सामग्रीको बड़े प्रेमसे स्वीकार किया। पृथुने भगवान्से कहा था कि 'भगवन्! आपके मंगलमय जिस चरणारविन्दकी सेवा मैं करता हूँ, लक्ष्मी भी उसीका समाश्रयण करती हैं। ऐसी स्थितिमें लक्ष्मीके साथ कहीं हमारा झगड़ा न हो जाय? ऐसा होनेपर नाथ! आप किसका पक्ष लेंगे? मुझे विश्वास है कि आप तो आप्तकाम, पूर्णकाम, आत्माराम, निष्काम हैं, इसलिये, लक्ष्मीका पक्ष न लेकर मेरा ही साथ देंगे'— अप्यावयोरकपतिस्पृधोः कलि- र्न स्यात्कृतत्वच्चरणैकतानयोः॥ जगज्जनन्यां जगदीश वैशसं स्यादेव यत्कर्मणि नः समीहितम्। (श्रीमद्भा० ४।२०।२७-२८) भगवान्ने पृथुका साथ दिया। लक्ष्मीका निवास भगवान्के विशाल वक्षःस्थलपर है; भक्तोंकी अर्पित पुष्पमालाको भगवान् अपने श्रीकण्ठमें धारण करते हैं। भक्तोंकी दी हुई मालाका त्याग कैसे करें, इसलिये पुष्पोंके कुम्हला जानेपर भी प्रभु अपने वक्षःस्थलपरसे उस मालाका परित्याग नहीं करते। उस मालाके भारसे लक्ष्मी दब जाती हैं, यह सब कष्ट सहन न हो तो लक्ष्मी भले ही छोड़कर चली जायँ, पर भगवान् भक्तकी मालाकी उपेक्षा कैसे कर सकते हैं? बेचारी लक्ष्मी सब सह लेती हैं। सूखी मालाको अपने ऊपर पड़ी देखकर लक्ष्मीको अनुचित प्रतीत होता होगा, पर इससे क्या? परम चंचला लक्ष्मी भगवान्के चरणपंकजको प्राप्तकर पूर्ण निश्चला बन गयी हैं। सपत्नीके साथ भी उन्हें रहना स्वीकार है, पर प्रभुके श्रीचरणको छोड़कर वे नहीं जा सकतीं। ऐसा ही अद्भुत महत्त्व भगवान्के श्रीचरणोंका है। तुलसी भगवान्के श्रीचरणपंकजमें विराजमान है। लक्ष्मीको यद्यपि भगवान्के श्रीवक्षःस्थलपर सम्माननीय निवास प्राप्त है तो भी तुलसीरूप सपत्नीसे एवं भृत्यगणोंसे सेवित भगवान्के श्रीमतपदाम्बुजमकरन्दको ही वे प्राप्त करना चाहती हैं—'श्रीयत्पदाम्बुजरजश्चकमे तुलस्या लब्ध्वापि वक्षसि पदं किल भृत्यजुष्टम्। यस्याः स्ववीक्षणकृतेऽन्यसुरप्रयासः।' (श्रीमद्भा० १०।२९।३७) अस्तु, ऐसे परमसुन्दर श्रीमद्वृन्दारण्यधाममें क्रीड़ा करनेके लिये श्यामसुन्दर व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण पधारे। क्रीड़ा दो प्रकारकी होती है—जल-क्रीड़ा और स्थल-क्रीड़ा। वृन्दावनकी शोभा इस समय दोनों प्रकारकी क्रीड़ाओंके लिये उपयुक्त है। स्वच्छ जलसे परिपूर्ण सरसी, सरित्, सरोवरोंसे सज्ज होनेके कारण जल-क्रीड़ामें एवं पद्माकर सुगन्धि वायुसे व्याप्त होनेसे स्थल-क्रीड़ामें उपयुक्त है—'इत्थं शरत्स्वच्छजलं पद्माकरसुगन्धिना। न्यविशद् वायुना वातम्।' (श्रीमद्भा० १०।२१।१) एतावता उभयविध क्रीड़ाकी सामग्रीसे सज्यता कही गयी, पर जबतक जिस तत्त्वका भगवत्सम्बन्ध नहीं, तबतक वह नीरस है, अशोभन है, अमंगल है। हिरण्मय ब्रह्माण्डके उत्पन्न होनेपर वह अचेतन था। उसमें प्रविष्ट होकर वहि,

वेणुगीत ७१ वायु, आदित्य आदि देवताओंने उसे उठानेका अपने सामर्थ्यभर बहुत प्रयत्न किया तो भी उस विराट्का उत्थान नहीं हुआ—'नोदतिष्ठत्तदा विराट्।' (श्रीमद्भा० ३।२६।६३) अन्तमें जब भगवान्ने उसमें प्रवेश किया, तब वह उठ सका— चित्तेन हृदयं चैत्यः क्षेत्रज्ञः प्राविशद्यदा। विराट् तदैव पुरुषः सलिलादुदतिष्ठत ॥ (श्रीमद्भा० ३।२६।७०) भगवान्के प्रवेशसे वृन्दावनधाम रसमय हो गया भगवान्के बिना कहीं भी शान्ति नहीं, शोभा नहीं। इसीलिये वृन्दावनके तरु, लता आदि समस्त भगवान्का अपनेसे समागम होनेपर अपनी कृतार्थता मानते हैं। जब सर्वत्र भगवत्प्रवेश हो, तब इनमें रसात्मकता आये। इसीलिये श्रीमद्वृन्दावनमें भगवान् श्रीकृष्णका प्रवेश हुआ। सच्चिदानन्दरूप भगवान् सर्वान्तरात्मा होनेसे सर्वव्यापक हैं, इसलिये यद्यपि वृन्दावनके समस्त तत्त्वोंमें सदंश एवं चिदंश अभिव्यक्त था और आनन्दांश अव्यक्त था, निखिल रसामृतमूर्ति अभिव्यक्त परमानन्द सुधासिन्धु भगवान् श्रीकृष्णके प्रवेशसे सच्चिदंश गौण होकर आनन्दांश पूर्णतया अभिव्यक्त हो गया और समस्त वृन्दावनधाम रसात्मक हो गया। अतएव यहाँ भगवान्का वृन्दावनमें आत्यन्तिक प्रवेश कहा गया है—'न्यविशद् वायुना वातम्।' (श्रीमद्भा० १०।२१।१) (न्यविशत्- नितराम्, अविशत्)। कुसुमित वनराजिसे उन्मत्त भृंग एवं विहंगमोंके निनादसे उद्बुद्ध हुई वनदेवताएँ, वनदेवियाँ श्रीकृष्ण- सम्मिलनके लिये सजग हो उठीं। तब मधुपतिरूपसे श्रीकृष्णका वृन्दावनमें निवेश हुआ। यहाँ 'मधु' चैत्रमासको भी कहते हैं और उसका पति वसन्त हुआ। अतः हरे, पीले, लाल पत्र-पुष्पोंसे सुसज्जित वसन्तके समान अनेकविध वर्णविशिष्ट पत्र-पुष्पादिसे सुशोभित सुन्दर वनमाला धारण किये हुए भगवान् श्रीकृष्ण वृन्दावनधाममें पधारे अथवा 'मधु' शब्दसे वसन्तका भी बोध होता है, अतः तदधिपति वसन्तमें भी अपूर्व शोभाका संचार करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण अपने लोकोत्तर अद्भुत सौरस्य, सौगन्ध्यादिसे वनस्थोंको आह्लादित करते हुए पधारे अथवा सरस शृङ्गाराधिपति ही मधुपति हैं, अतः निखिलरसामृतमूर्ति होनेपर भी विशेषतया शृङ्गाररसामृतमूर्ति श्रीकृष्णने श्रीमद्वृन्दारण्य- धाममें प्रवेश किया। रसमें रसान्तरका संचार होनेसे उसका महत्त्व अधिक हो जाता है और यदि शृङ्गाररसमें शृंगारका प्रवेश हो तो उसके महत्त्वका क्या कहना? ऐसे ही शृंगाररसामृतमूर्ति श्रीकृष्णके निवेशसे समस्त वृन्दावन आह्लादित हो उठा। वनमें निविष्ट होकर श्रीकृष्णने वेणु-कूजन किया। यहाँ 'चुक्कूज' का प्रयोग है अर्थात् 'कूजयामास'। आशय यह है कि श्रीकृष्णके मुखसंस्पर्शमात्रसे वेणु स्वयं गान करने लगा। जड़ वेणु भी शृंगाररसस्वरूप श्रीकृष्णकी अधरसुधाकी विशेषतासे गाने लगा— चेतनका कार्य करने लगा। कहा जा चुका है कि भगवान् श्रीकृष्ण सम्प्रयोगात्मक-विप्रयोगात्मक उद्बुद्ध