भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनहीं चाहते थे, क्योंकि मिट्टी तो आखिर खायी ही थी, तब खुल कैसे गया ? तो मातृकोपरविरश्मिद्वारा उनका मुखकमल स्वयं ही विकसित हो गया। तात्पर्य यह है कि लीलारसपोषित ऐसा झूठ दोष नहीं गिना जाता, किंतु गुण ही गिना जाता है। इसी भावकी 'भागवत' में कुन्तीकी स्तुति है— गोप्यादादे त्वयि कृतागसि दाम तावद् या ते दशाश्रुकलिलाञ्जनसम्भ्रमाक्षम्। (श्रीमद्भा० १।८।३१) हे व्रजेन्दनन्दन, श्यामसुन्दर! जब आपकी अघटितघटनापटीयसी मायासे मुग्ध हुई यशोदा रस्सी लेकर बाँधने लगी, उस समय 'वक्त्रं निनीय भयभावनया स्थितस्य' (श्रीमद्भा० १।८।३१) मुख नीचा किया, आँखें डबडबा आयीं, अंजनमिश्रित अश्रु कपोलपर लुढ़क आये, मानो नीलकमलके कोशपर ओसके कण या मुक्ताबिन्दु शोभा पा रहे हैं। 'सा मां विमोहयति भीरपि यद्बिभेति ॥' (श्रीमद्भा० १।८।३१) जिससे काल भी भयभीत होता है, उसका यशोदासे डरना मुझे मुग्ध कर रहा है। यह सब कुछ अप्राकृत तत्त्वमें प्राकृतवत् प्रतीति है, अलौकिकताका भाव है। 'नृणां निःश्रेयसार्थाय व्यक्तिर्भगवतो नृप।' (श्रीमद्भा० १०।२९।१४) उस अचिन्त्य, अनन्त्य, अग्राद्य, अलक्षण, अव्यपदेश्य तत्त्वका सगुण-साकार विग्रहरूपमें इसीलिये प्राकट्य है कि किसी भी भावसे लोगोंकी उसमें प्रीति हो और उनका कल्याण हो। सहज भाव रागानुगा प्रीति है। रागतः प्राप्तमें विधि नहीं होती, वह तो अत्यन्त अप्राप्तमें होती है। कान्ताको अपने कान्तमें स्वाभाविक राग होता है, देवतामें विधिप्राप्त राग है, सर्वेश्वर सर्वशक्तिमान् प्रभु इसी आशयसे सहज भावसे उपास्य बननेके लिये प्राकृत होते हैं। कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम। तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम॥ (रा०च०मा० ७।१३० (ख)) कामीको जो कामिनीमें राग होता है, लोभीको जो धनमें राग होता है, वही राग प्रभुके प्रति सहज होना चाहिये। माताका जो अनुराग अपने बालकके प्रति होता है, चाहे वह काला-कलूटा दिव्य-भव्य कैसा भी हो—वैसा ही सहज भाव प्रभुके प्रति होना चाहिये। श्रीव्रजेन्द्रगेहिनीका यही स्वाभाविक वात्सल्यभाव मनमोहन श्यामसुन्दरके प्रति था। तभी तो उनका मृद्भक्षण-लीलापर छड़ी लेकर मारनेका माधुर्यभाव है। इस माधुर्य-भाव-प्रसंगमें बालविहारी प्रभुके असत्य भाषणको प्रकारान्तरसे सत्य बताना, माधुर्यपोषकोंकी दृष्टिमें लीपापोती करना है। हाँ तो प्रकृतमें यह झूठ और इसी तरह चौर्य भी श्रीकृष्णके आश्रय-माहात्म्यसे माहात्म्यवान् हैं। जैसे क्षीरसमुद्र या मधुर समुद्रकी लहरीतरंग मधुर, वैसे ही आनन्दसुधासिन्धु प्रभुकी समस्त लीलाएँ मधुर हैं— 'मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥' व्रजांगनाओंका 'काम' विषयके माहात्म्यसे पवित्र है। यहाँ देखना यह है कि उनका काम किसमें था ? वह था उसी पूर्ण ब्रह्म पुरुषोत्तम श्रीश्यामसुन्दरमें। शुद्ध विवेचनसे तो 'रसो वै सः' के अनुसार वही— परब्रह्म श्रीकृष्ण ही रसस्वरूप है। उन्हींके विकृत रूप नवरस हैं। जैसे सत्ता एक ही है 'सदेव सोम्येदमग्र आसीत्' किंतु शुभ, अशुभ सब कुछ उसीका परिणाम है। वही 'सत्' पुण्यरूपसे विवर्तित होकर उपादेय और पापरूपसे विवर्त होकर अनुपादेय हो जाता है। वही सत् अशेष विशेषातीत होकर शुद्ध सत् है। 'श्रृंगार' भी उसी रसका विवर्त है। आलम्बन या आश्रयकी पवित्रता अथवा अपवित्रतासे उसमें पवित्रता या अपवित्रताका आरोप होता है, स्वतः रस निर्विशेष है। जहाँ प्राकृत कामिनी-कामुक उस रसके आश्रय होंगे, वहाँ वह दोष होगा, अतएव उनका श्रृंगार दोष वह है। सहस्त्रों दिवसके ब्रह्मविषयक मनन-चिन्तनसे भी इतनी भावना नहीं बनती, जितनी अनेक जन्मोंके मलिन संस्कारोंके कारण क्षणिक कान्तादर्शन, स्मरण, चिन्तनसे बनती है। अनेक स्थापित किये गये प्रतिकूल