भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
७८ भक्तिसुधा करपादमुखोदरादिः ।' भगवान्का श्रीमुखचन्द्र पूर्णानुराग रससार-सागर- समुद्भूत है। कमल जैसे प्राकृत सरोवरसे उत्पन्न होता है, वैसे भगवान्का मंगलमय मनोहर श्रीवदनारविन्द पूर्णानुरागरससार-समुद्भूत है। प्राकृत जलके सरोवरमें पंक-मृण्मय होता है, उस पंकसे उत्पन्न होनेवाला पंकज कितना सौरस्य, सौगन्ध्य, सौन्दर्य, सुस्पर्श- सम्पन्न होता है ? अब यदि क्षीरमय सरोवर हो तो उसमें पंक भी क्षीरसार नवनीतमय ही होगा और उससे समुत्पन्न पंकजका सौन्दर्य, सौगन्ध्य, सौरस्यादि भी अलौकिक ही होगा। यहाँ तो श्रीश्रीकृष्णमुख- पंकज पूर्णानुरागरससारसरोवर-समुद्भूत है। अतः उस सरोवरका पंक भी पूर्णानुरागरससारसर्वस्व ही होगा। उससे प्रादुर्भूत श्रीकृष्णमुखेन्दीवरकी शोभा, सौन्दर्य, माधुर्य, सौगन्ध्य, सौरस्य आदिका तो कहना ही क्या ? भगवान्का विग्रह फलात्मक है, साधन नहीं अतः श्रीकृष्णका समस्त विग्रह फलात्मक है, साधन नहीं। विधिनिषेध साधनमें ही हुआ करते हैं, फलमें नहीं। अघासुरहनन आदिकी कहीं-कहीं श्रीकृष्णमें साधनता भी थी, परंतु ध्यानकालमें तो वे सुखमात्र स्वरूप होनेसे शुद्ध फलात्मा ही हैं। यदात्मक श्रीकृष्ण होंगे, तदात्मक ही उद्बुद्ध सम्प्रयोगात्मक-विप्रयोगात्मक उभयविध शृंगाररसस्वरूप भगवद्भोग्या अधरसुधा भी होनी चाहिये। अन्यान्य अंगोंमें साधनत्वका निवेश होनेपर भी अधरसुधामें तो केवल फलात्मकता ही है। लौकिक रस तो अनुभव करते-करते कुछ कालमें विरस हो जाते हैं, परंतु इस रसकी यह विशेषता है कि यह कभी विरस नहीं होता, अपितु जैसे-जैसे अधिकाधिक अनुभूत होता है, वैसे-वैसे वृद्धिंगत होता है। कामिनी सम्प्रयोगादिमें यह बात नहीं है, वहाँ तो कामिनी आदिमें विरसता आ जाती है, पर यहाँका रस तो कभी विरस होता ही नहीं-'यह रस विरस होत नहिं कबहूँ।' हाँ तो यह रस गोपिकाओंकी अन्तरात्मा, अन्तःकरण, प्राण, इन्द्रिय, रोम-रोममें भरपूर होकर श्रीव्रजांगनाके अधरपल्लवद्वारा- बर्हापीडं नटवरवपुः कर्णयोः कर्णिकारं बिभ्रद् वासः कनककपिशं वैजयन्तीं च मालाम्। रन्ध्रान् वेणोरधरसुधया पूरयन् गोपवृन्दै- र्वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद् गीतकीर्तिः ॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।५) -इत्यादि वेणुगीतपीयूषरूपमें उद्वेलित होकर अभिव्यक्त हो गया। 'बर्हापीडं' यह साधारण श्लोक नहीं है, अपितु साक्षात् भगवद्भोग्या अधरसुधा ही है। पीछे कहा जा चुका है कि श्रीकृष्णके अधरमें रहनेवाली सुधा उन्हींके लिये सम्भोग्य कैसे हो सकती है ? यह रसशास्त्रके विरुद्ध है। परंतु भगवान्को उस सुधाका सम्भोग इष्ट है, पर यह तभी हो सकता है कि जब यह भगवद्भोग्या अधरसुधा श्रीव्रजांगनाओंके अधरपल्लवोंमें अभिव्यक्त हो। तब ही संप्रयोगात्मक शृंगारमें भगवद्भोग्या अधरसुधा भगवान्को प्राप्त हो सकेगी। इसीलिये भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दने उस सुधाको वेणुमें पूरितकर उसके छिद्रोंसे श्रीव्रजांगनाओंके कर्णकुहरद्वारा उनके हृदयमें प्रविष्ट किया। किंतु जब वह व्रजांगनाओंके द्वारा वर्णित होकर उनके अधरपल्लवपर विराजमान हो, तब उसमें भगवद्योग्यता आये। गोपिकाएँ तो विह्वल होकर उसका वर्णन करनेमें असमर्थ हो रही थीं, किंतु श्रीकृष्णको तो वर्णन कराना अभीष्ट था। अतः उन्होंने अपनी कृपाविशेषसे श्रीव्रजांगना-हृदयस्थ उस सुधाको भावनाद्वारा अभिवृद्धकर उनके मुखद्वारा वर्णन-व्याजसे अभिव्यक्त किया अर्थात् वह भगवद्भोग्या अधरसुधा वेणुगीतरूपमें श्रीव्रजांगनाओंके मुखपंकजमें आयी। वह वर्णन उद्गार होनेसे प्रयत्ननिरपेक्ष एवं बुद्धिनिरपेक्ष है, अतः स्वाभाविक है। वही 'बर्हापीडं नटवरवपुः' है, यही वेणुरव है-'इति वेणुरवं राजन्' (श्रीमद्भा० १०।२१।६) अर्थात् जो भगवद्भोग्या अधर-सुधा व्यक्त हुई, वह एतत् श्लोकात्मक है।
बाह्य रमण और आन्तर रमण यहाँ यह ध्यान रखना चाहिये कि इस श्लोक और अर्थ दोनोंमें अभेद है। नाम-नामी, शब्द-अर्थमें अभेद होता है। प्रियतम प्राणधन निरतिशय निरुपाधिक परप्रेमास्पद भगवान् श्रीकृष्णका श्रीव्रजांगनाओंके साथ बाह्य और अन्तर दोनों रमण विवक्षित है। बाह्यरमण प्रिया-प्रियतमके बाह्य देहके संसर्गसे होता है, किंतु अन्तररमण तो बाह्य देहसंसर्गनिरपेक्ष प्राणोंका, मनका, अन्तरात्माका सर्वांगीण तादात्म्यसे ही बन सकता है, पर श्रीगोपिकाओंसे श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दका आन्तररमण तो तब हो, जब सचमुच ही श्रीकृष्ण उन गोपिकाओंके अन्तरमें विराजमान हों। भावनाओंके प्राखर्यसे भी भावितका साक्षात्कार होता है, पर है वहाँ भावनामय मूर्ति ही। उसके साथ होनेवाले सम्प्रयोगको तात्त्विक नहीं कहा जा सकता, अपितु वह भ्रमात्मक है; क्योंकि वहाँ अनुभव संवाद नहीं है। स्वरूपका वर्णन होनेसे एक दिव्य तेजोमय तत्त्व अभिव्यक्त होता है, वही मनोमयी मूर्ति है। उस मूर्तिमें भी रमण होता है, परंतु वह साक्षात् भी है, ऐसा नहीं कहा जा सकता। यह भावनामूलक मनोमयी मूर्ति है। हाँ, भगवान्की मनोमयी मूर्तिकी भावना भी अनन्तमहिम है, इसमें कोई सन्देह नहीं। विधुरपरिभावितकामिनीके साक्षात्कार और भगवान्की मंगलमयी, भावनामयी, मनोमयीमूर्तिके सौन्दर्य, माधुर्य-समास्वादनमें बड़ा अन्तर है। पहला अनर्थका-पतनका मूल एवं द्वितीय परम कल्याणका मूल है। मनोमयी प्रतिमाका वैशिष्ट्य भगवान्की जैसे धातुमयी, पाषाणमयी, काष्ठमयी प्रतिमा होती है, वैसी ही मनोमयी प्रतिमा होती है। पाषाणादिमयी मूर्तिके अवलम्बसे जैसे शनैः-शनैः भगवदभिव्यक्ति होती है, वैसी ही मनोमयी मूर्तिके चिन्तनसे भगवत्साक्षात्कार होता है। विधुरपरिभावित- कामिनी-साक्षात्कार-स्थलमें कामिनी विद्यमान न होनेसे वह केवल भावना है, भ्रम है, किंतु भगवान् सर्वान्तरात्मा, सर्वव्यापक हैं, भावुकपरिभावित मनोमयी भगवन्मूर्तिकी भावनाके प्राखर्यसे होनेवाला भगवत्-साक्षात्कार तात्त्विक है; क्योंकि जहाँ भगवान्का भावनाभावित साक्षात्कार हो रहा है; वहाँ सर्वान्तरात्मा भगवान् स्वयं विराजमान हैं। इसीलिये अघासुर वध-प्रसंगमें कहा गया है कि श्रीशुकदेवजीने जब कहा कि द्विजमांसरुधिराशी महापापी अघासुरके मुखसे दिव्य ज्योति निकलकर भगवान् श्रीकृष्णके मुखमें प्रविष्ट हुई, तब यह सुनकर परीक्षित्को सन्देह हुआ कि 'यह क्या ? बड़े-बड़े योगीन्द्र-मुनीन्द्रोंको भी जो गति परम दुर्लभ है, वह उस दुष्ट दानव अघासुरको कैसे प्राप्त हुई ?' इसपर श्रीशुकदेवने कहा कि जिस अखण्ड, अनन्त, स्वप्रकाश, परमानन्दमूर्ति भगवान्के श्रीअंगकी केवल मनोमयी भावनामयी मूर्ति एक बार भावुकके स्वच्छ, समाहित अन्तःकरण पंकजपर आविर्भूत होकर भागवती गति-सायुज्य मुक्ति प्रदान करती है, वही सद्घन, चिद्घन, आनन्दघन, नित्य, स्वप्रकाश रूपसे माया एवं मायिक प्रपंचको तिरस्कृत करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं जिसके उदरमें प्रविष्ट हुए, उसकी मुक्तिमें क्या सन्देह है ? सकृद् यदङ्गप्रतिमान्तराहिता मनोमयी भागवतीं ददौ गतिम्। स एव नित्यात्मसुखानुभूत्यभि- व्युदस्तमायोऽन्तर्गतो हि किं पुनः॥ (श्रीमद्भा० १०।१२।३९) भक्तकी भावनाके अनुसार ही भगवान्का स्वरूपधारण भावुकका रसिक मन भगवान्को बनाता है, भक्त जैसी-जैसी मूर्तिकी भावना करता है, भगवान्को वैसा-ही-वैसा स्वरूप धारण करना पड़ता है— 'यद्यद्धिया त उरुगाय विभावयन्ति तत्तद्वपुः प्रणयसे सदनुग्रहाय॥' (श्रीमद्भा० ३।९।११) साधारण मनुष्योंकी कल्पना मनोराज्य है, परन्तु भावुककी कल्पना फलपर्यवसायिनी होती है। इसलिये भावनाका प्राखर्य होनेपर भक्तोपहृत वस्तु भगवान्में उपलब्ध हो सकती है। यहाँ तर्क हो सकता है कि प्रत्यक्ष,
८० भक्तिसुधा अनुमान आदि तो प्रमाण हैं, किंतु भावना प्रमाणकोटिमें परिगणित नहीं है, अतः भावनाभावित मनोमयीमूर्तिका साक्षात्कार विधुरपरिभावित कामिनी-साक्षात्कारके समान भ्रमात्मक है। किंतु ऐसा नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि पहले कह आये हैं कि विधुरपरि- भावितकामिनी-साक्षात्कारस्थलमें वहाँ कामिनीके न होनेके कारण प्रमाणान्तरके साथ विसंवाद होनेसे वह साक्षात्कार भले ही भ्रम हो, परंतु निर्गुण परब्रह्म- साक्षात्कारस्थलमें तो उपनिषदादि प्रमाणान्तर संवाद है अर्थात् शब्दप्रमाणभूत उपनिषद् ब्रह्मका जैसा स्वरूप बतलाती हैं, वैसा ही यहाँ साक्षात्कार भी हो रहा है। अतः इसको भ्रम नहीं कहा जा सकता। भगवान् सर्वव्यापक हैं, किंतु माया-जवनिकासे समावृत होनेके कारण सबको प्रकाशित नहीं होते—'नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः।' (गीता ७।२५) किंतु वही भगवान् भक्तकी भावनासे या स्वानुग्रहविशेषसे यहाँ उस माया-जवनिकाका अपसारण कर देते हैं, वहीं उनका प्राकट्य हो जाता है। अर्थात् भावनामयी मूर्ति ही प्राकृतत्वको छोड़कर अप्राकृतत्वको धारण कर लेती है। यह ध्यानकी महिमा है, ध्यानके बढ़नेसे अलौकिकत्व आता है। उत्तराके गर्भमें अश्वत्थामाके ब्रह्मास्त्रसे परीक्षित्की रक्षा करनेके लिये क्या कहीं बाहरसे आकर प्रविष्ट हुए ? प्रह्लादके रक्षार्थ खम्भेमें कहाँसे आये ? सर्वव्यापक होनेसे वे वहाँ पहलेसे थे ही, केवल अनुग्रहसे भक्त-रक्षार्थ माया-जवनिकाको दूरकर वहाँ प्रकट हो गये। ऐसे ही निर्गुणब्रह्म-साक्षात्कार-स्थलमें भी तत्त्व सर्वव्यापक होनेसे श्रवण-मननसे ही माया-जवनिकाका अपसरण हो जानेपर उसकी उपलब्धि हो जाती है; क्योंकि ज्ञान, ज्ञेय एवं ज्ञानगम्य सबके हृदयमें स्थित है— 'ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्॥' (गीता १३।