उभयविध शृंगार- रसात्मा हैं। शृंगार रसके दो भेद हैं—(१) सम्प्रयोग (संयोग)-रूप और (२) विप्रयोग (वियोग)-रूप। श्रीकृष्णकी मूर्ति प्राकृत पुरुषोंके समान अस्थि, चर्म, मांसमय नहीं है, अपितु उभयविध शृंगाररसमय है और वे उभय रस भी उद्बुद्ध हैं, उद्वेलित हैं, पूर्णरूपेण अभिव्यक्त हैं। वैसे तो जिस समय संयोगात्मक शृंगार अनुभूयमान होता है, उस समय वियोगात्मक शृंगारका अनुभव नहीं होता और वैसे ही विप्रयोगात्मक शृंगाररसानुभवकालमें सम्प्रयोगात्मक शृंगाररसका अनुभव नहीं होता, परंतु भगवान् श्रीकृष्णमें यही विशेषता है कि यहाँ उभयविध शृंगाररसका एक कालावच्छेदेन पूर्णप्राकट्य है और दोनोंका अनुभव भी एक ही कालमें हो रहा है। वनदेवियोंको सम्प्रयोगात्मक श्रीकृष्ण और ब्रजदेवियोंको विप्रयोगात्मक श्रीकृष्ण अभिव्यक्त हैं। श्रीकृष्णका दिव्य स्वरूप वनमें है, उससे वनदेवियों-आधिदैविकी शक्तियोंका रमण सम्पन्न

है। यद्यपि गोपांगनाएँ उस समय व्रजमें हैं और गोपालोंके साथ श्रीकृष्ण उनसे दूर हैं तथापि उन्हींके यह उद्बुद्ध सम्प्रयोग शृंगाररसात्मा श्रीकृष्ण अनुभूयमान हैं। सर्वविध क्रियाशक्तिका संचार गोपालोंमें एवं ज्ञानशक्तिका संचार बलभद्रमें है। यह सब स्थिति व्रजदेवियोंको पूर्णतया ज्ञात है। यह आसक्तिकी महिमा है, आसक्तिके प्राखर्यसे दूरस्थ श्रीकृष्णकी सब लीलाएँ व्रजस्थ श्रीगोपांगनाओंको प्रत्यक्ष अनुभूयमान हो रही हैं। विद्या जैसे पंचपर्वा है, वैसे अविद्या भी पंचपर्वा है। अविद्यामें अन्तिम आसक्ति और विद्यामें अन्तिम भक्ति है। इन दोनोंका स्वरूप प्रायः एक ही है। गोपांगनाओंकी श्रीकृष्णविषयिणी आसक्ति अत्यन्त उत्कट थी, उन्होंने समस्त सांसारिक सुख एवं तत्सामग्रियोंको तुच्छ समझ लिया था, श्यामसुन्दर व्रजेन्द्रनन्दन मनमोहन श्रीकृष्ण ही उनके ज्ञेय, ध्येय, परमाराध्यसर्वस्व थे। दूर रहनेपर श्रीव्रजांगनाओंको उनके समस्त रहन-सहन, गति, विलासादिका साक्षात् अनुभव होता है। इसलिये गोपांगनाएँ महायोगीन्द्रकी गतिपर अवस्थित थीं। उन्हें आसक्तिवशात् विप्रयोगकालमें ही भगवान्‌का मानस-सम्मिलन प्राप्त होनेसे संप्रयोगात्मक शृंगारका अनुभव हुआ। उस उद्बुद्ध सम्प्रयोगात्मक-विप्रयोगात्मक उभयविध शृंगाररसात्मक प्रियतम प्राणधन भगवान् श्रीकृष्णस्वरूप वेणुगीतका श्रवणकर व्रजदेवियोंको स्मरोदय हुआ—‘तद् व्रजस्त्रिय आश्रुत्य वेणुगीतं स्मरोदयम्।’ (श्रीमद्भा० १०।२१।३) उत्कण्ठापूर्वक स्मरण ही ‘स्मर’ है। ‘स्मरोवाव आशाया भूयान्’ इस श्रुतिके अनुसार स्मरका तात्पर्य यहाँ काममें नहीं है। अर्थात् वेणुगीतका श्रवणकर गोपांगनाओंको उस वेणुगीतके उद्गमस्थल श्रीकृष्णका अत्यन्त उत्कट उत्कण्ठापूर्वक स्मरण हुआ। ज्यों ही श्रीव्रजांगनाओंके निरावरण कर्णकुहरोंद्वारा वेणुगीत उनके अन्तःकरणमें प्रविष्ट हुआ, त्यों ही श्रीकृष्णस्वरूपके स्मरणकी धारा बह चली। कुछ व्रजांगनाओंके मनमें वस्तुतः कामका भी उदय हुआ। अथवा स्मरोदयका अर्थ ‘स्मरेण स्मरणेन उदयो यस्य’ ऐसा किया। अर्थात् श्रीकृष्ण जब श्रीमद्वृन्दावनमें पधारे, तब यहाँके पद्मामोदित वायुके संस्पर्श एवं भृंगविहंगमोंके कलरवका श्रवणकर उससे उन्हें व्रजदेवियोंका स्मरण हुआ और उसी स्मर— भावविशेषरूप उद्दीपन विभावसे वेणुगीतका उदय हुआ। भगवान् तो वेणुवादनविनोदपरायण हैं, वे रोज ही वेणु बजाते हैं, किंतु आजके वेणुगीतमें कुछ वैशिष्ट्य है। अथवा ‘तासामेव स्मरेण स्मरणेन उदयो यस्य, तं स्मरोदयम्’ अर्थात् विचित्र कोकिला आदिके मधुर शब्दके श्रवणसे वृषभानुनन्दिनी श्रीराधाका स्मरण होनेसे वेणुगीतका उदय हुआ। भगवत्सम्मिलनके लिये उत्कण्ठाके उत्कर्षकी आवश्यकता साधारण भक्त भगवान्‌से मिलनेका उपाय सोचा करता है और उत्कण्ठापूर्वक उनका स्मरण करता रहता है। जब उत्कण्ठा अत्यन्त बढ़ जाती है, तब यही उत्कण्ठा भगवान्‌में चली जाती है और पहले जैसे भक्त भगवान्‌से मिलनेके उपाय सोचा करता था, वैसे ही अब भगवान् भक्तसे मिलनेके उपाय सोचते हैं। कामुक जैसे कामिनीके सम्मिलनके लिये उत्कण्ठित होकर अनेक उपाय सोचता है, वैसे ही भगवान् भी अपनी भक्तिरूपा आह्लादिनीशक्ति परमान्तरंगा माधुर्याधिष्ठात्री महाशक्तिरूपा श्रीमद्वृषभानुनन्दिनी आदिके सम्मिलनके लिये उत्कण्ठित रहते हैं और सोचते हैं कि उनसे मिलनेका कोई उपाय निकालना चाहिये। जैसे कामुक कामिनीको वशमें करनेके लिये किसी मोहनमन्त्रका प्रयोग करें, वैसे ही श्रीकृष्ण श्रीराधा, ललिता, विशाखा आदि परमान्तरंगा ......माधुर्याधिष्ठात्री एवं तदंशभूता व्रजांगनाओंको वशमें करनेके लिये मोहनमन्त्र ढूँढ़ने लगे। फिर उन्होंने वंशीकी आराधना प्रारम्भ की। वेणु-कूजनका प्रभाव यहाँ एक बात बड़े महत्त्वकी है, व्रजांगनाओंने

वेणुगीत ७३ पहले श्रीकृष्ण-प्राप्तिके लिये जैसे कात्यायन्यर्चन- व्रतका अनुष्ठान किया था, वैसे ही भगवान्ने वंशी- आराधन किया, वंशी साक्षात् भगवान् रुद्र हैं— ‘रुद्रस्तु भगवान् वंशः।’ बिना भगवान् शिवकी आराधना किये क्या अभीष्ट फल कभी प्राप्त हो सकता है?—‘इच्छित फल बिनु सिव अवराधें। लहिअ न कोटि जोग जप साधें॥’ (रा०च०मा० १।७०।