भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंध्यान करते-करते ही माया-यवनिकाके, जिससे कि भगवान् आवृत होते हैं—अपसारणसे भगवान्का दिव्य रूप प्रकट होता है, इस तरह शब्दसे ही भगवान्का प्राकट्य होता है। फिर जब भगवान्के चरित्रों और भगवन्नामोंसे भगवान्का प्राकट्य होता है, तब साक्षात् भगवान्के मुखचन्द्रसे निर्गत वेणुगीत-पीयूषके पानसे भगवान्का प्राकट्य होना स्वाभाविक ही है। शब्द प्रकाशक और अर्थ प्रकाश्य होता है। अतः शब्द ब्रह्म रूपमें व्यक्त भगवदधरसुधासे भगवान्का प्राकट्य होना स्वाभाविक है। समस्त प्रवाह अपनेसे संसृष्ट पदार्थको गन्तव्य स्थलकी ओर ले जाते हैं, परन्तु वेणुध्वनिका विलक्षण प्रवाह अपनेमें संसृष्ट तत्त्वको अपने उद्गम- स्थान श्रीकृष्णकी ओर ही ले जाता है— सर्वः प्रवाहः सर्वत्र स्वानुकूल्येन कर्षकः। वेणुध्वनिप्रवाहस्तु प्रातिकूल्येन कर्षति॥ आश्चर्यसे सबका ही उधर आकर्षण होता है,