१७) किंतु उस माया-जवनिकाका पुनः आवरण न हो जाय, इसलिये उस श्रुत, मत, साक्षात्कृत तत्त्वाकाराकारित विशुद्ध मानसीवृत्तिके निरन्तर आदरपूर्वक अखण्ड प्रवाहरूप निदिध्यासनकी अपेक्षा है। इस तरह निर्गुण-सगुण भगवान्का साक्षात्कार भ्रम नहीं, अपितु परमार्थ-भूत है। अस्तु, प्रकृतमें उद्बुद्ध सम्प्रयोगात्मक- विप्रयोगात्मक उभयविध शृंगारस्वरूप निखिल रसामृतमूर्ति श्यामसुन्दर व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण ही 'बर्हापीडं' आदि वेणुगीतरूपमें श्रीव्रजांगनाओंके मानसपंकजमें पधारे और भावनाविशेषद्वारा वृद्धिंगत होकर उन व्रजांगनाओंकी अन्तरात्मा, मन, प्राण, इन्द्रिय आदिमें भरपूर होकर उनको अप्राकृत बनाकर मधुर मनोहर मंगलमयमूर्तिमें अभिव्यक्त होकर उन्होंने श्रीव्रजांगनाओंके साथ आन्तररमण किया। यह आन्तररमण ही यथार्थ रमण है, यहाँ देहादिका व्यवधान नहीं है, बल्कि अन्तःकरणमें ही श्रीकृष्णका प्राकट्य होनेसे व्रजांगनाओंसे उनका व्यवधानरहित परम आन्तररमण सम्पन्न हुआ है। यहाँका वैलक्षण्य यह है कि एक कालमें ही सम्प्रयोग-विप्रयोग उभयात्मक शृंगाररसका अनुभव होता है और दोनों ही उद्बुद्ध-उद्वेलित हैं। इसी बातको दिखलानेके लिये 'वेणुरव' शब्दका प्रयोग हुआ है। 'र' अग्निबीज होनेसे उससे विप्रयोगात्मक उद्बुद्ध शृंगाररसका ग्रहण है और 'व' अमृतबीज होनेसे उससे सम्प्रयोगात्मक उद्बुद्ध शृंगाररस गृहीत हुआ है। अमलात्मा महायोगीन्द्र भी भगवान्के लोकोत्तर माधुर्यसे मुग्ध हो जाते हैं इस रसकी यही विशेषता है कि वह बड़े-बड़े निर्विकल्प समाधिसिद्ध निर्गुणब्रह्मस्वरूपनिष्ठ महायोगीन्द्र मुनीन्द्रोंको भी अपनी ओर बलात् आकर्षित कर लेता है। आत्मस्वरूपमें रमण करनेवाले, चिज्जड़ाध्यासरूप ग्रन्थिका छेदन करनेवाले शुकादि, सनकादि महामुनीन्द्रगण भी उस अखण्ड, अनन्त, असंग, कूटस्थ, स्वात्मस्वरूपमें स्थितिको छोड़कर उस अचिन्त्य, अनन्त, सुमधुर अखिलरसामृतमूर्ति श्रीकृष्णके परम मंगलमय, लोकोत्तर, अद्भुत, मनोहर सौन्दर्य, माधुर्यके समास्वादनमें आसक्त हो जाते हैं—
वेणुगीत ८१ आत्मारामाश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे। कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरिः॥ (श्रीमद्भा० १।७।१०) शौनकजीको इस बातपर बड़ा सन्देह हुआ कि 'उन शुकदेवजीने जो जन्मसे ही सजातीय, विजातीय, स्वगतभेदरहित, अखण्ड, अनन्त, स्वप्रकाश, निर्गुण परब्रह्ममें परिनिष्ठित थे, जिनकी अखण्ड स्थिति चाहे आकाश टूट पड़े, मेरु विशीर्ण हो जाय या समुद्र सूख जाय तो भी टस-से-मस नहीं होती थी, सांसारिक मायामोहके जालमें बँध जानेके भयसे जो द्वादश वर्षपर्यन्त माताके उदरसे बहिर्भूत न होकर वहीं निर्गुण, निराकार तत्त्वमें सर्वात्मना परिनिष्ठित रहे, जैसे-तैसे गर्भसे निकलते ही अरण्यकी ओर चल पड़े, तत्त्ववित् होनेके कारण स्त्री-पुरुष आदि भेद जिनकी दृष्टिमें आता ही न था, उन महायोगी श्रीशुकदेवने अष्टादशसहस्र श्लोकवाली भागवत महासंहिताको अपने पिता श्रीव्याससे कैसे अध्ययन किया?' इसपर सूतजीने कहा- बर्हापीडं नटवरवपुः कर्णयोः कर्णिकारं बिभ्रद् वासः कनककपिशं वैजयन्तीं च मालाम्। रन्ध्रान् वेणोरधरसुधया पूरयन् गोपवृन्दै- र्वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद् गीतकीर्तिः॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।५) श्रीव्यासजीने यह श्लोक अपने कतिपय शिष्योंको पढ़ाकर उन्हें श्रीशुकदेवके पास अरण्यमें भेजा। शिष्योंने अरण्यमें शुकदेवजीके पास जाकर बड़े मधुर स्वरमें उक्त श्लोकको पुनः-पुनः पढ़ा। उसे श्रवणकर और तद्वर्णित श्यामसुन्दर मदनमोहन भगवान् श्रीकृष्णकी मधुर मनोहर मूर्तिका चिन्तनकर उनकी समाधि भग्न हो गयी। प्रेममें विभोर होकर नाचने लगे। शिष्योंने जाकर व्यासजीसे सब हाल सुनाया। व्यासजीने सोचा कि उस श्लोकका प्रभाव तो पुत्रपर हुआ, पर वह अबतक आया क्यों नहीं? दिव्य दृष्टिसे देखनेपर उन्होंने निश्चित किया कि उसे यह सन्देह हो गया कि 'ऐसे लोकोत्तर सौन्दर्य लावण्यसम्पन्न भगवान् मुझ-जैसे दीनपर कृपा कैसे करेंगे?' बस, व्यासजीने एक दूसरा श्लोक पढ़ाकर शिष्योंको पुनः शुकदेवजीके पास भेजा। शिष्योंने उस श्लोकको मधुर स्वरसे गाकर शुकदेवजीको सुनाया- अहो बकी यं स्तनकालकूटं जिघांसयापाययदप्यसाध्वी । लेभे गतिं धात्र्युचितां ततोऽन्यं कं वा दयालुं शरणं व्रजेम॥ (श्रीमद्भा० ३।२।२३) अर्थात् 'आश्चर्य है कि जिस लोकबालघ्नी दुष्ट राक्षसी पूतनाने प्रभुको मार डालनेकी इच्छासे कालकूट हलाहल विषसंपृक्त स्तन्यपान कराया, पर उसको भी जिसने माताको प्राप्त होनेयोग्य सद्गति प्रदान की, उस भगवान्से अधिक दयालु, कृपामय और दूसरा कौन होगा?' श्रीब्रह्माजीको भी इस बातकी बड़ी चिन्ता हुई थी कि भगवान् इन व्रजनिवासी गोपोंसे कैसे ऋणमुक्त होंगे? ब्रह्माने जब भगवान्से कहा कि 'हे देव! मुझे यह सोचकर बड़ा मोह हो रहा है कि आप इन ग्वालोंको क्या देकर उनके ऋणसे मुक्त होंगे? यदि कहें कि इसकी क्या चिन्ता है? उन्हें त्रैलोक्य-सुख देकर उऋण हो जाऊँगा, परंतु भगवन्! आप ही सर्वफलात्मा-अनन्त सौख्य-सिन्धु हैं। निखिल ब्रह्माण्डके समस्त प्राणी जिस आनन्दसुधा- सिन्धुके एक बिन्दुको प्राप्तकर आनन्दित हो रहे हैं- 'अस्य मात्रामुपजीवन्ति' वही अनन्त, अखण्ड, महान् आनन्दसिन्धु मूर्तिमान् जिनके आँगनमें धूलि- धूसरित होकर विहरण कर रहा है, उन्हें आनन्दबिन्दुका लोभ क्या दिखलाया जाय? इसलिये उन्हें त्रैलोक्य सुख देकर भी आप उनके ऋणसे मुक्त नहीं हो सकेंगे। यदि कहें कि केवल इन व्रजवासियोंको ही नहीं, उनके समस्त कुलको मैं अपने-आपको देकर ऋणमुक्त हो जाऊँगा तो भगवन्! क्या जो व्यवहार आपको विषमिश्रित स्तन्यपान करानेवाली पूतनाके साथ, वही इन धाम, अर्थ, सुहृत्, प्रिय देह, पुत्र, प्राण एवं अन्तरात्मा आदि सब कुछ आपके श्रीचरणोंपर
८२ भक्तिसुधा न्यौछावर करनेवाले इन व्रजवासियोंके साथ भी उचित होगा? क्या ‘टके सेर भाजी, टका सेर खाजा’ वाली बात होगी? पूतनाके कुल-कुटुम्बमें ही ऐसा कौन बचा है, जिसे आपने सद्गति न प्रदान की हो? तृणावर्त, अघासुरादि सभी पूतनाके कुटुम्बियोंको तो आपने आत्मसमर्पण किया है। अस्तु, तात्पर्य यह निकला कि विषप्रदान करनेवाली पूतनाको भी जिन्होंने आत्मसमर्पण किया, योगीन्द्र-मुनीन्द्रोंको स्वप्नमें भी जिनका दर्शन दुर्लभ है, उन कमलदलसे भी शतकोटि गुणित अधिक कोमल अपने श्रीचरणोंसे उसके अंगपर क्रीड़ा की, जिसके प्रभावसे पूतनाका शव जब जलाया गया, तब उसमेंसे ऐसी दिव्य सुगन्धिका प्रसार हुआ, जो तीन योजनकी आसमन्तात् भूमिमें व्याप्त हो गया, उस कृपासिन्धु भगवान् श्रीकृष्णसे अधिक दयालु कौन होगा? इस श्लोकको श्रवण करते ही श्रीशुकदेवजी गद्गद हो गये और व्यासजीके पास जाकर उनसे समस्त ‘भागवत’ का अध्ययन किया। भगवान्में सम्प्रयोगात्मक-विप्रयोगात्मक उभयविध शृंगारकी एक कालमें प्रतिष्ठा ऐसे योगीन्द्रोंके भी निर्गुण ब्रह्मनिष्ठ, शान्त, समाहित अन्तःकरणोंको अपने दिव्य सुमधुर मनोहर सौरम्य, सौगन्ध्य, सौन्दर्य आदि गुणगणोंसे आकर्षित करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण अपने ग्वालबालोंके साथ श्रीमद्वृन्दारण्यधाममें पधारे। कैसे पधारे? ‘नटवरवपुः बिभ्रत्’ अर्थात् नटके समान और वरके समान शृंगार धारण करके पधारे। यहाँ ‘नट’ पदसे विप्रयोगात्मक एवं ‘वर’ पदसे सम्प्रयोगात्मक शृंगाररस अभिप्रेत है। नट चन्द्रमा, वायु आदि वास्तविक सामग्रियोंके अभावमें भी अपने अभिनयोंद्वारा रसका अभिव्यंजन करता है। प्रियतमके साथ सर्वांगीण संश्लेष विद्यमान होनेपर भी अकस्मात् वियोगजन्य तीव्र तापका अनुभव होता है। ‘नट’ पदसे उसी विप्रयोगात्मक शृंगाररसका ग्रहण किया है। भावुकोंके यहाँ सम्प्रयोगात्मक शृंगारकी अपेक्षा विप्रयोगात्मक शृंगारका अधिक सम्मान है, इसीलिये अभ्यर्हितत्वात् नट पदका प्रयोग पहले किया। किसीने श्रीकृष्णसे कहा—‘महाराज! ललिता, विशाखा आदि आपकी प्रियतमाएँ आपके वियोगसे अत्यन्त दुःखी हैं, आप एक बार व्रजमें जाकर उन्हें दर्शन क्यों नहीं दे आते?’ श्रीकृष्णने उत्तर दिया कि ‘अब उन्हें हमारी आवश्यकता ही नहीं रही; क्योंकि हम जब उनके पास रहते हैं, तब उन्हें हमारा केवल बाह्य रमण ही अनुभूत होता है, किंतु मेरे समीप न रहनेपर मानस संस्मरणकी विशेषतासे उन्हें हमारे सर्वांगीण आन्तर-रमणका अनुभव होता है—इस तरह जैसे सम्प्रयोगकालमें भी विप्रयोगका अनुभव होता है, वैसे ही विप्रयोग-अवस्थामें कभी- कभी सम्प्रयोगका आनन्द प्राप्त होता है।’ इसी स्थितिका वर्णन इस श्लोकमें मिलता है— प्रासादे सा दिशि दिशि च सा पृष्ठतः सा पुरः सा पर्यङ्के सा पथि पथि च सा तद्वियोगातुरस्य। हंहो चेतः प्रकृतिरपरा नास्ति मे कापि सा सा सा सा सा सा जगति सकले कोऽयमद्वैतवादः॥ (सुभाषितरत्नभाण्डागार ६।६५) जब विप्रयोगात्मक शृंगार उद्वेलित होता है, तब सकल जगत् प्रभुमय हो जाता है, अतः ‘नटवत्’ कहा। सभ्योंको रसास्वादन करानेके लिये जैसे नट विचित्र स्वरूपको धारण करता है, वैसे ही श्यामसुन्दर व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णने श्रीव्रजांगनाओंके मनको आकर्षित करनेके लिये विचित्र वेश धारण किया है। एवंच ‘वर’ पदसे प्रत्यग्रभोक्ता दूल्हा लिया जाता है। विवाहार्थ जाते हुये वर जैसे सर्वापेक्षया अधिक सुन्दर वस्त्र, आभूषण आदि धारणकर अपनेको सुसज्जित करता है, वैसे ही श्रीकृष्ण भी सुन्दर वेश धारणकर श्रीमद्वृन्दारण्यधाममें पधारे। ‘वर’ पद सम्प्रयोगात्मक शृंगारका द्योतन करता है। इस तरह नटवरवपुसे उद्बुद्ध सम्प्रयोगात्मक, विप्रयोगात्मक उभयविध शृंगाररसात्मकता भगवान् श्रीकृष्णकी बतलायी गयी है। बर्हापीडं नटवरवपुः कर्णयोः कर्णिकारं बिभ्रद् वासः कनककपिशं वैजयन्तीं च मालाम्।