८) इसलिये श्रीकृष्णने श्रीमद्व्रजांगनाओंकी प्राप्तिके लिये वंशीरूप भगवान् रुद्रका आराधन आरम्भ किया। आराधनाका प्रकार भी विचित्र था। अपने सुमधुर कोमल अधरपल्लवपर वंशीको शयन कराते हैं, अपने अनेक दिव्य रसमणिजटित मुकुटका उसपर छत्र करते हैं, परम देदीप्यमान सुवर्ण मणिमय कुण्डलोंसे आरती उतारते हैं, सुमधुर अधरसुधाका भोग लगाते हैं और अपने कोमल अंगुलिदलोंसे उसका पादसंवाहन करते हैं—पैर दबाते हैं। इस प्रकार आराधन करते-करते श्रीकृष्णको यह जाननेकी इच्छा हुई कि अभी इष्टदेव प्रसन्न हुए या नहीं। इसके लिये वंशीकी परीक्षा चली। एक दिन उसकी ध्वनिसे यमुनाकी गति रुक गयी। वंशीके उस दिव्य प्रभावको देखकर विश्वास बढ़ा, श्रद्धा बढ़ी, इससे पूजा भी बढ़ी, आराधना और तन्मयतासे चलने लगी। एक दिन वृन्दावनके पाषाण वंशीकी ध्वनिको श्रवणकर द्रवीभूत हो गये, पशु-पक्षी, देवताओंके विमान आदिकी गति रुक गयी, सब स्तब्ध हो गये। इस प्रकारसे जब पूर्ण रीतिसे वंशीकी परीक्षा हो गयी, तब श्रीकृष्णने आज गोपांगनाओंके लिये उसे बजाया— ‘तद् व्रजस्त्रिय आश्रुत्य वेणुगीतं स्मरोदयम्।’ (श्रीमद्भा० १०।२१।३) उस वेणुगीतको जैसे श्रीव्रजांगनाओंने सुना, वैसे ही औरोंने भी सुना, परंतु रसिकताके अभाववश औरोंपर उसका प्रभाव न हुआ। ठीक ही है, अरसिकोंसे रसका निवेदन निष्फल ही होता है— ‘अरसिकेषु कवित्वनिवेदनं शिरसि मा लिख मा लिख मा लिख।’ अतः समस्त व्रजवासियोंने उसे सुना, पर रसिकशिरोमणिका कुछ व्रजांगनाओंपर प्रभाव अधिक व्यक्त हुआ। यहाँ आश्रुत्य पदका प्रयोग है, अतः आ ईषत् श्रुत्वा यह अर्थ हुआ। अर्थात् वेणुवादन दूर वृन्दावनमें हुआ और गोपांगनाएँ व्रजमें थीं। अतः उन्होंने दूर होनेके कारण स्पष्ट नहीं सुना, अपितु ईषत्—थोड़ा सुना। सुनते ही मूर्च्छित हो गयीं, कुछ देरके बाद उनकी मूर्च्छा भंग हुई। श्रीव्रजसीमन्तिनियोंने वेणुगीत सुना और दूसरोंने वेणुकूजन सुना। कूजनमें अर्थविहीन केवल ध्वनि होती है, परंतु गीत सार्थक—अर्थयुक्त होता है। इसीलिये जिन व्रजदेवियोंने गीत सुना, उनके अन्तःकरणमें गीतके अर्थ श्रीमद्व्रजेन्द्रकिशोर मनमोहन श्यामसुन्दरका सुन्दर स्वरूप अभिव्यक्त हुआ, किंतु अन्योंने कूजन सुना, अतः उनके मनमें उस मधुरमूर्तिका उदय नहीं हुआ। ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र आदिने भी वेणुकूजन सुना, सभी एक भावविशेषमें मुग्ध तो हुए। किसीकी समाधि भी भंग हुई, परंतु किसीको उसका तत्त्वरहस्य निश्चितरूपेण ज्ञात न हो सका— ‘शक्रशर्वपरमेष्ठिपुरोगाः।’ .... ‘कश्मलं ययुर- निश्चिततत्त्वाः॥’ (श्रीमद्भा० १०।३५।१५) चतुर्दश भुवनोंमें वंशीका रव हुआ। सभी मुग्ध हुए, जिनपर विशेष प्रभाव पड़ा, वे भावावेशमें प्रेमोन्मादमें मूर्च्छित हो गये। आज भी श्रीकृष्णकी नित्य लीलाएँ चल रही हैं, आज भी वंशीवादन हो रहा है। भगवान् जैसे श्रीव्रजांगनाओंको चाहते हैं, वैसे प्रत्येक प्राणीको चाहते हैं। प्रत्येकके लिये उनका वेणुगीत सदा गाया जा रहा है। उस गीतकी मनोहरता भी सर्वजनोंके लिये है—‘सर्वभूतमनोहरम्।’ (श्रीमद्भा० १०।२१। ६)। परंतु महामोहावृतमनस्क होनेके कारण लोगोंकी प्रवृत्ति उधर नहीं होती। ‘काश्चित् परोक्षं कृष्णस्य स्वस- खीभ्योऽन्ववर्णयन्॥’ (श्रीमद्भा० १०।२१।३) यहाँ ‘काश्चित्’ पदसे यह भाव निकला कि कान्तभाववती व्रजांगनाओंको तो स्मरोदय हुआ, परंतु श्रीमन्नन्दगेहिनी श्रीयशोदा, श्रीरोहिणी आदि मान्याओंमें

उसी वेणुगीतके श्रवणसे वात्सल्यभावका उदय हुआ। अस्तु, कुछ व्रजांगनाएँ वेणुगीतकूजनको श्रवणकर मूर्च्छित हुईं, कुछ कालमें पुन: सावधानता आनेपर वेणुगीत सुना, उसका तत्त्व समझकर प्रेमोन्मादमें पुन: मूर्च्छित हो गयीं। भगवान्‌के अनुग्रहविशेषसे पुन: सावधान होकर अपनी सखियोंसे उस तत्त्वका वर्णन करनेमें प्रवृत्त हुईं। तद् व्रजस्त्रिय आश्रुत्य वेणुगीतं स्मरोदयम्। काश्चित् परोक्षं कृष्णस्य स्वसखीभ्योऽन्ववर्णयन्॥ तद् वर्णयितुमारेभाः स्मरन्त्यः कृष्णचेष्टितम्। नाशकन् स्मरवेगेन विक्षिप्तमनसो नृप॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।३-४) जब भगवान् श्रीकृष्णने वेणुकूजन किया—वंशी बजायी—तब सभी श्रवणकर्ता उससे प्रभावित हुए। क्योंकि कूजन या ध्वनिका यह स्वभाव है कि श्रोतापर कुछ-न-कुछ प्रभाव अवश्य करती है। विशेषतः इस वेणुकूजनके श्रवणसे सबमें भगवदीयताका भाव आविर्भूत हुआ। कूजन, नादकी यह महिमा है कि जिससे यह सम्बन्धित हो, उसे भगवान्‌का बना दे। यहाँ कूजन, रव और गति भिन्न-भिन्न हैं; क्योंकि यह भगवदधर-सुधासे संवलित हैं। भगवान्‌की अधरसुधाके सभी समान अधिकारी नहीं हैं, अतः स्वस्वाधिकारानुसार उसमें अधरसुधा-वितरणके लिये वेणुवादनमें भी कूजनादि भेद हैं। अधरसुधाके तीन भेद हैं—१. देवभोग्या, २. भगवद्भोग्या, ३. सर्वभोग्या। ये तीनों सुधाएँ श्रीकृष्णके एक ही अधरमें रहती हैं। परंतु इनका दान उन योग्य अधिकारियोंको ही होता है, सबको नहीं। यहाँ भावुकोंका भाव यह है— 'अधर एव लोभः' इस उक्तिके अनुसार भगवान्‌का अधर ही साक्षात् मूर्तिमान् लोभ है। जैसे भगवान्‌का मन चन्द्रमा, सूर्य नेत्र आदि हैं, वैसे ही मूर्तिमान् लोभ अधर है। भाव यह है कि भगवान्‌ने अपने अधरसुधारूप कोषका अध्यक्ष लोभको बनाया। अध्यक्ष-भण्डारी कृपण होना चाहिये। वह जिसे जिस वस्तुका और जितनेका अधिकारी समझे, उसे उस वस्तुको उतना ही प्रदान करे। इसीलिये भगवान्‌ने स्वाधरसुधाका अध्यक्ष लोभको बनाया, जिससे वह एक ही अधरमें रहनेवाली तीन तरहकी सुधाको अधिकारानुसार प्रदान करे। अतः यहाँ यद्यपि वेणुकूजनको व्रजस्थ सभी प्राणियोंने सुना, परंतु उसके द्वारा वितरित होनेवाली अधरसुधाकी प्राप्ति श्रीवृषभानुनन्दिनी, ललिता, विशाखा आदि अधिकारिणी अन्तरंगभूता व्रजांगनाओंको ही हुई। पहले कहा जा चुका है कि वेणुछिद्रद्वारा निर्गत भगवान् श्रीकृष्णकी अधरसुधाके सम्बन्धसे सब रसात्मक हो गये। यों देखें तो निखिल विश्व आनन्दरूप ही है; क्योंकि यह समस्त चराचर जगत् एक अखण्ड, अनन्त, निर्विकार आनन्दसे उत्पन्न हुआ, उसीमें स्थित है और उसीमें लीन होता है, अतः आनन्दस्वरूप ही है। जैसे घट, शराव, उदंचनादि पदार्थ मृत्तिकासे उत्पन्न होते हैं, उसीमें स्थित होते हैं और अन्तमें उसीमें लीन होते हैं, अतः मृत्तिकास्वरूप ही हैं। तो भी विश्वकी आनन्दरूपता मायासे आवृत होने 'आनन्दाद्धयेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। आनन्देन जातानि जीवन्ति। आनन्दं प्रयन्त्यभि- संविशन्ति।' (तैत्तिरीय० ३।