भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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किरातिनियोंका स्मररोग ५९ हृदयकी वस्तु हैं, दोनोंमें परम अन्तरंगता है, इसीलिये कहा है कि 'उभय उभय भावात्मा' हैं। इस प्रकार वह परम तत्त्व भरपूर होकर वेणुरवद्वारा व्यक्त होता है। परमानन्द आनन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्रके अधरसे संश्लिष्ट वंशीके भी सौभाग्यको देखकर स्वयं श्रीवृषभानुनन्दिनी कहती हैं कि 'हे सखि! हम वंश- जन्मकी याचना करती हैं, कुलवधू होना नहीं चाहतीं, क्योंकि वंश-जन्ममें श्रीकृष्ण स्वयं ही आसक्तिसे सदा मिले, परंतु कुलवधू होनेमें तो उनका मिलना दुर्लभ हो जायगा'— याचेऽहं वंशदेहं न तु कुलजवधूदेहमाद्ये हि कृष्णः। तृष्णाभावेन सज्जन् बहुरुचिविहरन् दुर्लभः स्यात्परत्र॥ फिर भला ऐसी वेणुके रवको सुनकर किसका परम कल्याण न होगा? किरातिनियोंका स्मररोग पूर्णाः पुलिन्द्य उरुगायपदाब्जराग- श्रीकुङ्कुमेन दयितास्तनमण्डितेन। तद्दर्शनस्मररुजस्तृणरूषितेन लिम्पन्त्य आननकुचेषु जहुस्तदाधिम्॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।१७) 'श्रीमद्भागवत' के 'वेणुगीत' में प्रसंग आया है कि एक बार वृन्दावनधामवासिनी किरातिनियोंने वहाँके हरित घासांकुर, दूर्वा, गुल्म आदिमें संलग्न कुंकुमका दर्शन किया। वह कुंकुम श्रीभगवच्चरणाम्बुज-स्पर्शसे उनमें लगा था। उसके दर्शन, स्पर्श और सौगन्ध्यसे किरातिनियोंके मनमें स्मररूप रोगका उदय हुआ। स्मरका अर्थ काम अथवा उत्कण्ठापूर्वक स्मरण है। भावुकोंके मतानुसार बाह्य रमणमें कामकी अपेक्षा है और आन्तर रमणमें तापकी। यह दूसरी बात है कि भगवद्विषयक काम आधिदैविक दिव्य काम है। जैसे सुवर्णकी मुद्रिकामें दिव्यरत्नके संयोगके लिये लाक्षा अपेक्षित होती है, वैसे ही व्रजांगनाओंको श्रीकृष्ण-सम्बन्धार्थ काम अपेक्षित था और वह यह भूषण था, दूषण नहीं; क्योंकि अन्यत्र काम निन्द्य है, पर भगवच्चरणविषयक होनेसे वही भूषण है। वैसे किसी विरक्तके लिये जागतिक वैषयिक इच्छा या तृष्णाका होना निन्द्य है, परमार्थमें इन सबका न होना ही उत्तम माना गया है—'तृष्णाक्षयः स्वर्गपदं किमस्ति।' तृष्णाका नाश हो जाना सुखका मूल है। परंतु कहींपर यही सन्तोष दूषण भी है। किसीको भगवच्चरित्र-श्रवण, तद्दर्शन आदिमें सन्तोष हो जाय, तो क्या यह दूषण न माना जायगा? यहाँ तो जितना ही अधिक असन्तोष, लोभ, चंचलता आदि हो, उतना ही अच्छा है। किसीने कहा है— कृष्णभावरसभाविता मतिः क्रीयतां यदि कुतोऽपि लभ्यते। तत्र मूल्यमपि लौल्यमेकलं जन्मकोटिसुकृतैर्नु लभ्यते॥ कल्प-कल्पान्तरोंके, जन्म-जन्मान्तरोंके पुण्यपरि- पाकसे श्रीकृष्णविषयक अनुराग होता है। पर वह सीमित न रह जाय, तभी उसका महत्त्व या पूर्णता है। श्रीश्यामसुन्दर व्रजेन्द्रनन्दनकी कोटि-कोटि कन्दर्प- दलन-पटीयसी मनोहारिणी छवि निहारनेके लिये सब प्रपंच भूल जाय, व्याकुलता बढ़ती जाय, मन तड़फड़ाने लगे, अस्वास्थ्य हो जाय, धैर्य छूट जाय, तभी उसका महत्त्व है, तभी सफलता है। यदि कहीं यह संतोष हो कि धीरे-धीरे करते चलो, धैर्य रखो तो फिर अनुचित है। यहाँ तो जितनी अधिक व्याकुलता, व्यग्रता, बेचैनी बढ़ेगी, उतना ही अधिक अनुरागमें उत्कृष्टता आयेगी। अधिकाधिक व्याकुलता होना ही उस मतिका मूल्य है। पुत्र, धन, दारा, गेह, नेहके न मिलनेसे अधैर्य तो सभीको होता है और होना स्वाभाविक है, परंतु भगवदर्थ अधैर्य, व्याकुलता, अस्वास्थ्य होना बहुत ऊँची बात है। अतः जो लोकमें दूषण है, वही यहाँ भूषण है।