वेणुगीत ८३ रन्ध्रान् वेणोरधरसुधया पूरयन् गोपवृन्दै- वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद् गीतकीर्तिः॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।५) भगवान् परमानन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्र नटवरवपुको धारण किये, बर्हमय आपीड़को धारण किये, वैजयन्ती मालाको पहने, कानोंमें कर्णिकार पहने, गोपवृन्दके संग वेणुको अधरसुधासे पूरित करते हुए श्रीवृन्दारण्य- धाममें पधारे। अनन्त ब्रह्माण्डके प्राणियोंको आनन्दित करनेवाले, रसोंके उद्गम-स्थान, निखिलरसामृत- सिन्धुसारसे प्रभु श्रीकृष्णके अंगोंका निर्माण है। निखिलरसामृतमूर्ति होते हुए भी विशेषतः उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररससे आपके श्रीअंगका निर्माण है। अन्यत्र सम्प्रयोगात्मक-विप्रयोगात्मक दोनों ही शृंगार एक-कालावच्छेदेन उद्बुद्ध एवं उद्वेलित नहीं होते। यहाँ परस्परविरुद्धधर्माश्रय ‘अणोरणीयान् महतो महीयान्' प्रभु श्यामसुन्दरमें तो दोनों ही प्रकारके शृंगाररस एककालावच्छेदेन व्यक्त होते हैं। तुव मुखचन्द्र चकोरी मेरे नयना। अरबरात निशदिन मिलिवे को, मिलेइ रहत मानो कबहुँ मिले ना॥ अद्भुत प्रेमोन्मादमें श्रीकृष्ण और वृषभानुनन्दिनीको सम्प्रयोगमें भी विप्रयोग और विप्रयोगमें भी सम्प्रयोगकी स्फूर्ति होती है। अस्तु, इस तरह उद्वेलित सम्प्रयोगात्मक- विप्रयोगात्मक उभयविध शृंगाररससारसर्वस्वसे ही नटनागरके श्रीअंगका निर्माण हुआ है। अतः वे नटवरवपु हैं, अथवा 'नटवरवपुः-नटेभ्योऽपि वरं वपुः यस्य सः।' नटोंसे भी वरशोभन, सुन्दर वपुको धारण किये हुए भगवान् पधारे। नट तो बहुत हैं, नाचनेवाले सब ही हैं, पर ब्रजमोहन श्रीकृष्णचन्द्रका नटवरवपु कुछ लोकोत्तर ही है, भगवान् श्रीशंकर विश्वनाथका तांडवनृत्य प्रसिद्ध है, जिसको देखनेके लिये सम्पूर्ण इन्द्र, चन्द्र, वरुणादिक देवता, अप्सरा, सिद्ध, महर्षि, यक्ष, किन्नरादिक सब पधारते हैं। प्रदोषकालमें जब भगवान् नटराजराज भूतभावन विश्वनाथका तांडवनृत्य होता है, तब सब देव तो क्या, स्वयं श्रीकृष्णचन्द्र भी पधारते हैं, उनका ऐसा अद्भुत नृत्य है, इसीलिये वे नटराजराज हैं। उनके जैसा तांडवनृत्य किसीका नहीं, पर श्रीकृष्ण परमानन्द- कन्द मनमोहन व्रजेन्द्रनन्दनका तांडवनृत्य तो ऐसा विलक्षण है, जो कालियनागके फणोंपर हुआ। उसकी सामग्री भी विचित्र है, जब प्रभु कालिय हृदमें प्रविष्ट हुए, उसके उन्नत फणोंपर जब नृत्य करने लगे, तब देवता, अप्सरागण वाद्य बजाने लगे। इस नृत्यके लिये दूसरा उदाहरण ही नहीं है, इसलिये ‘नटवरवपुः’ कहते हैं। नटसे, नटराजसे, नटराजराजसे भी शोभन वपुको भगवान्ने धारण किया। यह स्वरूप ऐसा है, जिसे देखकर चर-अचर, जड़-चेतन सब नाच उठे, इसलिये 'नटनं आनन्दोल्लासविकारं राति ददातीति नटवरं तद् वपुरिति नटवरवपुः'—जो स्थावर- जंगम सबको आनन्दोल्लास प्रदान करे, वह नटवर है। इसकी विशेषता क्या कही जाय, औरोंकी तो बात ही क्या, वह स्वरूप स्वयं व्रजेन्द्रनन्दन श्यामसुन्दर मनमोहन भगवान्को ही नचा देता है। भगवान् नाचे ही— यन्मर्त्यलीलोपयिकं स्वयोग- मायाबलं दर्शयता गृहीतम्। विस्मापनं स्वस्य च सौभगर्द्धेः परं पदं भूषणभूषणाङ्गम्॥ (श्रीमद्भा० ३।२।१२) भावुक जन कहते हैं—भगवान् मानव-लीलाके उपयुक्त मायाबलको दिखाते हुए ऐसे स्वरूपको धारण करते हैं कि वह स्वरूप स्वयं उन्हें ही विस्मयमें डाल देनेवाला हो जाता है। अहो! वह सौन्दर्य, माधुर्य, सौरस्य अद्भुत है, वे भाग्यवान् हैं, जो ऐसे स्वरूप-रसका आस्वादन करते हैं। अपने अमृतमय मुखचन्द्रको देखनेका सौभाग्य तो स्वयं भगवान्को नहीं, वह तो वृषभानुनन्दिनीको, व्रजांगनाओंको, भक्तोंको ही है, भगवान् केवल मणिमय प्रांगणमें मणिस्तम्भोंमें आत्मप्रतिबिम्बोंको ही देखते हैं। रत्नस्थले जानुचरः कुमारः सङ्क्रान्तमात्मीयमुखारविन्दम्। आदातुकामस्तदलाभखेदान्निरीक्ष्य धात्रीवदनं रुरोद॥
८४ भक्तिसुधा नन्दरानीके मणिमय प्रांगणमें घुटनोंको टेकते हुए चलते-चलते आप अपने मुखचन्द्रके प्रतिबिम्बको देखकर मुग्ध हो गये, नाच उठे। रूप रासि नृप अजिर बिहारी। नाचहिं निज प्रतिबिंब निहारी॥ (रा०च०मा० ७।७७।८) अपने श्रीअंगके सौन्दर्यको देखकर, अपने मुखचन्द्रका प्रतिबिम्ब देखकर स्वयं चाहते हैं कि मैं इसे ले लूँ, क्योंकि प्यारी वस्तु बिना हृदयमें रखे दूरसे देखनेमें सन्तोष नहीं होता। वास्तवमें यह भावना भक्तोंकी होती है, पर वही भावना व्रजेन्द्रनन्दन श्यामसुन्दर मनमोहनको अपने श्रीअंगका प्रतिबिम्ब देखकर हुई और वे उसे लेना, पकड़ना चाहते हैं, किंतु वह पकड़नेमें आता नहीं, इसलिये खिन्न हो गये और व्रजरानी अम्बाका मुख देखकर रोने लगे, अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायक जिसे देखकर मुग्ध हो गये, तब उसे चराचर विश्व देखकर नाच उठे, इसमें आश्चर्य ही क्या ? भगवान् अपनी सर्वज्ञता सर्वशक्तिमत्ता सब कुछ भूल गये, इस प्रकार स्वयं भगवान्को ही विस्मयमें डाल दिया, ऐसा वह स्वरूप है—'भूषणानां भूषणानि अंगानि यस्य सः॥' भगवान्के अंगसंगसे ही भूषणोंकी शोभा उनके एक-एक अंग भूषणोंको भूषित करनेवाले हैं, भगवान्के भूषण प्रभुके श्रीअंगको भूषित नहीं करते, प्रभुधारित किरीट, कौस्तुभ, कुण्डल, कटक, अंगद जो हैं, उनसे प्रभुका श्रीअंग सुशोभित हो; यह नहीं, किंतु प्रभुके सिरसे किरीट, कण्ठसे कौस्तुभ, कानोंके सम्बन्धसे कुण्डल, हाथोंसे कटक, बाहुसे अंगद आदि भूषण ही भूषित होते हैं। यही वास्तवमें ऊँचा सिद्धान्त है। यही कहा है—'चलापि यच्छ्रीर्न जहाति कर्हिचित्॥' (श्रीमद्भा० १।११।३३) लक्ष्मी, शोभा, श्री सर्वत्र चंचला कही जाती है। वस्तुमात्रमें शोभा रहती है, पर कबतक, जबतक 'जायते, अस्ति, वर्धते' बस! यहींतक, जहाँ 'विपरिणमते' आया कि शोभा घटी। वृक्षके अंकुर, पत्र, पुष्प, फलतक शोभा तथा बादमें घटना शुरू। इस रीतिसे जगत्के वस्तुमात्रमें शोभा चंचला-ही- चंचला है, किंतु अचला कहाँ ? केवल प्रभुके मंगलमय श्रीअंगमें। क्यों ? वहाँपर उसके स्वभावानुसार 'जायते, अस्ति, वर्धते' तक ही है, आगेके विकार नहीं। यों तो भगवान् षड्विकाररहित हैं, पर वह निर्गुण, निराकार सच्चिद्घन दृष्टिसे। भक्त भावुकोंकी दृष्टिमें तो वे सगुण, साकार, परमानन्द, निखिल- रसामृतमूर्ति हैं। तभी तो नन्दरानीसे जन्म 'जायते', व्रजराज नन्दबाबाके मंगलमय गोदमें शैशव-कौमार- पौगण्ड-कैशोरादि अवस्थाओंके कारण 'वर्धते' बस ! आगे विपरिणामादि नहीं। शोभा चंचला होनेपर भी घटे कैसे ? वहीं-की-वहीं पड़ी है। 'देवीभागवत' में गोलोकवर्णनके सम्बन्धमें बड़ी विचित्र गाथा है—गोलोकवासी श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दरूपके पास वृषभानुनन्दिनीका वास। यहाँ शोभा तथा प्रभा, क्षमा, शान्ति, दान्ति—ये सब गोपांगनाएँ हैं, ऐसा वर्णन है। वहाँ श्यामसुन्दर व्रजेन्द्रनन्दन भगवान्के साथ शोभा गोपांगना विहार करती थी। उस समय श्रीवृषभानुनन्दिनी पधारीं, उन्हें देखते ही लज्जा और भयसे शोभानें देह त्याग दिया और उसीमेंसे सब ब्रह्माण्डमें विद्वान्के मुख आदि वस्तुओंमें वह बँट गयी। ऐसी ही क्षमा, शान्ति, दान्ति इत्यादिकी कथा है। तात्पर्य यह कि वृषभानुनन्दिनीसे लज्जित शोभा, क्षमादि इतर वस्तुओंमें बँटी। आध्यात्मिकी, आधिभौतिकी, आधिदैविकी शक्तिरूपमें जो शोभादि भगवान्में रहा करती हैं, वे अपनी ही लालसासे रहती हैं, भगवान् उन्हें बुलाते नहीं। उद्धवसे प्रभु कहते हैं—'निर्गुणं मां गुणाः सर्वे भजन्ति निरपेक्षकम्'—सर्वगुण अपनी गुणत्वसिद्धिके लिये मुझे भजते हैं, मैं भी उनको स्वीकार कर लेता हूँ, अगर वह भक्तिपुरःसर होकर आयें तो। लक्ष्मीको भी भगवान्ने थोड़े ही चाहा, वही कहती है— 'सुमङ्गलः कश्च न काङ्क्षते हि माम्॥' (श्रीमद्भा० ८।८।२२) समुद्रमन्थनसे जब लक्ष्मीजीका जन्म हुआ, तब उन्होंने स्वयंवरके लिये देव, दानव, दैत्य,
वेणुगीत ८५ महर्षि सबको देखा, मगर मन तो उनका था 'सुमंगल' में। उनमें केवल दोष यही है कि 'काङ्क्षते हि माम्॥' वे सोचती थीं—'जो मुझे चाहते हैं, वे मुझे पसन्द नहीं हैं। जिसे मैं चाहती हूँ, वह मुझे नहीं चाहते। वे भी क्यों चाहें, वे स्वप्रकाश सच्चिद्घन परमानन्दरूपमें ही स्थित हैं, तब भी उन्हींको वरा। इसपर श्रीभगवान्ने उसको अपने परमसुभग वक्षःस्थलपर ही स्थान दिया। ऐसे ही सब गुण-गणोंका भी हाल है। भगवान् उन्हें नहीं चाहते, वे भगवान्को चाहते हैं। भगवती महालक्ष्मीको भगवान् श्रीशंकरमें भी गुण मिले, पर लक्ष्मी उनके वेशसे डर गयीं। संसारमें सामान्यतः जामाता (दामाद) कैसा ही हो, सासको अच्छा लगता है, पर पार्वती-विवाहमें हिमालयपत्नी मैना भी डर गयी थी। माता गौरी नहीं डरी। गौरीको जैसा शिवका साक्षात्कार था, वैसा महालक्ष्मीको नहीं था। उसे तो शुद्धत्वादिसर्वगुण ठीक जँचे, पर अमंगलत्वसे डर गयी।' 'महोक्षः खट्वाङ्गं परशुरजिनं भस्म फणिनः।' लक्ष्मीके लिये शिवके मोहक स्वरूपका प्रादुर्भाव न होना, भावके अनुकूल ही था। सुमंगलमें तो चमक-दमक सब कुछ, पर वह तो चाहते ही नहीं। भावुक कहते हैं कौस्तुभादिने न जाने कितनी तपस्या की। इसलिये कि भगवान् हमें स्वीकार करें, तब भगवान्ने स्वीकार किया। कौस्तुभादिकी कितनी भाग्यमहिमा? गोपांगनाएँ कहती हैं— सखि हों ब्रजरज क्यों न भई। ब्रजरज होतीं तो उड़कर लगतीं भगवान्के श्रीअंगमें। उसमें कोई विघ्न नहीं हो सकता था। कौस्तुभ तो सदा वक्षःस्थलपर विराजमान है। यहाँतक कि वृषभानुनन्दिनी भी कौस्तुभसे ईर्ष्या करती हैं। वे कहती हैं—सखि, यदि भगवान् किसीको भी न मिलते तो सन्ताप न होता, मगर माला तो सदा ही प्रभुके वक्षःस्थलपर विहार करती है। कहो, माधुर्याधिष्ठात्री श्रीवृषभानुनन्दिनी जिससे ईर्ष्या करें, उसका कम सौभाग्य है? कुण्डलकी, जो नित्य भगवान्के कपोलोंका चुम्बन करता है, क्या कम महिमा है? इन्होंने कितनी तपस्या की होगी? 