६) के कारण अभिव्यक्त नहीं है—'नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः।' (गीता ७।२५) जैसे काष्ठोंमें अग्नि व्यापक होते हुए भी अव्यक्त है, दाहकत्व-प्रकाशकत्व रूपमें व्यक्त नहीं है, परंतु दाहकत्व-प्रकाशकत्वविशिष्ट साक्षात् व्यक्त अग्निसे उन काष्ठादिका सम्बन्ध होते ही उनमें भी अग्नि व्यक्त हो जाता है, वैसे ही समस्त विश्व आनन्दरूप-रसात्मक होते हुए भी उसकी रसात्मकता अभिव्यक्त नहीं है। जब शुकादि ऐसे महापुरुषोंका, जिनकी साक्षाद्भगवत्सम्बन्धसे रसात्मकता व्यक्त हो गयी है, अनुग्रह प्राप्त होता है, तब उसकी स्वाभाविकी रसात्मकता अभिव्यक्त हो जाती है। 'देवो भूत्वा देवं यजेत्।' अर्थात् भक्त स्वयं भगवद्रूप होकर भगवान्‌का यजन करे, इस सिद्धान्तके अनुसार अचिन्त्य, अनन्त, परमानन्दमय निखिल रसामृतमूर्ति भगवान् श्रीकृष्णका अन्तरंग रमण उन्हींके साथ हो

सकता है, जिनकी भगवदीयता, रसात्मकता अभिव्यक्त हो चुकी हो। इसीलिये जिनकी भगवदीयता, रसरूपता पहले व्यक्त नहीं थी, उनकी वह रसस्वरूपता इस वेणुकूजनसे व्यक्त हुई। जहाँ वह पहलेसे ही व्यक्त थी, वहाँ स्मरका—स्मरणका उदय हुआ। नादसे उद्दीपन-विधया भी स्मृति हो सकती है। नादके श्रवणसे उसके उद्गमस्थलकी स्मृति होनी स्वाभाविक है। संसारके समस्त प्रवाहोंका स्वभाव है कि वह अपनेमें निपतित वस्तुको अपने गन्तव्य स्थानमें ले जाता है। जैसे गंगाके प्रवाहमें पड़ा हुआ पुष्प गंगाके गन्तव्य स्थानकी ओर बह जाता है, परंतु वेणुनादप्रवाहका इससे विपरीत स्वभाव है। वह अपनेमें निपतित वस्तुको गन्तव्य स्थलकी ओर न ले जाकर अपने उद्गमस्थानकी ओर ले जाता है। अतः भगवान् श्रीकृष्णके मुखचन्द्रनिर्गत वेणुगीतके अखण्ड प्रवाहमें निपतित श्रीव्रजांगनाओंका मन उस प्रवाहके उद्गमस्थान श्यामसुन्दर व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णकी ओर बह चला और मनके पीछे उनका शरीर भी बह चला। इस वेणुकूजनके प्रभावसे कुछ गोपांगनाओंको सचमुच ही स्मरका—कामका उदय हुआ; क्योंकि यह कूजननाद कामका मुख्य दूत है—'मन्मथस्याग्रदूतः।' यह नाद मोहनमन्त्र है, अतः इसे श्रवणकर श्रीव्रजगोपिकाएँ मूर्च्छित हुईं। यह मूर्च्छा संचारी भाव है। यहाँ तो मूर्च्छा क्या, अपस्मारतक रस है। संसारके रागमें तो सभी मूर्च्छित हैं, परंतु श्यामसुन्दर मनमोहन श्रीव्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णके लोकोत्तर सुमधुर अद्भुत सौरस्य, सौगन्ध्य, सौन्दर्यसम्पन्न माधुर्यपर मोहित होकर मूर्च्छित होनेका विलक्षण सौभाग्य तो माधुर्याधिष्ठात्री परमान्तरंगा श्रीवृषभानुनन्दिनी आदि कतिपय व्रजसीमन्तिनियोंका ही है। अस्तु, उस परम मनोहर मोहनमन्त्र वेणुकूजनके श्रवणसे मूर्च्छित होनेपर श्रीकृष्णके अनुग्रहविशेषसे कुछको सावधानता प्राप्त हुई। तब सावधान होकर उन्होंने उस कूजनकी ओर अपने नेत्र और मनको लगाया। पहले वेणुकूजनका प्रयोजन उन्हें सावधानकर संकेत करना था। जब वे सावधान हो गयीं, तब श्रीकृष्णने वेणुद्वारा गीत गाया, जो स्पष्टार्थक था। यह गीत भगवदीय रसका निरूपक है अर्थात् भगवान्के लीलाविशिष्ट तात्कालिक स्वरूपका स्पष्ट निर्देश इस वेणुगीतसे हुआ। जिन गोपिकाओंने उसे सुना, उनके अन्तःकरणमें भगवत्स्वरूप व्यक्त हुआ। उनके विविध हाव-भाव आदि व्यक्त हुए। इन सबसे वे फिर मूर्च्छित हुईं; क्योंकि इस समय गीतार्थद्वारा श्रीकृष्णके रसात्मक साक्षात् स्वरूपका उन्हें स्मरण हुआ। बारम्बार स्मरणके बाहुल्यसे कुछ गोपांगनाओंको तो अन्तःकरणमें प्रियतम प्राणधन श्रीकृष्णका आलिंगन प्राप्त हुआ। फिर उनमेंसे ही किन्हींने अपनी सखियोंसे उसका वर्णन करना आरम्भ किया— तद्वर्णयितुमारेभाः स्मरन्त्यः कृष्णचेष्टितम्। नाशकन् स्मरवेगेन विक्षिप्तमनसो नृप॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।४) उस वेणुगीतसे श्यामसुन्दर मनमोहन श्रीकृष्णका स्मरण हुआ, परंतु उसका वर्णन करनेमें स्मरवेगवश वे समर्थ न हो सकीं। मनसे एक बार एक ही कार्य हो सकता है, या तो वे अनुभव करें या स्मरण करें, परंतु अनुभव या स्मरणके साथ-साथ वर्णन नहीं हो सकता। शिव, काकभुशुण्डि, सनक, शुकदेव आदि सबकी यही स्थिति है। वे लोग या तो भगवान्के परम मंगलमय दिव्य सौन्दर्य-माधुर्यादिका अनुभव स्मरण करते हैं या वर्णन किया करते हैं। यह वर्णन भी बुद्धिपूर्वक नहीं, अपितु उद्गार है। भावना करते- करते रस जब अन्तःकरण, प्राण, इन्द्रिय, रोम-रोममें भर जाता है, तब वह मुखमें आकर उच्छालित हो उठता है, वही उनका उद्गार है। वर्णनकालमें श्रीकृष्णचेष्टितका स्मरण हो जानेसे वर्णन ही नहीं हो सकता, किंतु भगवान् श्रीकृष्णको तो गोपिकाओंद्वारा वर्णन कराना अभीष्ट है; क्योंकि तभी वह सुधा भगवद्भोग्या बन सकेगी। भगवान्के अधरमें रहनेवाली सुधा भगवद्भोग्या कैसे हो? भगवान् स्वयं अपने- आप ही स्वाधरोष्ठस्थित सुधाका पान करें, यह तो विपरीत है। तब यह हो कैसे? हाँ, इसका एक ही

