भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 66, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ें५६ भक्तिसुधा श्रीरामचरितमानसमें वर्षा एवं शरद्-ऋतुका वर्णन इन्हीं भावोंको लेकर गोस्वामी श्रीतुलसीदासजीने रामायण किष्किन्धाकाण्डमें वर्षाके अन्त और शरद्के आगमनका वर्णन किया है— दामिनि दमक रह न घन माहीं। खल कै प्रीति जथा थिर नाहीं॥ बरषहिं जलद भूमि निअराएँ। जथा नवहिं बुध बिद्या पाएँ॥ भूमि परत भा ढाबर पानी। जनु जीवहि माया लपटानी॥ हरित भूमि तृन संकुल समुझि परहिं नहिं पंथ। जिमि पाखंड बाद तें गुप्त होहिं सदग्रंथ॥ दादुर धुनि चहुँ दिसा सुहाई। बेद पढ़हिं जनु बटु समुदाई॥ नव पल्लव भए बिटप अनेका। साधक मन जस मिलें बिबेका॥ अर्क जवास पात बिनु भयऊ। जस सुराज खल उद्यम गयऊ॥ ससि संपन्न सोह महि कैसी। उपकारी कै संपति जैसी। ऊषर बरषइ तृन नहिं जामा। जिमि हरिजन हियँ उपज न कामा॥ जहँ तहँ रहे पथिक थकि नाना। जिमि इंद्रिय गन उपजें ग्याना। कबहुँ दिवस महँ निबिड़ तम कबहुँक प्रगट पतंग। बिनसइ उपजइ ग्यान जिमि पाइ कुसंग सुसंग॥ बरषा बिगत सरद रितु आई। लछिमन देखहु परम सुहाई॥ उदित अगस्ति पंथ जल सोषा। जिमि लोभहि सोषइ संतोषा॥ सरिता सर निर्मल जल सोहा। संत हृदय जस गत मद मोहा॥ रस रस सूख सरित सर पानी। ममता त्याग करहिं जिमि ग्यानी॥ बिनु घन निर्मल सोह अकासा। हरिजन इव परिहरि सब आसा॥ कहुँ कहुँ बृष्टि सारदी थोरी। कोउ एक पाव भगति जिमि मोरी॥ चले हरषि तजि नगर नृप तापस बनिक भिखारि। जिमि हरिभगति पाइ श्रम तजहिं आश्रमी चारि॥ (रा०च०मा० ४।१४।२-३, ६ दो० १४; १५।१-३, ५, १०, १२ दो० १५ (ख); १६।१, ३-५, ९-१० दो० १६) वेणुरव वेणुवादन—भगवान्की मंगलमयी लीला वेणुरवमें ही श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दका स्वरूप और उनकी मंगलमयी लीला है, अतः उसके वर्णनमें प्रभुका वर्णन है। पहले तो श्रीकृष्ण ही रसामृतमूर्ति हैं, उनमें भी साधनता और साध्यता दोनों हैं। श्रीहस्त, श्रीचरणारविन्दादि अन्यान्य अंगोंमें साध्यता है और साधनता भी, किंतु आनन्द केवल साध्य ही है, सब उसीके लिये है, पर वह किसीके लिये नहीं। यही तो ब्रह्मका भी लक्षण है, अतः दोनों एक ही हैं। शब्दादि सर्व-पदार्थ जैसे आनन्दके लिये हैं, वैसे ही आत्माके लिये हैं, 'आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति।' (बृहदारण्यक० २।४।५) जैसे आनन्द निरतिशय, निरुपाधिक परप्रेमास्पद है, वैसे आत्मा भी निरतिशय, निरुपाधिक परप्रेमास्पद है। जिसमें कभी प्रेम हो कभी नहीं, वह अपर प्रेमास्पद है। ऐसा जो नहीं, वह प्रेमास्पद है। औपाधिक अपर और स्वाभाविक पर है। औपाधिक उपाधिके अधीन होता है, स्वाभाविक उपाधिके अधीन नहीं होता, वह मिटता नहीं है। संसारके सब प्रेम औपाधिक हैं, जैसे स्त्री-पुत्रादि प्रेम। इतना ही नहीं, संसारमें देवतापर भी प्रेम तब होता है, जब वह अनुकूल होता है। मन्त्रोंमें भी कोई अरिमन्त्र, कोई मध्यम मन्त्र होते हैं। जिससे अनुकूल फल नहीं, वह अरिमन्त्र होता है। इसी विचारसे कहा है कि जब समान तत्त्व और समान साधक मिलें, तब मन्त्रसिद्धि ठीक होती है। अस्तु, सारांश यह कि जब देवता भी आत्मानुकूल हों, तब उनमें प्रेम होता है। देखा जाता है कि शैव वैष्णवसे और वैष्णव शैवसे द्वेष करते हैं। वास्तवमें पूर्णतम पुरुषोत्तम प्रभु एक ही है, पर व्यर्थ उनमें द्वेषास्पदता-रागास्पदताकी कल्पना करते हैं। रामभक्तोंको रामायणमें जो मिठास प्रतीत होती है, वह इतर ग्रन्थोंमें नहीं। वृन्दावनमें तो कृष्णमें भी भेद मानते हैं। एक बायें मुकुटवाले श्रीकृष्ण, दूसरे दायें मुकुटवाले श्रीकृष्ण। वास्तवमें बायें-दायेंमें भी कुछ रहस्य है, कुछ भाव अवश्य है। वेणुगीत प्रसंगमें बायें मुकुटवाले ही श्रीकृष्ण हैं। 'वामबाहुकृतवामकपोलः' (श्रीमद्भा० १०।३५।२) श्रीभगवान्की ललित मूर्तिमें मुकुट बायीं ओर ही झुकता है। कहते हैं, जहाँ वामांगमें