'गोपालचम्पू' में कहा है— कुण्डलोंपर मकरीकी भावनाकर कहती है—'हे मकरि! तू हमारे श्यामसुन्दर मनमोहनके कपोलोंका चुम्बन करती है।' यह सब गोपांगनाओंकी ईर्ष्या। अस्तु, गुण अपने आश्रयमें आनन्द और महत्त्वकी अतिशयताका आधान करते हैं और अनर्थका निवारण करते हैं। अनन्त आनन्दरूप श्रीकृष्णमें आनन्द और महत्त्व निरतिशय है, उसमें अतिशयताका आधान हो ही नहीं सकता एवं अनर्थोंका स्पर्श भी नहीं, फिर उनमें गुणोंकी जरूरत ही क्या? वैसे ही भूषणोंसे शोभा बढ़ानेकी जरूरत ही क्या? जहाँ स्वयं लक्ष्मी ही निवास करती है। भगवान्को किसीकी अपेक्षा नहीं, किंतु उन-उन वस्तुओंकी तपस्यापर प्रसन्न होकर भक्तिको देखकर उनको स्वीकार किया। रामजीकी जब बरात निकली, तब सब शकुन आप ही प्रकट हो गये। उन्होंने सोचा, अगर इस समय न गये तो फिर सफलता कब मिलेगी? एवं सब प्रकारके भूषणभूषित भगवान् अपने स्वरूपको देख विस्मयमें पड़ गये और नाच उठे। सुनि अस ब्याहु सगुन सब नाचे। अब कीन्हे बिरंचि हम साँचे॥ (रा०च०मा० १।३०४।३) नाचका मूल आनन्दोल्लास है, वह किससे? निज प्रतिबिम्ब-दर्शनसे। तात्पर्य, प्रभु-स्वरूप ही ऐसा है, जो चराचर विश्वको नचाये और भगवान्को भी नचाये, स्वगुण भी भुलाये, फिर जहाँ नटवरवपु हुए वहाँ क्या कहना है? नट सभ्योंको रसास्वादन करानेके लिये विचित्र प्रकारका वेश धारण करता है, यहाँ तो भगवान् अपनी ही रुचिसे स्वाभाविक ही वैसे हैं। नट सर्व सभ्योंको रसमें ओत-प्रोत करनेके लिये विशेष तैयारी करता है, यहाँ तो वह बात नहीं। 'नटेभ्योऽपि वरं वपुः यस्य सः।' वर—दूल्हाकी तरह जो स्वभावसे ही सुन्दर हैं। लोकमें जहाँ लगन शुरू हुआ, वहाँ उबटन वगैरह लगाना शुरू हुआ। अधिक दहेजके लिये सौन्दर्य- वृद्धिका प्रयत्न करना, चमक-दमक शुरू और जब
८६ | भक्तिसुधा
विवाहका समय हो तो क्या पूछना ? दूल्हा नटसे भी अपनेको सुन्दर बनाना चाहता है। देव सदाके लिये विचित्र वेश बनाये रखते हैं। नरका तो विचित्र वेश कादाचित्क है, सदाके वेशमें विचित्रता नहीं। विचित्रताके लिये वेशविशेषकी आगन्तुकता विवक्षित है। इसीलिये यह पाठ लिया गया है कि— 'नटवरवपु:', 'नटश्चासौ वरश्च नटवरः तस्येव वपुर्यस्य सः।' नटका तात्पर्य द्विभुजत्वमें है। व्रजलीलाका सर्वस्व तो द्विभुजत्व ही है, इसलिये 'नटवरवपु:'। यदि भगवान्का विचित्र वेश होता और द्विभुज न बना होता तो वह आनन्द न आता, व्रजवासियोंमें उनके लिये ऐसा ममत्व न होता। व्रजवासी कहते हैं— श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दमें अगर परमेश्वरता व्यक्त हो जाय तो भगवान् फीके हो जायँ। चतुर्भुजमें किसीको प्रीति न होती, वे लोग आश्चर्यमें पड़ते। भावुकोंके माधुर्यभावमें ईश्वरभावकी अभिव्यक्ति नहीं। परमेश्वरसे लोग डरते हैं, उनसे संकोच होता है, यहाँ तो मनमोहन श्यामसुन्दर प्राणेश्वर, हृदयेश्वर अपने हृदयकी वस्तु हैं, परमेश्वर नहीं। अप्राकृतत्व अलौकिकताकी अभिव्यक्ति स्वाभाविकतामें बाधक होती है। जिस भगवान्के भ्रुकुटिभंगपर सब नाचें, अनन्तकोटि-ब्रह्माण्डनायक प्रभुके कोमल मंगलमय दोनों हाथोंको अपने एक हाथमें पकड़ नन्दरानी यशोदा—'सा गृहीत्वा करे कृष्णमुपालभ्य हितैषिणी।' (श्रीमद्भा० १०।८।३३) छड़ी दिखाकर कहती 'लाला मारूँ', अगर परमेश्वर समझती तो यह न होता, जब अपने मुखमें सम्पूर्ण विश्व दिखाकर परमेश्वरता व्यक्त की, तब छड़ी हाथसे गिर भी पड़ी, माधुर्यरस चला गया, अतः 'नटवरवपु:' यानी द्विभुज। इसका अर्थ यह नहीं कि हम चतुर्भुजत्वका खण्डन करते हैं, मगर जैसी जिसकी भावना उसके लिये भगवान् भी वैसे ही हैं। भगवान्द्वारा माधुर्यभावयुक्त विचित्र वेश धारण करना 'नटवरवपु:'—नटके समान और वरके समान वपु धारण किये कहा गया है। नटवरवपु देवताओंका सदा ही विचित्र वेश होता है। रस-विशेषास्वादनके लिये भगवान्के विचित्र वेशमें आगन्तुकता विवक्षित है। वैसे तो भगवान् सदा ही परमानन्दरसामृतमूर्ति हैं, मगर आज इच्छया परम मधुर वेश धारण किये हैं। यही कहा है—'नटवरवपु:'। नरवपु होनेसे ममता, निर्भर अनुराग अत्यन्त निःसंकोच भाव होता है, अन्यथा चतुर्भुजत्वमें ऐश्वर्याभिव्यक्ति होगी, अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायकता, सर्वज्ञता, सर्वशक्तिमत्ता पदे-पदे व्यक्त होगी, जिससे संकोच होनेके कारण भगवान्से प्रेममें स्वाभाविकता न आ सकेगी। प्रेममें स्वाभाविकताका होना ही उसका उत्कर्ष है। ईश्वरमें अनुरागका विधान किया जाता है, भगवान्में भक्तिकी विधि बतलायी जाती है। 'विधिरत्यन्तमप्राप्तौ' अत्यन्त अप्राप्तिमें ही विधि होती है, जैसे—'अग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकामः।' यहाँ अग्निहोत्रमें स्वाभाविक प्रीति नहीं, वैसे ही भगवान्में प्रीति स्वाभाविक नहीं, इसलिये विधि होती है, 'तस्माद् भारत सर्वात्मन् भगवान् हरिरीश्वरः। श्रोतव्यः कीर्तितव्यश्च' इत्यादि, अभय कामनावाला प्राणी भगवान्में भक्ति करे। इस तरह विधि जहाँ है, वहाँ उसकी अप्राप्ति समझी जाती है एवं प्राणिस्वभाव ऐसा है कि जहाँ विधि वहाँ प्रेम कम। जैसा माता-पितामें पुत्रका प्रेम तबतक, जबतक स्त्री नहीं; स्त्रीमें प्रीति, माता-पितामें नहीं; माता-पिताकी प्रीतिमें पुण्य कहा है। 'मातृदेवो भव। पितृदेवो भव' इत्यादि वाक्योंसे विधान किया है। इतना ही नहीं, मातृ-पितृ-प्रीति न रहनेपर हानि भी बतलायी गयी है, तात्पर्य, देवता-प्रीतिसे माता आदिमें प्रीति अधिक सम्भव है। मातृ-पितृ-प्रीतिसे देवता-प्रीति कठिन है, माता-जैसा प्रेम अगर भगवान्में हो तो क्या पूछना है, मगर न होनेसे ही भगवान्में प्रीतिका विधान किया गया। भगवान्की अपेक्षा मातृप्रीति स्वाभाविक है, आगे चलकर मातृप्रीतिसे भी स्त्रीप्रीति स्वाभाविक है। इसीलिये यहाँपर 'मातृदेवो भव' इत्यादिसे मातृप्रीतिका विधान किया गया है।
वेणुगीत ८९ आगे बढ़कर 'स्वदाररति' की विधि बतलायी गयी है, इसलिये कि अपनी स्त्रीपर प्रीतिकी अपेक्षा उच्छृंखल मनोवृत्तिवालोंको कुलटामें, वेश्याओंमें प्रीति अधिक होती है, इसी स्वाभाविकतामें शास्त्रोंने लगाम लगायी। प्राणी स्वभावसे ही कामचार होता है। जो जल बहा जा रहा है, उसे रोकनेके लिये ही बाँध बाँधा जाता है। यही अर्थ श्रुति-सेतुका है। विधान- निषेध यह बन्ध है, वह प्राणीकी उच्छृंखलता, स्वाभाविकताको नियन्त्रित करनेके लिये है, किंतु जैसे बहते जलको रोकनेका प्रयत्न करो, तब वह तोड़ मारता है, वैसे ही स्वाभाविक प्रीतिको रोकनेसे वह अधिकाधिक बढ़ती ही जाती है। संसारमें यह दोष होनेसे सर्वथा हेय है, परंतु जो संसारमें दोष, वही भगवान्में गुण है। अर्थात् भगवान्के सम्बन्धसे गुण भी दोष हो जाते हैं, जो भगवान् अनन्तकोटि- ब्रह्माण्डनायक, सर्वान्तरात्मा, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् निरुपाधिक परप्रेमास्पद हैं, उनमें पुराण, शास्त्र, वेद कहते हैं कि अपनी मनोवृत्तियाँ सांसारिक तुच्छ वस्तुओंसे विमुख होकर भगवान्की ओर प्रवाहित हो उठें, इसीमें पूर्ण कृतकृत्यता है, लेकिन वह बड़ा कठिन है। कुछ बड़े-बड़े योगी अमलात्मा परमहंस मुनीन्द्र, यतीन्द्र, योगी समाधि आदिसे वैसा करनेमें समर्थ होते हैं। मगर यहाँ तो वैसी परिस्थिति नहीं है, यहाँ तो ऐसा हो जाय कि वही सच्चिद्घन पूर्णतम पुरुषोत्तम सर्वान्तरात्मा भगवान् स्वाभाविक परप्रेमास्पद हो जायँ। जैसे किसी कामिनीको प्रियतम श्रेष्ठतम प्राणेश्वरके उत्कट सम्मिलनकी उत्कण्ठा हो, वैसी स्वाभाविकी उत्कट उत्कण्ठा भगवान्में हो जाय। जो कोई रोकनेको उपस्थित हो उसे तोड़ मारे, वह स्थिति यहाँ आयी, श्यामसुन्दर व्रजेन्द्रनन्दन मनमोहन नटवरवपु हैं तो सामान्य जनोंको अलौकिकमें प्रीति नहीं, पर लौकिकमें प्रीति हो तो उससे नरक हो। प्रीतिमात्र तो विवक्षित है नहीं, उससे मतलब नहीं, नहीं तो सारा संसार किसी-न-किसीमें प्रीति होनेके कारण मुक्त हो जाय। नहीं, प्रीति हो अलौकिकमें। भगवान् हैं तो अलौकिक, किंतु बनेंगे नर, 'नटवरवपुः', अति अद्भुत विचित्र वेशधारी, अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायककी अलौकिकता कहीं प्रकट हो जाय तो काम बिगड़ जाय। इसलिये अलौकिकताको छिपाकर लौकिक स्वरूपमें प्रकट होना पड़ता है, जिससे लोगोंकी प्रीतिमें स्वाभाविकता हो। इसीलिये 'बबन्ध प्राकृतं यथा' जैसे प्राकृतको बाँधते हैं, वैसे यशोदा अपने लालाको बाँध लेती है। 'प्राकृतं यथा'—हैं तो अप्राकृत, पर बाँध लेती है प्राकृत-जैसे। कहा ही है— ताहि अहीरकी छोहरियाँ, छछियाभरि छाछपै नाच नचावैं॥ (भजन-संग्रह ७३७) यही अलौकिकमें लौकिकता व्यक्त है, कुन्ती माता कहती हैं— गोप्याददे त्वयि कृतागसि दाम तावद् या ते दशाश्रुकलिलाञ्जनसम्भ्रमाक्षम्। वक्त्रं निनीय भयभावनया स्थितस्य सा मां विमोहयति भीरपि यद्विभेति ॥ (श्रीमद्भा० १।८।३१) हे नाथ! आपकी वह लीला व्यामोह-सिन्धुमें उन्मज्जन-निमज्जन कराती है— तामात्तयष्टिं प्रसमीक्ष्य सत्वर- स्ततोऽवरुह्यापससार भीतवत्। गोप्यन्वधावन्न यमाप योगिनां क्षमं प्रवेष्टुं तपसेरितं मनः॥ (श्रीमद्भा० १०।९।९) नवनीत-भांडोंको फोड़कर उलूखलपर विराजमान श्यामसुन्दर नवनीतको अपने मुखमें छोड़ते, अपने ग्वालबालोंके मुखमें छोड़ते, रामावतारके साथी बन्दरोंके मुखमें देते हैं तथा लौट-लौटकर देखते हैं कि कहीं मैया तो नहीं आती। इतनेमें देखा तो मैया आयी, प्रांगणमें भागते लालाको देखकर अम्बा छड़ी लेकर दौड़ी, अम्बाको देख प्रभु भी भयभीत होकर उलूखलसे कूदकर भागे। यशोदामैया व्रजरानी भी पीछा करने लगी, किसका? 'न यमाप योगिनां क्षमं प्रवेष्टुं तपसेरितं मनः॥' जिसको अमलात्मा परमहंस