प्रकार है। जब भगवान्‌के अधरपल्लवोंसे सम्बन्धित वेणुमें भरपूर होकर उसके छिद्रोंसे निकलकर वह सुधा व्रजसीमन्तिनियोंके निरावरण कर्णकुहरोंद्वारा उनके अन्तःकरणमें निविष्ट होकर, वहाँसे उनके अन्तःकरण, प्राण, अन्तरात्मा, इन्द्रिय, रोम-रोममें भरपूर होकर मुखमें आकर उनके अधरपल्लवोंद्वारा वर्णित हो, तभी वह सुधा भगवद्भोग्या हो। यहाँ कुछ लोग सन्देह करते हैं कि यह असंगत है; क्योंकि पहले श्लोकमें 'चुक्कूज वेणुम्' से वेणुका कूजन कहा गया और दूसरे ही श्लोकमें 'आश्रुत्य वेणुगीतम्' से वेणुगीत कहा गया, यह कैसे? कूजन तो अर्थसम्बन्धविहीन ध्वनिमात्र है, किंतु गीतका तो कुछ अर्थ होता है। ऐसी स्थितिमें पहले श्लोकमें जिसे कूजन कहा गया, दूसरे ही श्लोकमें उसकी ही गीतोक्ति असंगत है। एवं च जब स्मरवेगसे विक्षिप्त-मनस्क होनेके कारण वर्णन न कर सकी—'तद् वर्णयितुमारब्धाः। नाशक्नुन् स्मरवेगेन।' तब बीचमें 'बर्हापीडं नटवरवपुः।' (श्रीमद्भा० १०।२१।५) इत्यादि वर्णन और 'इति वेणुरवं श्रुत्वा' यह सब कैसे ? इसका समाधान यह है कि यहाँ पहले श्लोकमें श्रीकृष्णका श्रीवृन्दावन- प्रवेश वर्णित है, दूसरेमें उनके द्वारा वेणुकूजन। इस कूजनद्वारा अन्तःकरणमें श्रीकृष्णस्वरूपका अनुभव करके ज्यों ही कोई व्रजांगना अपनी सखियोंसे अपने अनुभवका वर्णन करने लगीं, त्यों ही भावनाजन्य स्मरवेगसे मूर्च्छित हो गयीं। फिर सावधान होनेपर वर्णनका प्रयत्न करनेपर पुनः श्रीकृष्णका स्मरण हुआ, क्योंकि वर्णन करनेके लिये उस वर्णनीय तत्त्वका पहले स्मरण होना स्वाभाविक था, किंतु उसका स्मरण होनेसे पुनः मूर्च्छित हो गयीं। इस तरह जब-जब वर्णन करनेका प्रयत्न करती हैं, तब-तब स्मरवेगके कारण मूर्च्छा आ जानेसे वर्णन करनेमें असमर्थ हैं, परंतु भगवान् श्रीकृष्णको तो उनसे वर्णन कराना इष्ट है; क्योंकि जब व्रजांगनाओंके द्वारा उसका वर्णन हो, तभी वह भगवान्‌की अधरसुधा भगवद्भोग्यारूपमें अभिव्यक्त हो। अतः भगवान्‌ने कृपाकर अपने उद्बुद्ध संप्रयोगात्मक-विप्रयोगात्मक उभयविध शृंगाररसात्मकस्वरूपको अधरसुधारूपसे स्वाधरपल्लवपर विराजमान वेणुमें भरकर उस वेणुके छिद्रोंद्वारा निर्गत गीतपीयूषरूपसे श्रीव्रजसीमन्तिनियोंके निरावरण कर्णकुहरद्वारा उनके निर्मल स्वच्छ अन्तःकरण-पंकजमें प्रविष्ट होकर उनकी अन्तरात्मा, अन्तःकरण, प्राण, इन्द्रिय, रोम-रोममें भरपूर होते हुए उनके अधरपल्लवतक परिपूर्ण हो गये, अब वह परिपूर्ण अधरसुधा उन श्रीव्रजांगनाओंके प्रयत्न निरपेक्ष ही अपने-आप उनके अधरपल्लवोंसे 'बर्हापीडं नटवरवपुः' इस गीतरूपमें उच्छलित होकर अभिव्यक्त हो उठी। इसीलिये यह उस अनुभूत तत्त्वका उद्गार है, वर्णन नहीं। किसी अतिदिव्यपात्रमें कोई सुमधुर रस भरा हुआ हो और भरपूर होनेसे वायुके आघातसे वह रस उच्छलित होकर पात्रमेंसे निकल पड़ता है या स्वयं ही उस रसमें कोई अलौकिक उफान आनेसे वह रस स्वयं उद्वेलित होकर छलक पड़ता है। ऐसी ही अवस्था भावुकोंकी होती है। वे लोग किसी उद्दीपनादि सामग्रीको देखते ही अपने प्रियतमके स्मरणसे विह्वल होकर पुलकित हो उठते हैं, देहभान भूल जाते हैं, पुनः-पुनः स्मरणजन्य भावनाविशेषसे उनके मानस- पंकजमें विराजमान मूर्तिमान् वह दिव्यरस उनके रोम- रोममें भरपूर होकर स्वयं उनके मुखसे शब्द-ब्रह्मरूप कथासुधाद्वारा बरबस अभिव्यक्त हो उठता है। श्रीहनुमान्‌जीको भी भीमके दर्शनद्वारा जैसे अपने ध्येय, ज्ञेय, परमाराध्य, श्रीमद्राघवेन्द्र रामचन्द्रकी स्मृति हुई, वैसे ही भावुकोंको किसी उद्दीपन- सामग्रीके दर्शनसे अपने प्रियतम प्राणधनका स्मरण होता है। जैसे चन्द्रदर्शनसे समुद्र उद्वेलित होता है, वैसे ही उत्ताल तरंगोंसे परम सुन्दर श्रीमुखचन्द्रको देखकर श्रीवृषभानुनन्दिनी श्रीराधिकाके अन्तःकरणमें विराजमान अनुरागससारसागर उद्वेलित होकर कथारूपमें व्यक्त हो उठता है। यही अवस्था श्रीकृष्णकी भी है—वृषभानुनन्दिनीके दिव्य सौन्दर्यमय श्रीमुखचन्द्रकी

वेणुगीत ७७ मनोहर शोभाका अवलोकनकर उनके मानसपंकजमें विराजमान अनुरागरसामृतसिन्धु उद्वेलित-विक्षुब्ध हो उठता है। जैसे पूर्णिमा आदि अवसरोंपर ही सागरकी वैसी स्थिति होती है, वैसे ही प्रसंगविशेषोंपर ही यह बात होती है। भक्तिका स्वरूप भगवान्‌का सगुण, निर्गुण दोनों रूपोंका कर्णरन्ध्रसे ही हृदयमें प्रवेश होता है। भगवान्‌के मधुर मनोहर सौन्दर्यादि गुणगणोंके श्रवणसे निर्मल, विशुद्ध, गंगाजलके अखण्ड प्रवाहकी तरह द्रुत मानसवृत्तिप्रवाहका श्रीभगवान्‌की ओर चल पड़ना ही भक्ति है अथवा भगवान्‌के दिव्य गुणगणोंके श्रवणमात्रसे लाक्षाकी तरह अत्यन्त द्रुत स्वच्छ अन्तःकरणमें भगवान्‌की परम मनोहर मंगलमयी मूर्तिका दृढ़ अंकित होना ही भक्ति है— मद्गुणश्रुतिमात्रेण मयि सर्वगुहाशये। मनोगतिरविच्छिन्ना यथा गङ्गाम्भसोऽम्बुधौ॥ (श्रीमद्भा० ३।२९।११) द्रुतस्य भगवद्धर्माद्धारावाहिकतां गता। सर्वेशे मनसोवृत्तिर्भक्तिरित्यभिधीयते॥ इसका मूल कथा-श्रवण है। उधर (निर्गुणोपासनामें) शब्दब्रह्म (महावाक्यरूप) है। परमानन्दरसामृतमूर्ति भगवान् ही कथासुधारूपमें भावुकोंके निरावरण कर्णकुहरद्वारा निर्मल हृदय-पंकजमें प्रविष्ट होते हैं और भावनासे वृद्धिंगत होकर भक्तके मन, इन्द्रिय, प्राण, रोम-रोममें भरपूर होकर कथासुधारूपमें परिणत होते हैं। इसपर यदि कोई तर्क करे कि भावुकके हृदयमें व्यक्त भगवान्‌की मूर्ति भावनामयी कही जा सकती है, यह कैसे कहा जा सकता है कि भगवान् ही स्वयं भक्तहृदयमें अभिव्यक्त होते हैं? परंतु यह ठीक नहीं है। क्योंकि— ब्यापक ब्रह्म निरंजन निर्गुन बिगत बिनोद। सो अज प्रेम भगति बस कौसल्या कें गोद॥ (रा०च०मा० १।