भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६० भक्तिसुधा भगवत्सम्बन्धसे तृष्णा, काम आदि भी भूषण बन जाते हैं भगवत्-सम्बन्धसे तृष्णा, काम, लोभ सब भूषण हैं। भगवच्चरणसरोरुह-सम्मिलनके लिये भावुकका मनोमिलिन्द तड़फड़ाये, उसके लोकोत्तर माधुर्य परागमें लाम्पट्य दिखलाये तो यह उसका महाभूषण है। जिस वृत्तिविशेषसे कामिनी-सम्मिलनके लिये कामुक उत्कण्ठित या व्याकुल हो उठता है, वही स्मर है। ऐसे ही जिस वृत्तिविशेषसे व्रजदेवियोंको श्रीकृष्ण परमात्माके सम्मिलनके लिये उत्कट उत्कण्ठा और व्याकुलता है, वही स्मर या लोकोत्तर प्रणय है, पर बात यह है कि किसी भी वस्तुका महत्त्व उसके स्वरूप, विषय और आश्रयके महत्त्वसे होता है। श्रीकृष्णका चौर्य आश्रयसे उत्तम हो सकता है, परंतु स्वरूपसे वह निन्द्य है। आश्रयकी सरसतासे आश्रितमें सरसता, उत्तमता आ सकती है। क्षारसागरकी लहरी या तरंग क्षार होगी और क्षीरसागरकी लहरें क्षीरमयी मधुर होंगी। ऐसे ही भगवदाश्रित वस्तु तदात्मक होगी। यहाँके चौर्यका महत्त्व आश्रयकी महत्तासे है, अतएव भक्तोंके द्वारा यह खूब गाया गया। साधारण पुरुषोंका चौर्य गाया नहीं जाता, प्रत्युत किसीका चौर्य ज्ञात होनेसे उसके साथ सर्वविध सम्बन्ध त्याग हो जाता है। चोरीके साथ झूठ भी लगा था, बिना उसके चोरीका काम ही नहीं चल सकता। एक बार बालकृष्णने मिट्टी खायी। शिशु सखाओंने व्रजेन्द्रगेहिनी यशोदासे शिकायत कर दी—'मैया! आज लालाने मिट्टी खायी है।' बाललीलोत्सवमुग्ध, परम भाग्यवती यशोदाने कृत्रिम कोपसे श्रीश्यामसुन्दर नन्दनन्दनके सुकोमल छोटे-छोटे दोनों हाथोंको अपने एक हाथमें पकड़ लिया और दूसरे हाथमें छड़ी लेकर बोलीं— 'क्यों लाला, तूने आज मिट्टी खायी?' भगवान् डर गये, सोचा 'अब मार पड़ेगी, इसलिये झूठ बोल दो।' कहने लगे—'माँ! मैंने मिट्टी नहीं खायी'—'नाहं भक्षितवानम्ब'। (श्रीमद्भा० १०।८।३५) यशोदाने घुड़ककर कहा—'तुम्हारे ये सखा लोग जो कह रहे हैं?' तब तो कहने लगे—'सर्वे मिथ्याभिशंसिनः' (श्रीमद्भा० १०।८।३५) 'ये सब झूठ बोल रहे हैं।' भगवान्ने यशोदाको विश्वास दिलाने और अपनी सफाई पेश करनेके लिये कहा—'यदि तुझे विश्वास नहीं तो इन सबके सामने मेरा मुख देख ले' 'समक्षं पश्य मे मुखम्॥' (श्रीमद्भा० १०।८।३५) भगवान्ने सोचा था कि ऐसा कह देनेसे अम्बाको विश्वास हो जायगा और वह मुँह खुलवाकर न देखेगी, परंतु नन्दरानी भी पूरी थी। उसने कहा—'अगर ऐसी बात है तो मुख खोल दे'—'तर्हि व्यादेहि।' (श्रीमद्भा० १०।८।३६) अब तो भगवान् फँस गये। अगत्या व्याधसे डरे पक्षीकी तरह मुख खोल दिया— 'व्यादत्ताव्याहतैश्वर्यः।' (श्रीमद्भा० १०।८।३६) मुखके खुलते ही उसमें सागर, भूधर, वन, पर्वत दीख पड़े। यशुमति डरी, उसके हाथसे छड़ी गिर गयी, वह बेहोश हो गयी। कुछ टीकाकार भगवदुक्तियोंको सत्य ही सिद्ध करते रहनेके कारण 'नाहं भक्षितवान्' की व्याख्या करते हैं—'नाहं किञ्चिद् बाह्यं भक्षितवान् किंतु सर्वं मदन्तस्थमेव' अर्थात् मैंने कोई बाहरकी वस्तु नहीं खायी, सब मेरे उदरमें ही है, परंतु श्रीजीव गोस्वामी आदिका कहना है कि भगवान् झूठ बोले ही और बोलना ही चाहिये था। बात यह है कि भगवान्की दो प्रधान शक्तियाँ हैं—एक माधुर्याधिष्ठात्री महाशक्ति और दूसरी ऐश्वर्याधिष्ठात्री महाशक्ति। उस समय व्रजमें माधुर्याधिष्ठात्री महाशक्तिका साम्राज्य था, भगवान् श्रीमन्नन्दरानी यशोदाके उत्संगमें लालित हो रहे थे। ऐश्वर्याधिष्ठात्री महाशक्ति उस समय रुद्धप्रवेशा थी। वह प्रभुकी सेवाका अवसर ढूँढ़ रही थी। जब उसने देखा कि हाथमें छड़ी लिये यशोदा अब मेरे प्रभुको, प्राणधनको मारे बिना न रहेगी, तब अपने कौशलसे उन्हें बचानेका प्रयत्न किया, यशोदाको श्रीमुखमें अनन्त ब्रह्माण्ड दीख पड़े। भावुकोंकी तो यहाँतक भावना है कि प्रभुने यशोदासे अपने बचनेके लिये सिर्फ कहभर दिया था कि 'समक्षं पश्य मे मुखम्', वास्तवमें वे अपना मुख खोलकर दिखाना