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यतीन्द्रोंका निर्मल चित्त पकड़नेमें समर्थ न हुआ, उसी पूर्णतम पुरुषोत्तम अनन्तकोटि-ब्रह्माण्डनायक निखिल- रसामृतमूर्ति प्रभुको नन्दगेहिनी 'लाला आज तो तुझे बता दूँगी' कहकर पकड़ना चाहती है। किसी तरह प्रभु पकड़में आयें। यशोदा कहती— 'लाला तू बड़ा लंगर हो गया है, मैं आज तेरा सब लंगरपन भुला दूँगी।' कुन्ती कहती— नाथ! इतना कहकर जब यशोदामैयाने रज्जु ली, तब तो आपकी विचित्र दशा हुई। आपके नील-कमल-कोशसमान कपोलपर अंजनमिश्रित अश्रुबिन्दु बड़े ही सुशोभित मालूम पड़े, सिर नीचा किया हुआ, आँखें डबडबायी हुईं; अंजनमिश्रित अश्रु कपोलोंपर ऐसे शोभित होते हैं, जैसे नीलकमलके कोशोंपर मोती विराजमान हों। क्या शोभा कही जाय! आप डर रहे हैं। भयभीत होकर अपने मुखारविन्दको नीचा किये रोते हैं, जिनके डरसे डर भी डरे, जो कालकाल महाकालेश्वर महामृत्युंजय— यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च उभे भवत ओदनः । मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः ॥ (कठोपनिषद् १।२।२५) —सकल प्रपंचको मृत्युरूप दाल-शाकके साथ मिलाकर जो खा जाय, वह व्रजगेहिनीकी छड़ीसे डरे। यह सब भाव जब अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायकता प्रकट होती, तब न रहता। एक जगह कहा है— 'मुक्तिं ददाति कर्हिचित्स्म न भक्तियोगम् ॥' (श्रीमद्भा० ५।६।१८) भगवान् भक्तोंको मुक्ति दे देते हैं, भक्ति जल्दी नहीं देते; क्योंकि भगवान्को भक्तिके भावबन्धनमें बँधकर परतन्त्र हो जाना पड़ता है, यहाँ स्वाभाविक प्रेम है। इसी कारण वृन्दारण्यमें ग्वालबालोंको, व्रजांगनाओंको विष्णु-शिव-तत्त्वात्मक परमात्मामें वैसी प्रीति न होती, वैसी उत्कण्ठा न होती, जैसी 'नटवरवपु' भगवान्में। कहीं एक ऐसी कथा सुनी है— भगवान् जब व्रजसे मथुरामें गये, तब गोपांगना विरहिणी होकर विलाप करने लगीं। किसीने कहा— 'मथुरा बहुत दूर थोड़ी है, तुम वहीं जाकर प्रभुसे मिल आओ'। व्रजांगनाओंने ऐसा विलाप किया कि उनके अश्रुसागरमें जग डूब जाय, लोगोंने बहुत कुछ कहा-सुना तो वहाँपर सब गयीं, भगवान्को द्वारपालके खबर देते ही प्रभुने कहा— 'आने दो'। व्रजांगनाएँ भीतर गयीं और श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दका ऐश्वर्य देखा, देखते ही चट सबने घूँघट काढ़ा, कहने लगीं— 'यह तो हमारे मनमोहन नहीं हैं; मुरलीमनोहर काली कमलीवाले नन्दलाल हमारे सर्वस्व हैं।' एक बारकी ऐसी कथा है कि कोई वासन्तिक रासोत्सव था। उसमें श्यामसुन्दर व्रजेन्द्रनन्दन भगवान् रासविलास कर रहे थे, इतनेमें भगवान् एक लताकी आड़में छिप गये, तब गोपांगनाएँ भगवान्को खोजतीं-पूछतीं डोल रही थीं। दैवात् वहाँ पहुँचीं, जहाँ भगवान् छिपे थे। इनको देखते ही प्रभुने चतुर्भुजरूप धारण किया, जब चतुर्भुजभगवान्को देखा तो भक्तिसे उनको केवल प्रणामकर कहा— 'भगवन् ! आप हमारे श्यामसुन्दर व्रजलालसे भेंट करा दो, उनसे हमें मिला दो।' भगवान्ने 'तथास्तु' कहा। वह चतुर्भुजसे बिलकुल न खिचीं, यही बात 'नटवरवपुः' में है। द्विभुज मोहन मुरलीधरमें जो प्रीति है, वह अन्यत्र नहीं। चतुर्भुजत्वादि भगवान्का ऐश्वर्यभाव है। उसका प्रभाव माधुर्यभावके प्राकट्यमें नहीं। इतना ही क्यों, जैसा सूर्यके सामने चन्द्रमाका प्रकाश नहीं, वैसा ही माधुर्यभावके विकासमें, माधुर्यभावके प्राखर्यमें ऐश्वर्यभावका प्रकाश नहीं, श्रीवृषभानुनन्दिनीमें माधुर्यभावका पूर्ण प्रकाश है। अस्तु, यहाँ जैसे कहा जा चुका है कि हो अलौकिक ही, पर प्रीति उसमें लौकिक दृष्टिसे हो, अलौकिकता उसकी छिपी हो, भगवान्ने व्रजमें तो बहुत ही साजात्य प्रकट किया। पहले नरत्वेन, पीछे गोपत्वेन, सगे-सम्बन्धीरूपसे। 'श्रीविष्णुपुराण' में कथा है—जब भगवान्ने गोवर्धनको उठाया, तब वह अद्भुत प्रभाव देखकर सब समझ गये कि यह गोप नहीं, गोपवेशधारी ईश्वर हैं। भगवान् समझे यह हमसे सन्देह करते हैं। बस, प्रभु रोने लगे, गोपालोंने देखा कन्हैया रो रहा है तो सब मनाने लगे कि 'क्यों
रोते हो लाला?' तब प्रभुने कहा 'इसलिये कि तुम हमें अपना नहीं समझते, अजनबी समझते हो।' प्रीतिमें अलौकिकता बिलकुल प्रकट न हो, सन्देह यत्किंचित् न हो। एक समय जब भगवान्ने मिट्टी खायी, तब बलदाऊने अम्बासे आकर कहा कि कन्हैयाने मिट्टी खायी। सुनकर वह चली मारनेको और प्रभुको पकड़कर कहा- 'लाला तूने मिट्टी क्यों खायी?' तो प्रभुने डरकर कहा- 'नाहं भक्षितवानम्ब'- मैया मैंने मिट्टी नहीं खायी। यह ऐश्वर्य दिखलानेके लिये नहीं, किंतु प्राकृत शिशुके समान अम्बासे डरकर। तब अम्बा कहती है- 'सब यही कहते हैं'। प्रभुने कहा- 'सब झूठे हैं', मैया बोली- 'बलराम भी तो कह रहे हैं।' भगवान्ने कहा- 'आज ग्वालबालोंने दाऊको मिला लिया है, इसीलिये वह भी झूठ बोल गये, अगर विश्वास न हो तो मुँह देख ले।' भाव यह कि मुँह दिखानेको तैयार हो जानेसे अम्बा समझ लेगी कि मिट्टी नहीं खायी है, अगर मिट्टी खायी होती तो मुँह दिखानेके लिये तैयार न होता, एक झूठ छिपानेके लिये दुगुनी-तिगुनी झूठ बोलनी पड़ती है, पर अम्बा भी बड़ी जबर। उसने कहा- 'मुँह खोल, देखूँ तो सही' सुनकर भगवान्ने मुँह खोल दिया। खोल क्या दिया, भावुक कहते हैं कि मातृकोपसूर्यरश्मिसे प्रभुमुखकमल खिल गया। जब खिला तो भीतर ब्रह्माण्ड! यह कैसा हुआ? इसका कारण यह कि भगवान्की ऐश्वर्याधिष्ठात्री महामाया प्रभुके पीछे- पीछे सेवाका अवसर ढूँढ़ती हुई घूम रही थी। माया कहती- 'भगवन्! लोग आपको बड़ा तंग करते हैं, यह मुझसे नहीं सहा जाता।' प्रभुने कहा- 'तू चुपचाप रहकर तमाशा देख, कुछ करनेके फेरमें न पड़' तथापि उसे न मानती हुई, जब माँ मुँहमें मिट्टी देखने लगी तो ऐश्वर्याधिष्ठात्री महाशक्तिने सोचा कि अगर माँ मिट्टीको देख लेगी तो मेरे प्रभुको पीटेगी, यह मेरे होते ठीक नहीं। इसीलिये उस ऐश्वर्याधिष्ठात्री शक्तिने मुँहमें ब्रह्माण्ड दिखाया। मैयाके हाथकी छड़ी गिर गयी। भगवान्ने सोचा, मामला बिगड़ रहा है। झट 'व्यतनोद् वैष्णवीं मायाम्', यशोदामैया आँख खोलकर देखते ही समझ गयी कि मेरे लालाको कुछ अलाय-बलाय है, तब उसके निवारणके लिये थूः थूः करने लगी। भगवान् मायाको कहते हैं- 'ले, तूने मुझे बचाया क्या, थू थू करा दिया।' अस्तु, यह सब भाव नटवरवपुमें ही सम्भव है। कहा है- 'मायाश्रितानां नरदारकेण साकं विजहुः कृतपुण्यपुञ्जाः ॥' (श्रीमद्भा० १०।१२।११) इस तरह आगे 'बिभ्रत्' है। क्यों? 'एवं नटवरस्येव वपुः नटवरवपुः तादृशं बिभ्रत्।' पहले कहा गया कि भगवान् रसात्मा हैं तो भी रस अमूर्त होनेके कारण चल-फिर नहीं सकता, परम तत्त्व भी चलता-फिरता नहीं, उद्बुद्ध उभयविध सम्प्रयोग- विप्रयोग शृंगाररसात्मा एक अमूर्त पदार्थ है, रस वस्तु हृदयस्थ है, केवल अमूर्तरस वेणु न बजाता, न चलता, न फिरता, वह तो केवल वृषभानुनन्दिनीके हृदयमें है, इसीसे कहा- 'बिभ्रत्'। अमूर्तरस यहाँ मूर्त बना, इसलिये कि भावुक उसे सर्वेन्द्रिय-ग्राह्यरूपसे ले सकें। अमूर्तरस तो मनोग्राहामात्र है, वेदान्तमें परम वस्तुका आस्वाद मनोग्राहा ही कहा है- 'बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्', (गीता ६।२१) 'स्वयं तदन्तःकरणेन गृह्यते' अतः कहा उसमें सर्वेन्द्रियग्राह्यता नहीं, भावुकोंको तो मनोग्राहातामात्रसे सन्तोष नहीं, किंतु सर्वेन्द्रियोंमें, अन्तरात्मामें, अन्तःकरणमें, प्राणमें, रोम-रोममें उसका अनुभव हो, इन्हीं भावुकोंकी इच्छापूर्तिके लिये 'बिभ्रत्'। अमूर्त उद्बुद्ध उभयविध सम्प्रयोग-विप्रयोगात्मक शृंगाररसमूर्ति श्रीकृष्णचन्द्र- परमानन्दकन्दके रूपमें मूर्त होकर देखा जाय, जैसा रसका ही परिणाम शर्करादि, जैसे रसका ही निर्यास- गोंद, वैसे ही परमानन्दरसका निर्यास भगवान्, गोंद रसका ही घनीभाव होता है- आगे इसकी अभिव्यक्तिमें बड़ी ऊँचाई रखी है। यह मूर्त कैसे बना? अनाघातं भृङ्गैरनपहृतसौगन्ध्यमनिलैः अनुत्पन्नं नीरैस्खनुपहतमूर्मीकणभरैः ।
९० भक्तिसुधा अदृष्टं केनापि क्वचन च चिदानन्दरससो यशोदायाः क्रोडे कुवलयमिवौजस्तदभवत् ॥ 'नटवरवपुः बिभ्रत्'—से कहा गया कि उद्बुद्ध उभयविध सम्प्रयोग-विप्रयोग शृंगाररस स्वयं अमूर्त होनेसे उसका गमनागमन न हो सकता—अतः 'बिभ्रत्'। है तो अमूर्त ही, पर भक्तानुग्रहविशेषात् उसीने नटवरवपु धारण किया, अमूर्तरस मूर्तरूपमें प्रकट हुआ, भक्त कहते हैं, वेदान्तियोंका ब्रह्म केवल मनोग्राह्य, बुद्धिग्राह्य है, सर्वेन्द्रियग्राह्य नहीं, पर वे तो चाहते हैं निखिलरसामृतमूर्ति भगवान्को सर्वेन्द्रियग्राह्य बनाना, सर्व इन्द्रियाँ मन-बुद्धिसे ईर्ष्या करती हैं, उनको पूर्णतम पुरुषोत्तमका आस्वादन करते देख नेत्र, श्रोत्र, सर्व ही लालायित हो जाते हैं और क्या रोम- रोम अपने प्रियतम प्राणधनके संश्लेषके लिये उत्कण्ठित होता है, व्याकुल हो उठता है। भगवान्का सम्मिलन कौन न चाहेंगे? कहते हैं—'पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयंभूस्तस्मात्पराङ्पश्यति नान्तरात्मन्'। (कठ० २।१।१) स्वयम्भूने इन्द्रियोंको बहिर्मुख रचा। 'व्यतृणत्' में तृहु धातु हिंसार्थक है। स्वयम्भूने इन्द्रियोंको बनाया अर्थमें व्यरचयत् कहते हैं, हिंसितवान् क्यों? तो उसने उन्हें बहिर्मुख बनाकर मार डाला, उनको सर्व प्राणियोंके परमप्रेमास्पद भगवान्के रसास्वादसे वंचित किया। 'पिय बियोग सम दुखु जग नाहीं', (रा०च०मा० २।६४।७) 'लोके नहि स विद्येत यो न राममनुव्रतः' लोकमें ऐसा कोई नहीं है, जो प्राणेश्वरका वियोग सहन करे, जो इन्द्रियोंको बहिर्मुख न बनाया होता तो अन्तरात्माका आस्वादन करते। इसलिये स्पष्ट है कि सर्व इन्द्रियाँ भगवत्तत्त्वके अनुभव बिना, भगवद्दर्शन बिना, भगवान्के स्वरूपरसके आस्वादन बिना, भगवान्के मंगलमय श्रीअंगके संस्पर्श बिना, अपनेको अकृतार्थ हतभाग्य समझती हैं, वह अपना हिंसन समझती हैं, जैसे मति ब्रह्माकार होकर रसका आस्वादन करती है, वैसे हम भी करें। यह भाव आगे 'अक्षण्वतां फलमिदं न परं विदामः' (श्रीमद्भा० १०।२१।७) इत्यादिमें और स्पष्ट होगा। वाल्मीकिने लिखा है— यश्च रामं न पश्येत्तु यं च रामो न पश्यति। निन्दितः सर्वलोकेषु स्वात्माप्येनं विगर्हते ॥ (वा०रा० २।१७।