१९८) -के अनुसार भगवान्‌को आना-जाना कहाँ है, वे तो सर्वव्यापक हैं, सर्वत्र हैं, केवल माया- जवनिकासे आवृत हैं, बस; उस माया-जवनिकाके अपसारणका ही विलम्ब है, वे अपनी दिव्य महिमासे जहाँ उसका अपसारण करते हैं, वहीं उनका प्राकट्य हो जाता है। उत्तराके गर्भमें परीक्षित्‌को जो भगवद्दर्शन हुआ, वहाँ भगवान्‌ने उत्तराके गर्भमें क्या कहीं बाहरसे प्रवेश किया था? वे तो सर्वप्रकाशक, सर्वव्यापक होनेसे वहाँ भी थे ही, केवल अपने परम मंगलमय दिव्य अनुग्रहसे माया-जवनिकाका अपसारण करके प्रकट हो गये। इन सब विवेचनोंसे स्पष्ट हो गया कि निःसन्देहरूपसे परमार्थ तत्त्व ही शब्दब्रह्मके रूपमें भावुकोंके मुखद्वारा निकलता है और वही भावुकोंके कर्णरन्ध्रद्वारा हृदयमें आविर्भूत होता है। यह असाधारण कथासुधाकी चर्चा है। इधर भगवान्‌ने सोचा कि स्मरवेगसे विक्षिप्त- मनस्क इन व्रजांगनाओंसे गीतार्थका वर्णन न बन सकेगा, अतः निखिलरसात्मक निज मूर्तिको निरावरण बनाकर वेणुगीतपीयूषरूपमें कर्णकुहरद्वारा गोपिकाओंके हृदय-पंकजमें पहुँचाएँ। यह गीत पूर्व कूजनादिकी अपेक्षासे अद्भुत है। भावुकोंने श्रीकृष्णको फलात्मक माना है, साधन नहीं। सुख फलात्मक होता है, अतः उसके ही स्त्री-पुत्रादि साधन हैं। जिसके लिये सब कुछ हो और जो स्वयं अन्य किसीके लिये न हो, वही फल होता है। स्त्री, पुत्र, धन-धान्यादि सब पदार्थोंकी अपेक्षा सुखके लिये है। यदि कहा जाय कि सुख किसलिये? तो कहना पड़ेगा कि सुख और किसीके लिये नहीं, सुख-सुखहीके लिये चाहिये। अतः स्त्री-पुत्रादि सब सुखके साधन हैं और सुख फलात्मक है। ऐसे ही भगवान् तो सुखके भी सुख होनेसे परम फलस्वरूप हैं; क्योंकि परम आनन्द- रसमूर्ति हैं। जैसे खाँडके खिलौनेके समस्त अवयव खाँडके ही होते हैं, वैसे ही निखिल रसामृतमूर्ति भगवान् श्रीकृष्णके हस्तारविन्द, पादारविन्द, मुखारविन्द सभी श्रीअंग परमानन्दमय ही हैं— 'आनन्दमात्रं

७८ भक्तिसुधा करपादमुखोदरादिः ।' भगवान्‌का श्रीमुखचन्द्र पूर्णानुराग रससार-सागर- समुद्भूत है। कमल जैसे प्राकृत सरोवरसे उत्पन्न होता है, वैसे भगवान्‌का मंगलमय मनोहर श्रीवदनारविन्द पूर्णानुरागरससार-समुद्भूत है। प्राकृत जलके सरोवरमें पंक-मृण्मय होता है, उस पंकसे उत्पन्न होनेवाला पंकज कितना सौरस्य, सौगन्ध्य, सौन्दर्य, सुस्पर्श- सम्पन्न होता है ? अब यदि क्षीरमय सरोवर हो तो उसमें पंक भी क्षीरसार नवनीतमय ही होगा और उससे समुत्पन्न पंकजका सौन्दर्य, सौगन्ध्य, सौरस्यादि भी अलौकिक ही होगा। यहाँ तो श्रीश्रीकृष्णमुख- पंकज पूर्णानुरागरससारसरोवर-समुद्भूत है। अतः उस सरोवरका पंक भी पूर्णानुरागरससारसर्वस्व ही होगा। उससे प्रादुर्भूत श्रीकृष्णमुखेन्दीवरकी शोभा, सौन्दर्य, माधुर्य, सौगन्ध्य, सौरस्य आदिका तो कहना ही क्या ? भगवान्‌का विग्रह फलात्मक है, साधन नहीं अतः श्रीकृष्णका समस्त विग्रह फलात्मक है, साधन नहीं। विधिनिषेध साधनमें ही हुआ करते हैं, फलमें नहीं। अघासुरहनन आदिकी कहीं-कहीं श्रीकृष्णमें साधनता भी थी, परंतु ध्यानकालमें तो वे सुखमात्र स्वरूप होनेसे शुद्ध फलात्मा ही हैं। यदात्मक श्रीकृष्ण होंगे, तदात्मक ही उद्बुद्ध सम्प्रयोगात्मक-विप्रयोगात्मक उभयविध शृंगाररसस्वरूप भगवद्भोग्या अधरसुधा भी होनी चाहिये। अन्यान्य अंगोंमें साधनत्वका निवेश होनेपर भी अधरसुधामें तो केवल फलात्मकता ही है। लौकिक रस तो अनुभव करते-करते कुछ कालमें विरस हो जाते हैं, परंतु इस रसकी यह विशेषता है कि यह कभी विरस नहीं होता, अपितु जैसे-जैसे अधिकाधिक अनुभूत होता है, वैसे-वैसे वृद्धिंगत होता है। कामिनी सम्प्रयोगादिमें यह बात नहीं है, वहाँ तो कामिनी आदिमें विरसता आ जाती है, पर यहाँका रस तो कभी विरस होता ही नहीं-'यह रस विरस होत नहिं कबहूँ।' हाँ तो यह रस गोपिकाओंकी अन्तरात्मा, अन्तःकरण, प्राण, इन्द्रिय, रोम-रोममें भरपूर होकर श्रीव्रजांगनाके अधरपल्लवद्वारा- बर्हापीडं नटवरवपुः कर्णयोः कर्णिकारं बिभ्रद् वासः कनककपिशं वैजयन्तीं च मालाम्। रन्ध्रान् वेणोरधरसुधया पूरयन् गोपवृन्दै- र्वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद् गीतकीर्तिः ॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।५) -इत्यादि वेणुगीतपीयूषरूपमें उद्वेलित होकर अभिव्यक्त हो गया। 'बर्हापीडं' यह साधारण श्लोक नहीं है, अपितु साक्षात् भगवद्भोग्या अधरसुधा ही है। पीछे कहा जा चुका है कि श्रीकृष्णके अधरमें रहनेवाली सुधा उन्हींके लिये सम्भोग्य कैसे हो सकती है ? यह रसशास्त्रके विरुद्ध है। परंतु भगवान्‌को उस सुधाका सम्भोग इष्ट है, पर यह तभी हो सकता है कि जब यह भगवद्भोग्या अधरसुधा श्रीव्रजांगनाओंके अधरपल्लवोंमें अभिव्यक्त हो। तब ही संप्रयोगात्मक शृंगारमें भगवद्भोग्या अधरसुधा भगवान्‌को प्राप्त हो सकेगी। इसीलिये भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दने उस सुधाको वेणुमें पूरितकर उसके छिद्रोंसे श्रीव्रजांगनाओंके कर्णकुहरद्वारा उनके हृदयमें प्रविष्ट किया। किंतु जब वह व्रजांगनाओंके द्वारा वर्णित होकर उनके अधरपल्लवपर विराजमान हो, तब उसमें भगवद्योग्यता आये। गोपिकाएँ तो विह्वल होकर उसका वर्णन करनेमें असमर्थ हो रही थीं, किंतु श्रीकृष्णको तो वर्णन कराना अभीष्ट था। अतः उन्होंने अपनी कृपाविशेषसे श्रीव्रजांगना-हृदयस्थ उस सुधाको भावनाद्वारा अभिवृद्धकर उनके मुखद्वारा वर्णन-व्याजसे अभिव्यक्त किया अर्थात् वह भगवद्भोग्या अधरसुधा वेणुगीतरूपमें श्रीव्रजांगनाओंके मुखपंकजमें आयी। वह वर्णन उद्गार होनेसे प्रयत्ननिरपेक्ष एवं बुद्धिनिरपेक्ष है, अतः स्वाभाविक है। वही 'बर्हापीडं नटवरवपुः' है, यही वेणुरव है-'इति वेणुरवं राजन्' (श्रीमद्भा० १०।२१।६) अर्थात् जो भगवद्भोग्या अधर-सुधा व्यक्त हुई, वह एतत् श्लोकात्मक है।

