भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीवृषभानुनन्दिनी विराजमान हैं, वहाँ श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण परमानन्दका वामांगकी ओर ही झुकाव है। इसीलिये उस परिस्थितिमें मुकुटका बायीं ओर झुकाव स्वाभाविक है। जहाँ श्रीकृष्ण और बलराम हैं, वहाँ दक्षिणमें। जहाँ नन्दबाबा दक्षिणमें और वाममें श्रीनन्दरानी, मध्यमें बलराम नन्दरायके पास, श्रीकृष्ण यशोदाके पास, उस समय मुकुटका दायें बलरामकी ओर झुकाव होता है। यही वास्तवमें रहस्य है। अस्तु, विषय यह है कि आनन्द निरतिशय, निरुपाधिक, परप्रेमास्पद है और अन्य औपाधिक एवं सातिशय। आनन्द और आत्मा एक ही वस्तु है। आनन्दसे जैसे कभी शत्रुता नहीं होती, वैसे ही आत्मासे कभी शत्रुता नहीं होती। सर्वद्रोह हो सकता है, पर आत्मद्रोह नहीं होता। श्रीकृष्ण निखिलरसामृतमूर्ति आनन्दसारसर्वस्व हैं। वे साध्य-ही-साध्य हैं, साधन नहीं, अतः परप्रेमास्पद हैं। इनमें भी कुछ भावुक तारतम्य मानते हैं, कहते हैं कि उनमें भी अमृतमय मुखचन्द्रकी सुधा केवल साध्य ही है; किसीकी साधन नहीं, पर भावुक कहते हैं कि उसमें भी देवभोग्या अधरसुधा भगवद्भोग्या अधरसुधाका साधन है और वह भी सर्वाभोग्या अधरसुधाका साधन है। परस्पर भावापत्तिपूर्वक वह सर्वाभोग्या अधरसुधा केवल साध्यमात्र है, किसीका साधन नहीं है। वह रवसे अभिव्यक्त होती है, अतः प्राधान्यतः यहाँ रव-वर्णन किया गया है। उसमें श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द और उनकी लीला भी निहित है। इसलिये 'भागवत' में श्रीशुकदेवजी कहते हैं— इति वेणुरवं राजन् सर्वभूतमनोहरम्। श्रुत्वा व्रजस्त्रियः सर्वा वर्णयन्त्योऽभिरेभिरे॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।६) वेणुध्वनि-श्रवणका विलक्षण प्रभाव इस वेणुरवमें अमृतत्वका उपलम्भ होता है, जिससे ब्रह्मा, शक्र, सनकादि भी मोहित होते हैं— 'शक्रशर्वपरमेष्ठिपुरोगाः' 'कश्मलं ययुरनिश्चिततत्त्वाः॥' (श्रीमद्भा० १०।३५।१५) इस रवका प्राधान्य इसीलिये है कि उससे पूर्णतम पुरुषोत्तम प्रभु प्रकट होते हैं। वैसे तो प्रभु सर्वत्र हैं ही, पर जब व्यंजक नहीं, तब क्या हो? इसलिये भावुक व्यक्ति भगवान्से भी अधिक व्यंजक नामको बड़ा मानते हैं। अरबोंकी सम्पत्ति घरमें भरी हो, पर यदि वह विदित नहीं तो उसका क्या उपयोग? घरवाला हल ही चलाता रहेगा। नाम या निधिका—खजानेका—बीजक है, पूर्णब्रह्म पुरुषोत्तम प्रभु निधि हैं और नाम उनका बीजक है। यही बात श्रीतुलसीदासजीने कही है— 'नाम निरूपन नाम जतन तें। सोउ प्रगटत जिमि मोल रतन तें॥' (रा०च०मा० १।२३।८) नामद्वारा प्रयत्न करनेपर प्रभु प्रकट होते हैं। अतः कहा है कि 'कहेउँ नामु बड़ ब्रह्म राम तें॥' (रा०च०मा० १।२३।५), 'राम एक तापस तिय तारी। नाम कोटि खल कुमति सुधारी॥' (रा०च०मा० १।२४।३) नाम मूल-चिकित्सा है और राम पल्लव-चिकित्सा। 'राम भालु कपि कटकु बटोरा। सेतु हेतु श्रमु कीन्ह न थोरा॥ नामु लेत भवसिंधु सुखाहीं। करहु बिचारु सुजन मन माहीं॥' (रा०च०मा० १।२५।३-४) श्रीरामने भालु, बन्दरोंको लेकर प्राकृत शतयोजन समुद्र पार किया, किंतु नाम लेनेसे अपार भवसिन्धु सूख जाता है, अतः नाम सबसे बड़ा है। वेदान्त भी कहते हैं कि वाक्य-श्रवणसे तत्त्व-साक्षात्कार होता है। भक्त भी भगवत् साक्षात्कारका मूल श्रवण ही मानते हैं। निर्गुण साक्षात्कारमें भी श्रवणकी ही अपेक्षा है। व्रजांगनाओंको भी उद्बुद्ध उभयविध श्रृंगार रसात्मा श्रीकृष्णके लिये वेणुरव ही अपेक्षित है। इसलिये वे मूल वेणुरवको पकड़ती हैं कि उसीसे श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द व्यक्त होंगे। जैसे हृदयमें प्रथमसे ही विराजमान निर्गुण परब्रह्म तत्त्वका साक्षात्कार श्रवण, मनन, निदिध्यासनद्वारा महावाक्यसे ही होता है, वैसे ही सगुण, साकार सच्चिदानन्द परब्रह्मका भी साक्षात्कार उनके चरित्रों एवं गुणगणोंके श्रवणसे ही होता है। चरित्रश्रवणसे प्रथम चरित्रनायक भगवान्का मानस- रूप प्रकट होता है। उसी मानसी भगवदीय प्रतिमाका