१४) जिसने रामको स्नेहभरी दृष्टिसे नहीं देखा और जिसे रामने कृपादृष्टिसे नहीं देखा, वह सर्वलोकमें निन्दित है, उसकी अन्तरात्मा भी उसकी विगर्हा करती है। इसी प्रकार सर्व इन्द्रियोंकी निरर्थकता है कि जिनका भगवान्में उपयोग न हुआ हो, इसीलिये भक्तगण इतनेमें ही सन्तुष्ट नहीं कि वह उद्बुद्ध उभयविध सम्प्रयोग-विप्रयोगात्मक शृंगाररसात्मक शृंगाररसात्मा भगवान् केवल बुद्धिग्राह्य हो, वह तो उसका रोम-रोमसे, सर्वेन्द्रियोंसे संस्पर्श अवगाहन चाहते हैं—अतः उनके मनोवासनानुसार उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररसात्मक तत्त्वने सर्वेन्द्रियग्राह्य होनेके लिये सर्व भावसे समास्वादन करा देनेके लिये नटवरवपु होकर वृन्दारण्यमें प्रवेश किया। 'बिभ्रत्'—'डुभृञ् धारणपोषणयोः'। इसके धारण-पोषण दोनों अर्थ हैं कि उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररसात्मक भगवान् वेणुवादन करते हुए जो वृन्दारण्यमें पधारते हैं, वह कौन? तो श्रीवृषभानुनन्दिनीके हृदयकी वस्तु, भावुकोंके हृदयकी वस्तु, यानी भावुकोंका भाव ही श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके रूपमें प्रकट हुआ, एवं च भगवान् भक्तमनोभावनामय हैं। 'स्वेच्छामयस्य न तु भूतमयस्य', (श्रीमद्भा० १०।१४।२) स्व-स्वीया तेषाम् इच्छा स्वेच्छा, तन्मयः न तु भूतमयः। यह वपु भूतमय, मायामय, प्रकृतिमय नहीं, किंतु भावुकोंके प्रीतिमय, इच्छामय है, उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररसात्मक स्वरूप कहा था तो श्रीवृषभानुनन्दिनीके अन्तःकरणमें, श्रीव्रजांगनाओंके अन्तःकरणमें। नायकविषयक शृंगार नायिकाके ही अन्तःकरणमें (हृदयमें) उद्बुद्ध होता है। यह अमूर्त रस श्रीवृषभानुनन्दिनीके हृदयकी वस्तु मूर्त होकर श्रीवृन्दारण्यधाममें कैसे? तो सर्वेन्द्रियग्राह्य होनेके
लिये। उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररसात्मा यदि हृदयस्थ वस्तु फिर सर्वेन्द्रिय ग्राह्य नहीं, पर वही हृदयस्थ वस्तु वृन्दारण्यधामस्थ हुई। हृदयस्थ ही पहले कैसे ? तो शुरूसे ही उसका धारण-पोषण श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दने ही किया, 'आशां भृतां त्वयि चिरादरविन्दनेत्र॥' (श्रीमद्भा० १०।२९।३३) व्रजांगना कहती है—'हे श्यामसुन्दर व्रजेन्द्रनन्दन, आपके सम्मिलनकी आशाको शुरूसे ही धारण किया, पोषण किया, उस आशा-कल्पलताका बीज व्रजांगनाओंके स्निग्ध हृदय-क्षेत्रमें आरोपण किया, रूखड़ पथरीले बालुकामय क्षेत्रमें यह आशा कल्पलता अंकुरित न होगी, अर्थात् भगवत्सम्मिलनकी आशा- कल्पलता हृदयमें बोयी जाय, वह अंकुरित हो, पुष्पित-फलित हो।' प्रत्याशित वस्तुका सम्मिलन ही उसकी सफलता—यह भगवत्कृपासे भावुक हृदयमें प्रकट होती है। व्रजांगनाओंके हृदयमें भगवत्सम्मिलनकी आशाको भी उन्होंने ही बोया, पोषण किया, यहाँ वह पुष्पित हो गयी, उसी फूलकी सुगन्धि वेणुगीतद्वारा निकलेगी। भाव यह कि श्यामसुन्दर व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णचन्द्रने ही श्रीवृषभानुनन्दिनीके, श्रीव्रजांगनाओंके हृदयमें स्वसम्मिलनकी उत्कण्ठाको, आशाको बोया और वही शृंगाररसका स्वरूप है। जब कभी वह आशाकल्पलतांकुर मुरझाने लगता है तो व्रजांगना अपने अश्रुबिन्दुसे उसे सींचना चाहती हैं, जबकि श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके वियोगानलरूप वाडवाग्निसे वह दग्ध होने लगता है, तब वही श्रीकृष्णचरणारविन्द-परागरूप कज्जलको आँखोंमें लगाती हैं, श्रीकृष्णपादपंकजपरागसे यह अग्नि प्रशान्त होती है। इस शृंगाररसका धारण-पोषण श्रीकृष्णचन्द्रने ही किया, यहाँपर भी हृदयस्थ उद्बुद्ध उभयविध सम्प्रयोग-विप्रयोगात्मक शृंगाररसको मूर्त होनेके लिये धारण और पोषण किया। भगवान्द्वारा मयूरपिच्छ-धारण अब भूषणका वर्णन—बर्हापीड— बर्हमय आपीड, वैजयन्ती, कर्णिकार, पीताम्बर यह सब भूषण है, स्वरूप केवल 'नटवरवपु' यदि नटवत् वरवत् वपुका ऊपरवाला अर्थ करें तो शोभा और भूषण आ जाता है, नट ही विचित्र वेश-वसनसे अपनेको सजाता है अर्थात् वैसा अर्थ लेनेसे वैसे वपुका बोधन है, किंतु इसके अलावा नटपदसे वरपदसे विप्रयोग-सम्प्रयोगात्मक शृंगार कहा गया तो भगवान्का उद्बुद्ध उभयविध शृंगारात्मक रसस्वरूप आता है। भगवान्के तीन शृंगार हैं, 'भूषिता अप्यभूषणम्।' श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द गोपाल बलरामके साथ जब भवनसे निकलते तो उसके पहले ही माता उबटन लगाकर अभ्यंग करनेके बाद नानाविध विचित्र दिव्य अलंकारोंसे भूषित करके गोचारणके लिये वृन्दारण्यमें भेजती, फिर वनमें आते तो ग्वालबाल वनकी सामग्रियोंसे भूषित, कर्णिकारसे आभूषित करते, गुंजाकी परमसुन्दर माला पहनाते, उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररसका निर्यासरूप आनन्द-सुधासिन्धुका मन्थनकर यह अद्भुत सारतम तत्त्व विनिःसृत हुआ, इस प्रकार पूर्णानुराग-रससारसिन्धुसे प्रभुके सर्वांगका निर्माण हुआ, स्वरूपके प्रादुर्भाव होनेपर उबटन, अभ्यंग, अनुलेपन, स्नान वगैरह हुए। पहले उद्वर्तन हुआ। 'आनन्दवृन्दावनचम्पू' में लिखा है कि 'उद्वर्त्तितमिव सौरभ्येण' अन्योंको, सौरभ्यके लिये उबटन, यहाँ भगवान्के स्वरूपको तो सौरभ्यसे ही उबटन, अनन्तकोटिब्रह्माण्डान्तर्गत जो सौरभसारसर्वस्व वही आपके लिये उबटन 'अभ्यक्तमिव स्नेहेन' अन्यत्र लोगोंमें स्नानसे मधुरिमा व्यक्त की जाती है, यहाँ तो भगवद्विषयक भावुकोंके स्नेहसे भगवान्के श्रीअंगका अभ्यंग हुआ। अनन्तब्रह्माण्डगत माधुर्य-बिन्दुके उद्गमस्थान माधुर्यसिन्धुके सारसे आपको स्नान कराया गया, श्रीकृष्णचन्द्रकी मंगलमयी मूर्तिका स्नान माधुर्यामृतसारसर्वस्वसे, 'मार्जितमिव लावण्येन' मुक्ताफल मध्यकी चमकको लावण्य कहते हैं, उस लावण्यसारसर्वस्वसे ही मार्जन। अब अनुलेपन 'अनुलिप्तमिव सौन्दर्येण' अन्यत्र अनुलेपनसे सौन्दर्य, यहाँ सौन्दर्यसारसर्वस्व ही अनुलेपन। 'भूषितमिव त्रैलोक्यलक्ष्म्या' अनन्तकोटिब्रह्माण्डान्तर्गत लक्ष्मीसे
ही आप भूषित हैं, यह स्वाभाविक शृंगार है। नन्दरानीसे किया हुआ शृंगार, उसके बाद ग्वालबालों द्वारा वनमें किया हुआ शृंगार वही 'बर्हापीडम्'। 'बिभ्रत्'—बर्हमय आपीडको धारण किये हुए, आपीड शिरोभूषण मयूरपिच्छसे निर्मित अद्भुत मुकुटको धारण किये हुए। नाचते हुए मयूरसे ही जो मयूरपिच्छ निःसृत होता है, उसे बर्ह कहते हैं, उसीसे यह बना, मयूरको जब आनन्दोल्लास होता है, तब वह नृत्य करता है। घनगर्जनसे मेघश्यामकी अद्भुत घटाका निरीक्षण करते मन्द-मन्द गर्जनसे रसोल्लास रसोद्बोधनके साथ जब वह नृत्य करता है, तभी वह पिच्छ गिरता है, उसको धारणकर उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररसको और उद्बोधित किया, यह उद्दीपन कोटिमें आ गया, उसको अपने भूषणमें धारणकर भगवान्ने रसोल्लास व्यक्त किया, यहाँ जितनी- जितनी उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररसात्मामें रसकी अभिव्यक्ति होगी, उतनी ही भावुकोंमें रसोल्लास होगा। जब भक्त यह जानते हैं कि भगवान् मिलनेके लिये उत्कण्ठित हैं, तब तो उनकी उत्कण्ठाका पारावार नहीं रह जाता, इसीको और बढ़ानेके लिये भगवान्ने पिच्छ धारण किया। 'राधाप्रियमयूरस्य पत्रं राधेक्षणप्रभम्।' जिस मयूरके चन्द्रकको भगवान्ने आभूषण बनाया, वह श्रीवृषभानुनन्दिनीके निकुंजका है, श्रीकृष्ण परमानन्दकन्दके श्रीअंगके समान उस मयूरके कण्ठकी श्यामलत्ता थी, इसीलिये श्रीकृष्णचन्द्रका स्मारक होनेके कारण श्रीवृषभानुनन्दिनी उस मयूरको अपने पास रखती हैं और उसीका पिच्छ भगवान् धारण करते हैं। इस पिच्छका चन्द्रक श्रीवृषभानुनन्दिनीके नयनके समान है, इसलिये भगवान्ने वह भूषण शिरोधार्य किया, भक्तकी सम्बन्धित वस्तुको भगवान् अपना शिरोभूषण बनाते हैं अथवा यह कि श्रीराधाके शीर्षजूट जूड़ाके सदृश यह पिच्छ, अतः राधाके अलंकार जूटके सदृश होनेके कारण भगवान्ने इसे अपना भूषण बनाया। साथ ही अगले प्रसंगमें तीन भाव दिखाये हैं, अत्यन्त, सरस नूतन अरुणवर्णका आम्रपल्लव होनेसे उसको भी प्रभुने अपने भूषणमें धारण किया, उसकी अरुणिमासे राग दिखाया, यह उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररसात्मक स्वरूप अंगी है और सब अंग हैं तो उससे इस स्वरूपमें रजःकृत एक रागजन्य विक्षेप सूचित किया और पिच्छकी जो श्यामलत्ता है, उससे लिलक्षयिषित तमसे गाढ़ आसक्ति दिखायी, सरस अरुण पल्लवसे राग दिखाया। रसमें यह सब राग हो रहा है, वैसे तो रागमें रस है, यहाँ तो उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररसात्मा श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दमें राग, आसक्ति व्यसन हो रहा है, तात्पर्य यह कि भक्त रसस्वरूप श्रीभगवान्में राग आसक्ति व्यसन प्राप्त करना चाहते हैं अर्थात् जहाँ उस तरहका राग-आसक्ति व्यसन भक्त करता है, वैसे ही आगे श्रीभगवान् भक्तमें राग-आसक्ति व्यसन करते हैं, जैसे श्रीवृषभानुनन्दिनीका, व्रजांगनाओंका श्रीकृष्ण- परमानन्दकन्द मनमोहन श्यामसुन्दरमें राग-आसक्ति व्यसन, वैसे ही श्रीभगवान्का श्रीवृषभानुनन्दिनीमें, व्रजांगनाओंमें राग-आसक्ति व्यसन। पहले भक्तका भगवान्में, फिर भगवान्का भक्तमें, जैसे बताया वृषभानुनन्दिनीके हृदयकी वस्तु श्रीकृष्णचन्द्र, वैसे ही श्रीश्यामसुन्दरके हृदयकी वस्तु वृषभानुनन्दिनी। कहा जा चुका है कि यह लौकिकवत् प्राकृतवत् व्यक्त हो, मगर है वह अलौकिक। रस-रसालम्बन-रसाश्रय तीन-तीन जातिके होते हैं, यहाँ एक ही है। परमरसामृतसिन्धुके ये तीन विकास हैं। श्रीकृष्णचन्द्र और वृषभानुनन्दिनी परस्परके हृदय हैं, जैसे श्रीकृष्णचन्द्रके स्वरूपसे श्रीवृषभानुनन्दिनीका हृदयगत उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररस मूर्त हुआ, वैसे श्रीवृषभानुनन्दिनीके स्वरूपसे श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्द- कन्दका हृदयगत उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररस मूर्त हुआ, अतः दोनों उभयात्मक हैं, इस दृष्टिसे दोनों ओर इस स्वरूपमें रसाभिव्यक्ति हुई, जैसे वीर रसमें वीर रसका, करुण रसमें करुण रसका संचार, वैसे उभयविध शृंगाररसात्मामें रसाभिव्यक्ति, यही कहा— 'बर्हापीडं नटवरवपुः।'