बाह्य रमण और आन्तर रमण यहाँ यह ध्यान रखना चाहिये कि इस श्लोक और अर्थ दोनोंमें अभेद है। नाम-नामी, शब्द-अर्थमें अभेद होता है। प्रियतम प्राणधन निरतिशय निरुपाधिक परप्रेमास्पद भगवान् श्रीकृष्णका श्रीव्रजांगनाओंके साथ बाह्य और अन्तर दोनों रमण विवक्षित है। बाह्यरमण प्रिया-प्रियतमके बाह्य देहके संसर्गसे होता है, किंतु अन्तररमण तो बाह्य देहसंसर्गनिरपेक्ष प्राणोंका, मनका, अन्तरात्माका सर्वांगीण तादात्म्यसे ही बन सकता है, पर श्रीगोपिकाओंसे श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दका आन्तररमण तो तब हो, जब सचमुच ही श्रीकृष्ण उन गोपिकाओंके अन्तरमें विराजमान हों। भावनाओंके प्राखर्यसे भी भावितका साक्षात्कार होता है, पर है वहाँ भावनामय मूर्ति ही। उसके साथ होनेवाले सम्प्रयोगको तात्त्विक नहीं कहा जा सकता, अपितु वह भ्रमात्मक है; क्योंकि वहाँ अनुभव संवाद नहीं है। स्वरूपका वर्णन होनेसे एक दिव्य तेजोमय तत्त्व अभिव्यक्त होता है, वही मनोमयी मूर्ति है। उस मूर्तिमें भी रमण होता है, परंतु वह साक्षात् भी है, ऐसा नहीं कहा जा सकता। यह भावनामूलक मनोमयी मूर्ति है। हाँ, भगवान्की मनोमयी मूर्तिकी भावना भी अनन्तमहिम है, इसमें कोई सन्देह नहीं। विधुरपरिभावितकामिनीके साक्षात्कार और भगवान्की मंगलमयी, भावनामयी, मनोमयीमूर्तिके सौन्दर्य, माधुर्य-समास्वादनमें बड़ा अन्तर है। पहला अनर्थका-पतनका मूल एवं द्वितीय परम कल्याणका मूल है। मनोमयी प्रतिमाका वैशिष्ट्य भगवान्की जैसे धातुमयी, पाषाणमयी, काष्ठमयी प्रतिमा होती है, वैसी ही मनोमयी प्रतिमा होती है। पाषाणादिमयी मूर्तिके अवलम्बसे जैसे शनैः-शनैः भगवदभिव्यक्ति होती है, वैसी ही मनोमयी मूर्तिके चिन्तनसे भगवत्साक्षात्कार होता है। विधुरपरिभावित- कामिनी-साक्षात्कार-स्थलमें कामिनी विद्यमान न होनेसे वह केवल भावना है, भ्रम है, किंतु भगवान् सर्वान्तरात्मा, सर्वव्यापक हैं, भावुकपरिभावित मनोमयी भगवन्मूर्तिकी भावनाके प्राखर्यसे होनेवाला भगवत्-साक्षात्कार तात्त्विक है; क्योंकि जहाँ भगवान्का भावनाभावित साक्षात्कार हो रहा है; वहाँ सर्वान्तरात्मा भगवान् स्वयं विराजमान हैं। इसीलिये अघासुर वध-प्रसंगमें कहा गया है कि श्रीशुकदेवजीने जब कहा कि द्विजमांसरुधिराशी महापापी अघासुरके मुखसे दिव्य ज्योति निकलकर भगवान् श्रीकृष्णके मुखमें प्रविष्ट हुई, तब यह सुनकर परीक्षित्को सन्देह हुआ कि 'यह क्या ? बड़े-बड़े योगीन्द्र-मुनीन्द्रोंको भी जो गति परम दुर्लभ है, वह उस दुष्ट दानव अघासुरको कैसे प्राप्त हुई ?' इसपर श्रीशुकदेवने कहा कि जिस अखण्ड, अनन्त, स्वप्रकाश, परमानन्दमूर्ति भगवान्के श्रीअंगकी केवल मनोमयी भावनामयी मूर्ति एक बार भावुकके स्वच्छ, समाहित अन्तःकरण पंकजपर आविर्भूत होकर भागवती गति-सायुज्य मुक्ति प्रदान करती है, वही सद्घन, चिद्घन, आनन्दघन, नित्य, स्वप्रकाश रूपसे माया एवं मायिक प्रपंचको तिरस्कृत करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं जिसके उदरमें प्रविष्ट हुए, उसकी मुक्तिमें क्या सन्देह है ? सकृद् यदङ्गप्रतिमान्तराहिता मनोमयी भागवतीं ददौ गतिम्। स एव नित्यात्मसुखानुभूत्यभि- व्युदस्तमायोऽन्तर्गतो हि किं पुनः॥ (श्रीमद्भा० १०।१२।३९) भक्तकी भावनाके अनुसार ही भगवान्का स्वरूपधारण भावुकका रसिक मन भगवान्को बनाता है, भक्त जैसी-जैसी मूर्तिकी भावना करता है, भगवान्को वैसा-ही-वैसा स्वरूप धारण करना पड़ता है— 'यद्यद्धिया त उरुगाय विभावयन्ति तत्तद्वपुः प्रणयसे सदनुग्रहाय॥' (श्रीमद्भा० ३।९।११) साधारण मनुष्योंकी कल्पना मनोराज्य है, परन्तु भावुककी कल्पना फलपर्यवसायिनी होती है। इसलिये भावनाका प्राखर्य होनेपर भक्तोपहृत वस्तु भगवान्में उपलब्ध हो सकती है। यहाँ तर्क हो सकता है कि प्रत्यक्ष,

८० भक्तिसुधा अनुमान आदि तो प्रमाण हैं, किंतु भावना प्रमाणकोटिमें परिगणित नहीं है, अतः भावनाभावित मनोमयीमूर्तिका साक्षात्कार विधुरपरिभावित कामिनी-साक्षात्कारके समान भ्रमात्मक है। किंतु ऐसा नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि पहले कह आये हैं कि विधुरपरि- भावितकामिनी-साक्षात्कारस्थलमें वहाँ कामिनीके न होनेके कारण प्रमाणान्तरके साथ विसंवाद होनेसे वह साक्षात्कार भले ही भ्रम हो, परंतु निर्गुण परब्रह्म- साक्षात्कारस्थलमें तो उपनिषदादि प्रमाणान्तर संवाद है अर्थात् शब्दप्रमाणभूत उपनिषद् ब्रह्मका जैसा स्वरूप बतलाती हैं, वैसा ही यहाँ साक्षात्कार भी हो रहा है। अतः इसको भ्रम नहीं कहा जा सकता। भगवान् सर्वव्यापक हैं, किंतु माया-जवनिकासे समावृत होनेके कारण सबको प्रकाशित नहीं होते—'नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः।' (गीता ७।२५) किंतु वही भगवान् भक्तकी भावनासे या स्वानुग्रहविशेषसे यहाँ उस माया-जवनिकाका अपसारण कर देते हैं, वहीं उनका प्राकट्य हो जाता है। अर्थात् भावनामयी मूर्ति ही प्राकृतत्वको छोड़कर अप्राकृतत्वको धारण कर लेती है। यह ध्यानकी महिमा है, ध्यानके बढ़नेसे अलौकिकत्व आता है। उत्तराके गर्भमें अश्वत्थामाके ब्रह्मास्त्रसे परीक्षित्की रक्षा करनेके लिये क्या कहीं बाहरसे आकर प्रविष्ट हुए ? प्रह्लादके रक्षार्थ खम्भेमें कहाँसे आये ? सर्वव्यापक होनेसे वे वहाँ पहलेसे थे ही, केवल अनुग्रहसे भक्त-रक्षार्थ माया-जवनिकाको दूरकर वहाँ प्रकट हो गये। ऐसे ही निर्गुणब्रह्म-साक्षात्कार-स्थलमें भी तत्त्व सर्वव्यापक होनेसे श्रवण-मननसे ही माया-जवनिकाका अपसरण हो जानेपर उसकी उपलब्धि हो जाती है; क्योंकि ज्ञान, ज्ञेय एवं ज्ञानगम्य सबके हृदयमें स्थित है— 'ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्॥' (गीता १३।१७) किंतु उस माया-जवनिकाका पुनः आवरण न हो जाय, इसलिये उस श्रुत, मत, साक्षात्कृत तत्त्वाकाराकारित विशुद्ध मानसीवृत्तिके निरन्तर आदरपूर्वक अखण्ड प्रवाहरूप निदिध्यासनकी अपेक्षा है। इस तरह निर्गुण-सगुण भगवान्‌का साक्षात्कार भ्रम नहीं, अपितु परमार्थ-भूत है। अस्तु, प्रकृतमें उद्बुद्ध सम्प्रयोगात्मक- विप्रयोगात्मक उभयविध शृंगारस्वरूप निखिल रसामृतमूर्ति श्यामसुन्दर व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण ही 'बर्हापीडं' आदि वेणुगीतरूपमें श्रीव्रजांगनाओंके मानसपंकजमें पधारे और भावनाविशेषद्वारा वृद्धिंगत होकर उन व्रजांगनाओंकी अन्तरात्मा, मन, प्राण, इन्द्रिय आदिमें भरपूर होकर उनको अप्राकृत बनाकर मधुर मनोहर मंगलमयमूर्तिमें अभिव्यक्त होकर उन्होंने श्रीव्रजांगनाओंके साथ आन्तररमण किया। यह आन्तररमण ही यथार्थ रमण है, यहाँ देहादिका व्यवधान नहीं है, बल्कि अन्तःकरणमें ही श्रीकृष्णका प्राकट्य होनेसे व्रजांगनाओंसे उनका व्यवधानरहित परम आन्तररमण सम्पन्न हुआ है। यहाँका वैलक्षण्य यह है कि एक कालमें ही सम्प्रयोग-विप्रयोग उभयात्मक शृंगाररसका अनुभव होता है और दोनों ही उद्बुद्ध-उद्वेलित हैं। इसी बातको दिखलानेके लिये 'वेणुरव' शब्दका प्रयोग हुआ है। 'र' अग्निबीज होनेसे उससे विप्रयोगात्मक उद्बुद्ध शृंगाररसका ग्रहण है और 'व' अमृतबीज होनेसे उससे सम्प्रयोगात्मक उद्बुद्ध शृंगाररस गृहीत हुआ है। अमलात्मा महायोगीन्द्र भी भगवान्‌के लोकोत्तर माधुर्यसे मुग्ध हो जाते हैं इस रसकी यही विशेषता है कि वह बड़े-बड़े निर्विकल्प समाधिसिद्ध निर्गुणब्रह्मस्वरूपनिष्ठ महायोगीन्द्र मुनीन्द्रोंको भी अपनी ओर बलात् आकर्षित कर लेता है। आत्मस्वरूपमें रमण करनेवाले, चिज्जड़ाध्यासरूप ग्रन्थिका छेदन करनेवाले शुकादि, सनकादि महामुनीन्द्रगण भी उस अखण्ड, अनन्त, असंग, कूटस्थ, स्वात्मस्वरूपमें स्थितिको छोड़कर उस अचिन्त्य, अनन्त, सुमधुर अखिलरसामृतमूर्ति श्रीकृष्णके परम मंगलमय, लोकोत्तर, अद्भुत, मनोहर सौन्दर्य, माधुर्यके समास्वादनमें आसक्त हो जाते हैं—

वेणुगीत ८१ आत्मारामाश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे। कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरिः॥ (श्रीमद्भा० १।७।१०) शौनकजीको इस बातपर बड़ा सन्देह हुआ कि 'उन शुकदेवजीने जो जन्मसे ही सजातीय, विजातीय, स्वगतभेदरहित, अखण्ड, अनन्त, स्वप्रकाश, निर्गुण परब्रह्ममें परिनिष्ठित थे, जिनकी अखण्ड स्थिति चाहे आकाश टूट पड़े, मेरु विशीर्ण हो जाय या समुद्र सूख जाय तो भी टस-से-मस नहीं होती थी, सांसारिक मायामोहके जालमें बँध जानेके भयसे जो द्वादश वर्षपर्यन्त माताके उदरसे बहिर्भूत न होकर वहीं निर्गुण, निराकार तत्त्वमें सर्वात्मना परिनिष्ठित रहे, जैसे-तैसे गर्भसे निकलते ही अरण्यकी ओर चल पड़े, तत्त्ववित् होनेके कारण स्त्री-पुरुष आदि भेद जिनकी दृष्टिमें आता ही न था, उन महायोगी श्रीशुकदेवने अष्टादशसहस्र श्लोकवाली भागवत महासंहिताको अपने पिता श्रीव्याससे कैसे अध्ययन किया?' इसपर सूतजीने कहा- बर्हापीडं नटवरवपुः कर्णयोः कर्णिकारं बिभ्रद् वासः कनककपिशं वैजयन्तीं च मालाम्। रन्ध्रान् वेणोरधरसुधया पूरयन् गोपवृन्दै- र्वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद् गीतकीर्तिः॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।५) श्रीव्यासजीने यह श्लोक अपने कतिपय शिष्योंको पढ़ाकर उन्हें श्रीशुकदेवके पास अरण्यमें भेजा। शिष्योंने अरण्यमें शुकदेवजीके पास जाकर बड़े मधुर स्वरमें उक्त श्लोकको पुनः-पुनः पढ़ा। उसे श्रवणकर और तद्वर्णित श्यामसुन्दर मदनमोहन भगवान् श्रीकृष्णकी मधुर मनोहर मूर्तिका चिन्तनकर उनकी समाधि भग्न हो गयी। प्रेममें विभोर होकर नाचने लगे। शिष्योंने जाकर व्यासजीसे सब हाल सुनाया। व्यासजीने सोचा कि उस श्लोकका प्रभाव तो पुत्रपर हुआ, पर वह अबतक आया क्यों नहीं? दिव्य दृष्टिसे देखनेपर उन्होंने निश्चित किया कि उसे यह सन्देह हो गया कि 'ऐसे लोकोत्तर सौन्दर्य लावण्यसम्पन्न भगवान् मुझ-जैसे दीनपर कृपा कैसे करेंगे?' बस, व्यासजीने एक दूसरा श्लोक पढ़ाकर शिष्योंको पुनः शुकदेवजीके पास भेजा। शिष्योंने उस श्लोकको मधुर स्वरसे गाकर शुकदेवजीको सुनाया- अहो बकी यं स्तनकालकूटं जिघांसयापाययदप्यसाध्वी । लेभे गतिं धात्र्युचितां ततोऽन्यं कं वा दयालुं शरणं व्रजेम॥ (श्रीमद्भा० ३।२।२३) अर्थात् 'आश्चर्य है कि जिस लोकबालघ्नी दुष्ट राक्षसी पूतनाने प्रभुको मार डालनेकी इच्छासे कालकूट हलाहल विषसंपृक्त स्तन्यपान कराया, पर उसको भी जिसने माताको प्राप्त होनेयोग्य सद्गति प्रदान की, उस भगवान्‌से अधिक दयालु, कृपामय और दूसरा कौन होगा?' श्रीब्रह्माजीको भी इस बातकी बड़ी चिन्ता हुई थी कि भगवान् इन व्रजनिवासी गोपोंसे कैसे ऋणमुक्त होंगे? ब्रह्माने जब भगवान्‌से कहा कि 'हे देव! मुझे यह सोचकर बड़ा मोह हो रहा है कि आप इन ग्वालोंको क्या देकर उनके ऋणसे मुक्त होंगे? यदि कहें कि इसकी क्या चिन्ता है? उन्हें त्रैलोक्य-सुख देकर उऋण हो जाऊँगा, परंतु भगवन्! आप ही सर्वफलात्मा-अनन्त सौख्य-सिन्धु हैं। निखिल ब्रह्माण्डके समस्त प्राणी जिस आनन्दसुधा- सिन्धुके एक बिन्दुको प्राप्तकर आनन्दित हो रहे हैं- 'अस्य मात्रामुपजीवन्ति' वही अनन्त, अखण्ड, महान् आनन्दसिन्धु मूर्तिमान् जिनके आँगनमें धूलि- धूसरित होकर विहरण कर रहा है, उन्हें आनन्दबिन्दुका लोभ क्या दिखलाया जाय? इसलिये उन्हें त्रैलोक्य सुख देकर भी आप उनके ऋणसे मुक्त नहीं हो सकेंगे। यदि कहें कि केवल इन व्रजवासियोंको ही नहीं, उनके समस्त कुलको मैं अपने-आपको देकर ऋणमुक्त हो जाऊँगा तो भगवन्! क्या जो व्यवहार आपको विषमिश्रित स्तन्यपान करानेवाली पूतनाके साथ, वही इन धाम, अर्थ, सुहृत्, प्रिय देह, पुत्र, प्राण एवं अन्तरात्मा आदि सब कुछ आपके श्रीचरणोंपर