वेणुगीत ९३ भगवान्द्वारा कानोंमें कर्णिकार-धारण अब 'बिभ्रत्' बर्हापीडसे अलग, 'कर्णयोः कर्णिकारं बिभ्रत्' कानोंमें कनेलके फूलोंको धारण किये। 'कर्णयोः' द्विवचन, 'कर्णिकारम्' एकवचन, अतः उसमें भी द्वित्वकी कल्पना कोई करते हैं, अथवा कभी वाममें, कभी दक्षिणमें। एतावता रसवैदग्धी विशेष कहा। इसमें भावुक कहते हैं—भगवान्के दो कर्ण रसके उद्भावक हैं, कानोंमें रसानुभावक रसोद्बोधक पुष्प धारण करनेसे रसको उद्वेलित किया। किंवा द्विविध शृंगारके अनुभावक दोनों कर्ण। संप्रयोग कालमें हास-रास-विलासमिश्रित वचनोंसे उस रसकी पुष्टि विप्रयोगकालमें भी वेणूदूतद्वारा जब भक्तोंको भगवान् आहूत करते हैं, तब श्रोत्रोंका ही काम है, अथवा एकान्तमें भक्त जब भगवान्का चिन्तन करते हैं—'तच्चिन्तनं तत्कथनम्' उससे भावनापरिपाककी महिमासे इन श्रोत्रोंद्वारा ही दूरस्थ व्रजांगनाओंके आर्तिविलाप भगवान्को अनुभूत होते हैं, एवं च इसमें मुख्य जो कान उनको भूषित किया अर्थात् कभी सम्प्रयोग शृंगारका पोषण, कभी विप्रयोग शृंगारका पोषण भगवान्ने किया और लोग कहते हैं कर्णिकार अर्थात् कनेल नहीं, पीतवर्णका उत्पलाकार पुष्प, उसका स्वभाव है सूर्याभिमुख रहना, जिधर सूर्य जाय, उधर ही वह जाय, कर्णिकार पुष्पके इस स्वभावको जानकर उसको आपने धारण किया। भगवान् सूचित करते हैं कि हमारे प्रेमी जिधर मुँह करते हैं, वैसे मैं भी उन्हें अभिमुख होता हूँ, एतावता जिधर भक्तगण उधर ही उभयविध शृंगाररस उन्मुख, इसीलिये उनको धारणकर यही दिखलाया। पीताम्बरधारणका रहस्य 'बिभ्रद् वासः कनककपिशम्'—भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द कनकवर्ण पीताम्बर धारण किये हुए पधारे। यह इसलिये कि रस आवृत रहे। उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररस ही श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द हैं, वह रस अगर निरावरण हो जाय तो रसाभास हो जायगा, निरावरणरस रसाभास कहा जाता है, इसलिये उसे आवृत रखना चाहिये। यह रस उच्छलित रस है, उद्बोधित रस है, शृंगाररसस्वरूप श्रीकृष्णचन्द्र भगवान्ने मयूरपिच्छमय मुकुटको धारणकर सूचित किया, रसोल्लासमें ही मयूरका चन्द्रक गिरता है, इसीलिये उसका धारण रसोल्लासका लक्षण है, ऐसा उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररस यदि आवृत न हो तो रसाभास हो जाय, अतः 'कनककपिशं वासो बिभ्रत्' रस आवृत रहनेसे ही रस है, वैसे भी उत्कण्ठाविशेष बढ़ानेके लिये रस आवृत ही रहना चाहिये। श्रीवृन्दारण्यधाममें श्रीबिहारीजीके मन्दिरमें बार-बार, क्षण-क्षणपर परदा होता है; क्योंकि ऐसेमें ही उत्कण्ठा बनी रहती है, निरावरण निर्विघ्न रसमें उत्कण्ठाकी कमी होती है, वास्तवमें रस तो आस्वादनसे घटता नहीं, फिर भी लौकिक रीतिसे अलौकिक रसका आस्वादन प्रभु दे रहे हैं। अति सुन्दरी परम रमणीया नायिका भी मुखचन्द्रपर घूँघट रखती है, अतः उद्बुद्ध उभयविध शृंगारात्मा भगवान्ने कनककपिश पीताम्बरसे अपनेको आवृत किया। अर्थात् भक्तोंको श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके मिलनेमें जो रुकावट— आवरण है, वह माया है, माया ही निरावरणरूपसे प्रभुको देखने नहीं देती। वैसे ही गोपांगनाओंको निरावरण उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररसात्मा श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके दर्शनमें बाधक पीताम्बर है। श्रीवल्लभाचार्य भी पीताम्बरको माया ही मानते हैं। भगवान् भी कहते हैं—'नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः।' (गीता ७। २५) इसीलिये सबको भगवत्तत्त्वका अनुभव नहीं होता, अगर हो तो वह केवल भगवत्कृपासे ही। केवल पीताम्बर वस्त्र नहीं, अपितु तप्तकांचनके सदृश सुवर्णवर्णाम्बर क्यों? सुवर्ण मोहक है, बड़े-बड़े ईमानदारोंका ईमान डुबानेवाला सुवर्ण ही होता है। अतः सुवर्णवर्ण पीताम्बर व्यामोहक कनकतुल्या माया। जो इस कनकके व्यामोहको उल्लंघन करे, वही उस आवरणसे आवृत ब्रह्मको देख सकता है। यदि कनकके आवरणमें फँसा तो रसात्मा ब्रह्मको क्या देखेगा!
९४ भक्तिसुधा वेधा द्वेधा भ्रमं चक्रे कान्तासु कनकेषु च। तासु तेष्वप्यनासक्तः साक्षाद् भर्गो नराकृतिः ॥ ऐसे आवरणसे अपने श्रीअंगको आवृतकर भगवान् श्रीवृन्दारण्यधाममें पधारे। अर्थात् जो भगवान्को देखना चाहते हैं, उनके सामने प्रथम मायाकी चमक- दमक आती है, अगर उसे उल्लंघन किया तो ठीक, केवल कनकके समान ही नहीं, अपितु अग्नितप्त सुवर्णसदृश देदीप्यमान चमकीले पीतवर्णवाले पीताम्बरसे अपने श्रीअंगको आवृत किया। पीताम्बरकी चमक कई तरहकी होती है, कोई कहते हैं सुवर्णवर्ण, कोई दिव्य-दीप्तिमान् विद्युत्के सदृश, कोई कदम्ब-किंजल्क- सदृश, कोई रविकरसदृश, यहाँ तो बिजलीसे भी शतगुणित सहस्रगुणित देदीप्यमान पीताम्बर है, वह प्रभुके श्रीअंगको विलक्षण शोभा देता है, जैसे इन्द्रनीलमणिके पर्वतपर दामिनी दमके, वैसे श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके महेन्द्र-नीलमणिको लज्जित करनेवाले स्वरूपपर पीताम्बर दामिनीके समान दमक रहा है। अद्भुत शोभा दे रहा है, किंवा जिस रीतिसे सजल नीलाम्बुदपर—मेघश्यामपर दामिनी दमकती है, वैसे प्रभुके श्रीअंगपर पीताम्बर देदीप्यमान होता है, उसमें भी यह सजल नीलजलद जल देनेवाला है, श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द तो आनन्दरस—अनुरागरसवर्षी हैं, प्रेमानन्दमयरसवर्षी हैं, यह कोई अद्भुत सुधामय जलद है, अतएव अद्भुत दामिनीके दमकको लज्जित करनेवाले पीताम्बरसे आवृत है, श्यामल जलद जलमय ही होता है, यहाँ भी श्रीकृष्णचन्द्र उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररसस्वरूप ही हैं, शृंगाररसके अधिष्ठात्री देवता विष्णु श्याम और शृंगाररस स्वरूपवर्णनमें उस रसका वर्ण भी श्याम ही कहा है एवं प्रकारसे पीताम्बर प्रभुके श्रीअंगपर अद्भुत छवि दे रहा है। भावुक कहते हैं यह माया है, पर यह प्राकृत माया नहीं, अपितु यह एवंगुणविशिष्ट पीताम्बर श्रीवृषभानुनन्दिनी ही हैं, किं बहुना—श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके श्रीअंगपर यावान् भूषण हैं, सब श्रीवृषभानुनन्दिनी ही हैं, इसी प्रकार श्रीवृषभानुनन्दिनीके श्रीअंगपर जो भूषण हैं, वह सब श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द ही हैं। श्रवसोः कुवलयमक्ष्णोरञ्जनमुरसो महेन्द्रमणिदाम । वृन्दावनतरुणीनां मण्डनमखिलं हरिर्जयति ॥ वृषभानुनन्दिनीके तथा व्रजांगनाओंके कानोंमें जो कमलके फूल हैं, वे रात्रिविकासी स्थलोद्भव कमलविशेष कुवलय होते हैं, वह श्रीकृष्ण अर्थात् उनके श्रोत्रभूषण भगवान् श्रीकृष्ण। वे अपनी आँखोंमें जो अंजन लगाती हैं, वह क्या प्राकृत अंजन है? नहीं! वह श्यामसुन्दर व्रजेन्द्रनन्दन ही अंजन होकर उनके नयनोंमें विराजमान हैं, काष्ठपाषाणमय भूषण उनके नहीं। ईदृशा पुरुषभूषणेन या भूषयन्ति हृदयं न सुभ्रुवः । धिक् तदीयकुलशीलयौवनं धिक् तदीयगुणरूपसम्पदः ॥ ऐसे पुरुषभूषणसे जो सुभ्रू अपने हृदयको नहीं भूषित करती; उनके कुल, शील, यौवन और गुणरूप सम्पत्तिको धिक्कार है। श्यामसुन्दर पुरुषभूषण, पूर्णतम पुरुषोत्तम श्रीकृष्णचन्द्रसे जिन्होंने अपनेको भूषित नहीं किया, वह अपनेको कंकड़-पत्थरोंसे भूषित करे। श्रीकृष्णचन्द्रके पादपंकजपरागको ही अंजन- रूपसे लगाती हैं, उनके हृदयमें महेन्द्रनीलमणिकी माला भी श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्द ही हैं, संसारकी अन्य युवती भले ही कंकड़-पत्थरोंसे अपनेको भूषित करें, पर वृन्दावनतरुणियोंका मण्डन तो एक श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द ही हैं। वैसे श्रीकृष्ण परमानन्दकन्द मनमोहन मदनमोहन श्यामसुन्दर भगवान् उनके हृदयमें हैं ही, पर बाहर भी वही, हृदयके बाहर-भीतर एक ही हो। श्रीव्रजांगनाओंके, श्रीवृषभानुनन्दिनीके अन्तरात्मा, अन्तःकरण, प्राण, इन्द्रियाँ, रोम-रोम सबमें, उपरिष्टात् अधस्तात् सर्वतः श्रीकृष्ण-ही- श्रीकृष्ण। श्रीवृषभानुनन्दिनीके श्रीअंगपर जो नील साड़ी, नील अद्भुत दिव्य निचोल, इन्द्रनील चूड़ी, हृदय विलिंपित मृगमद कस्तूरिका सब भगवान्-ही- भगवान्। सबका वर्णन कहाँतक किया जाय, अतः संक्षेपमें बताया कि 'मण्डनमखिलं हरिर्जयति', 'ये
यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।' (गीता ४।११) ऐसे प्रभुके सिद्धान्त ही हैं। पूर्णतम पुरुषोत्तम श्यामसुन्दरको भी वृषभानुनन्दिनीके अतिरिक्त भूषण ही नहीं, जिन्हें भगवान् अपना भूषण बनायें। श्रीव्रजांगनाओंके तथा श्रीवृषभानुनन्दिनीके भूषण भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द तो भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके भी सब आभूषण श्रीवृषभानुनन्दिनी श्रीव्रजांगना ही हैं, श्रीप्रभुका अन्तरंगस्वरूप श्रीवृषभानु- नन्दिनी तथा श्रीवृषभानुनन्दिनीके अन्तरंगस्वरूप श्रीभगवान्। तभी कहा—'उभयोर्भयभावात्मा' जैसे भक्तमनोभावनामय भगवान्, वैसे भगवन्मनोभावनामय भक्त। भक्तके हृदय भगवान्, भगवान्के हृदय भक्त, इसी दृष्टिसे पीताम्बरसे आवृत हैं। जैसे अद्भुत अनन्त परमानन्द सुधा-सिन्धुमें मधुरिमा होती है, उसी रीतिसे श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द निखिलरसामृतसिन्धुमें माधुर्याधिष्ठात्री श्रीवृषभानुनन्दिनी और उनकी अंशभूता श्रीव्रजांगना। श्रीकृष्ण परमानन्दकन्द एक तरुणतमाल हैं, श्रीवृषभानुनन्दिनी सुवर्णलता हैं, जैसे सुवर्णवर्णा लतासे परिवेष्टित तरुणतमाल सुशोभित हो, वैसे श्रीवृषभानुनन्दिनीसे परमानन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्र। दोनोंका अद्भुत अविघटित सुस्थिर सम्बन्ध है। भगवान्के श्रीकण्ठमें वैजयन्ती- मालाकी शोभा भगवान्के श्रीकण्ठमें वैजयन्ती। 'वै निश्चयेन जयन्ती जयशालिनी', मानो कन्दर्पने जिस धनुषसे निखिल विश्वको विजय किया और उसने उसे छोड़ दिया, वही है यह वैजयन्ती माला। श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके नखमणिमय चन्द्रिकाके दर्शनसे कन्दर्प मूर्च्छित हुआ, अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायक कन्दर्प- दर्पदलनपटु भगवान्के गलेकी यह पंचवर्णपुष्पग्रथित अम्लान पुष्पमाला अद्भुत सौगन्ध्यसे युक्त है। श्रीभगवान्के पास तीन शक्तियाँ हैं—उद्बोधक, आच्छादक, विक्षेपक। कानोंके कर्णिकार उद्बोधक, पीताम्बर आच्छादक है, ब्रह्मस्वरूपोपलब्धिमें वह विघ्न है, परंतु रसज्ञोंके लिये रस भी है और ततोऽप्यधिक विक्षेपक वैजयन्ती, व्रजांगना उद्विग्न हो जाती है। वह समझती है, हमारे श्यामसुन्दरके ये सब आवरण हैं, क्योंकि रसास्वादनपरायण रसिक निर्विघ्न निरुपद्रव निरावरण रसास्वादन चाहता है, क्या उनको पीताम्बरका व्यवधान, वैजयन्तीका व्यवधान सह्य होगा ? जहाँ हार-कंचुकका भी व्यवधान असह्य वहाँ पीताम्बरका, वैजयन्तीका व्यवधान कैसे सह्य होगा ? ऐसा है श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दका अद्भुत दिव्य स्वरूप। इन सबसे दुर्लभता सूचित है, दुर्लभतामें ही रस है। चकारात् वनमाला भी, श्रीकण्ठसे मधुर मनोहर पादारविन्दतक। इन सबसे श्रीअंग आवृत हैं, जैसे ज्योतिर्मय जलदावृत नभोमण्डल आच्छादित हो जाता, वैसे श्यामल, महोमय, आनन्दरसमय वपु अनेक आवरणोंसे आवृत हो अस्पष्ट ज्योति हो गया, उस पीताम्बरके माध्यमसे श्रीअंगकी देदीप्यमान श्यामलता चमकती है। जैसे विद्युत्से आवृत होनेपर भी इन्द्रनीलमणि पर्वतकी श्यामलता चमकती है, वैसे ही 'सो जानइ सपनेहुँ जेहिं देखा।।' (रा०च०मा० १।१९९।१२) जिनको स्वप्नमें भी एक बिन्दुमात्र भी आस्वादन करनेको मिला, वे ही जान सकते हैं। आपके सर्व अलंकारोंकी झलक जिसके मनमें आयी, वह सदाके लिये बिक गया। श्यामलता कैसी ? 'कृष्णवर्णं त्विषाकृष्णम्' (श्रीमद्भा० ११।५।३२) श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्द-कन्दका वपु है तो अतसीपुष्प- सदृश, नीलाम्बुज, नील नीरधरके समान तब भी वह 'त्विषाकृष्णम्' एक अद्भुत दीप्तिमें छिपा है। अतएव श्यामल महोमय कहा जाता है। तेज दो प्रकारके एक श्याम तेज, एक गौर तेज, श्याम तेज भगवान् श्रीकृष्ण
९६ भक्तिसुधा है, भावुकका मन मधुकरके समान है, मधुकर जैसे अनेक पुष्पोंसे मधु लेता है, उसी तरह भावुक भगवान्की मूर्ति इन तत्त्वोंको लेकर बनाता है। भगवान्की भूषणमयी शोभा भगवान्के अद्भुत अलंकारसहित मूर्तिका वर्णन क्या किया जाय, कोटि सूर्योंके समान दिव्य रत्नोंसे जड़ित अद्भुत मोरपिच्छयुक्त मुकुट, देदीप्यमान कुण्डलोंकी झलक, सुगन्धित पुष्पोंकी माला, श्यामल कपोलपर सुन्दर कुण्डल। कपोलोंपर लटकती हुई श्यामल स्निग्ध सचिक्कण अद्भुत अलकावलीकी शोभा तो अवर्णनीय है, जैसे श्यामल नागोंके शिशु अमृतमय चन्द्रमाका रस लेनेके लिये गये हों, किंवा जैसे नीलकमलकोशपर भ्रमरवृन्द आकर रसास्वादनके लिये निश्चल निस्तब्ध विराजमान हों, अथवा सुन्दर टेढ़े-टेढ़े घुँघुराले अलकोंकी वह अलकावली ! स्निग्ध सचिक्कण श्यामल अमृतमय नीलाम्बुजपर पराग- लोभसे बैठे मानो भ्रमरवृन्द ही हैं। फिर गुंजारव क्यों नहीं ? कारण यह कि वह अद्भुत मादक मकरन्दपानकर उन्मत्त होकर चंचलतारहित होकर स्तब्ध हो गये, ऐसा मुखचन्द्र ! अग्र हाथीके बच्चेके शुण्डसदृश गोल सुडौल सुचिक्कण दीप्तिमय योग्य चढ़ाव-उतारके श्रीभुज हैं, दिव्य कुंकुम-मिश्रित हरिचन्दनसे विलिंपित भुजा है। भगवान्के श्रीअंगपर कुंकुममिश्रित हरिचन्दन इस तरह सुशोभित होते हैं, जैसे चन्द्रमाकी चन्द्रिकासे व्याप्त इन्द्रनीलमणि। अंगद-कंकणादि, हस्तांगुलिदलोंमें मुद्रिका, नखोंमें अरुणिमा ऐसे श्रीहस्तोंसे वेणुको उठाकर अधरपर रखकर अधरसुधापूरित कर रहे हैं। वेणुवादन रन्ध्रान् वेणोरधरसुधया पूरयन्— वेणुके छिद्रोंको अधरसुधासे पूरित करते हुए भगवान् वृन्दावनधाममें पधारे, मानो श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दकी रुचि है वेणुच्छिद्रोंको अधरसुधासे पूरित करनेकी। नटनागर नटवरवपु श्रीकृष्णकी रुचि भी नटखट, इसलिये कि लोग हमारे वेणुमें दूषण बतलाते हैं। छिद्रोंको दूषण कहते ही हैं—'छिद्रेष्वनर्था बहुलीभवन्ति' एक छिद्र कहीं हो तो अनर्थ होता है, यहाँ तो सात छिद्र हैं। इस सप्तछिद्रयुक्त वेणुको लोग निन्दित, कलंकित समझेंगे, इसलिये हम उसे अपनी सुमधुर अधरसुधासे पूरित कर दें। यानी परमानन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्रके श्रीहस्तारविन्दमें रहनेवाले, उनके अधरपर विराजमान वेणु सच्छिद्र रहे, यह ठीक नहीं, ऐसी भगवान्की रुचि है, इसीलिये 'रन्ध्रान् वेणोरधरसुधया पूरयन्' (श्रीमद्भा० १०।२१।५)—अधर-सुधाने सोचा अरे जड़ वेणु ! मैं अपने अद्भुत प्रभावसे तुझे सप्राण बना दूँ! बस, इस अभिप्रायसे सुमधुर अधरसुधाने वेणुको सप्राण बनाना चाहा और वह अधर-सुधाके संस्पर्शसे सप्राण होकर सुमधुर गीतका विस्तार करने लगी। अब अधरसुधाने सोचा कि वेणु तो जड़-की-जड़ ही रह गयी। अधरसुधाके परंप्रवीण सम्बन्धसे वृक्षोंसे मधुधारा बहने लगी, सरोवरसरसी, कमल-कमलिनी, कुमुद-कुमुदिनी रोमांचित हो गये, यमुना रुकी, पाषाण द्रवरूप हो गया, मगर वेणु सूखी-की-सूखी ही रही। वेणु सच्छिद्र है, पोली है, रसशून्य है, हृदयशून्य है, इसीलिये इसपर अधरसुधारसका प्रभाव न पड़ा। इसका प्रभाव सहृदयपर ही पड़ता है, अहृदयपर नहीं। कहते हैं—मलयाचलपर चन्दन वृक्षके सम्पर्कसे सम्पूर्ण वृक्ष चन्दन हो जाते हैं, मगर बाँस, बाँस ही रह जाता है। औरोंमें हृदय है, और सब पोले, हृदयशून्य सच्छिद्र नहीं हैं, बाँस हृदयशून्य निःसार है। कहते हैं—ग्रन्थि रहना अच्छा नहीं। एक चिज्जड़ ग्रन्थि न जाने कबकी है। यह ग्रन्थि मिटना कठिन है। कहते हैं—अमुक बड़े गठीले चित्तके हैं। बाँसमें तो गाँठ-ही-गाँठ है। एक छिद्र हो तो सहस्रों अनर्थ उत्पन्न होते हैं, यहाँ तो सात छिद्र हैं, अतः उसपर प्रभाव नहीं पड़ता। इसलिये अधरसुधाने यह सोचकर, वेणुछिद्रोंमें रस भरकर उसे सप्राण किया था, पर उस वेणुको छोड़कर वह व्रजांगनाओंके निरावरण कर्ण कुहरोंद्वारा वेणुगीतरूपमें उनके हृदयोंमें पहुँचा। यहीं उसने अपना सब विक्रम, सब माधुर्य व्यक्त किया। यहाँपर चक्रवर्तीने ऊपरके कुछ थोड़े
भाव कहे हैं। अथवा 'अधरा नीचीना (तुच्छा, अपकृष्टा) सुधा अपि यस्याः सकाशात् सा अधरसुधा,' श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दकी अधरसुधामें ऐसी मधुरिमा है, जिससे सुधा भी अति तुच्छ मालूम हो। अर्थात् देवताओंके, चन्द्रमाके और धन्वन्तरिके अमृतको अपकृष्ट बनानेवाली, यह जो अधरसुधा है, उससे भगवान् वंशीको पूरित करने लगे। वंशीमें सुमधुर अधरसुधा प्रविष्ट होती है, वह भी स्वयं अमूर्त है। छिद्रमें आकाश भरा है। अमूर्त पदार्थसे आकाश निश्छिद्र नहीं होता। अतः अमूर्त रससे वंशी निश्छिद्र न हुई। वास्तवमें वेणुको भगवान्ने अधरसुधा दी ही नहीं, केवल सम्पर्क होनेसे क्या होता है? प्रभुकृपासे वह जिसको मिले, उसपर ही प्रभाव होता है। उसी जलमें जोंक, उसीमें कमल, उसीमें मछली रहती है। अधिकारी, योग्य पात्र ही वस्तुको ग्रहण करता है, अर्थात् वेणुको वास्तवमें अधरसुधाका सम्प्रदान ही नहीं हुआ। वह केवल वेणुपात्रद्वारा व्रजांगनाओंको भेजी गयी। दर्वीसे रस चलाया जाय, परोसा जाय, परंतु दर्वीको रसास्वाद थोड़े ही आता है। वह तो रसोपभोगकी सामग्री है। वेणुपात्रद्वारा अधररस गोपांगनाओंको दिया गया, इसलिये कि गोपांगनाएँ सन्निहित नहीं थीं। वृन्दावनस्थ श्रीकृष्ण परमानन्दकन्दकी अधरसुधाका सम्भोग व्रजस्थिता व्रजांगनाओंको कैसे हो? अतः अधरसुधाको साधनभूत वेणुके छिद्रोंमें भरकर व्रजांगनाओंके हृदयमें पहुँचाया। वेणु दर्वीके समान होनेसे सूखी, सच्छिद्र ही रह गयी। यहाँ केवल श्रीप्रभुकी इच्छा ही कारण है, वेणु सबके लिये समान है। जैसे—स्वातिबिन्दु बाँसमें वंशलोचन, गोमें गोरोचन, शुक्तिमें मुक्ता, गजकर्णीमें गजमुक्ता होता है, वैसे ही अधरसुधा भिन्न-भिन्न पात्रोंमें पड़ती है, वेणु केवल उसको विभिन्न-विभिन्न पात्रोंमें पहुँचानेवाली हुई। यहाँ कई पक्ष हैं। यों तो जब श्रीव्रजांगना वेणुपर प्रसन्न हों, तब प्रशंसा ही करती हैं, 'याचेऽहं वंशदेहम्'। कहती थी—'सखि! हम तो वंशदेहकी याचना करती हैं। यदि विधाता हमारे ऊपर प्रसन्न हों तो हमें वंशदेह दें। गोपांगनादेहमें हमें कृतार्थता नहीं है। यदि वंशदेह होता तो सम्भव था कि कभी भगवान्के अधरपर सोती, अधरसुधाका आस्वादन करती, पर हम तो कुलांगना ठहरीं, हमें यह अवसर प्राप्त नहीं हो सकता।' जब गोपांगना वेणुसे ईर्ष्या करती, तब तो उसके दोष-ही-दोष कहती थी। अस्तु, यह आया कि षट्धर्मसहित रसरूप धर्मीको वेणुछिद्रोंद्वारा व्रजांगनाओंके हृदयमें पहुँचाना वेणुका कार्य था। 'ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः।' इत्यादि भगवान्में छः धर्म हैं। अर्थात् सम्पूर्ण षट्भगसम्पन्न, अचिन्त्य, अखण्ड, अनन्त, रसधर्मी, पूर्णतम, पुरुषोत्तम भगवान् हैं। वेणुमें सप्तछिद्र हैं। अतः षट्छिद्रोंद्वारा एक-एक भगधर्म एवं सातवें छिद्रद्वारा षट्धर्मसहित भगवान् अधरसुधाद्वारा वंशीमें प्रवेशकर, तद्द्वारा श्रीव्रजांगनाओंके हृदयमें प्रवेश करते हैं, ऐसा भावुकोंने कहा है। तीन तरहकी अधरसुधाएँ हैं और उसके सम्भोगाधिकारी भी तीन हैं। जिन्हें निरोध सम्पन्न हुआ, वे ही सुधाके अधिकारी हैं। निरोध यानी सम्पूर्ण विश्वविस्मरणपूर्वक श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दमें मनका लय होना। वह भी तीन प्रकारका है—प्रेमनिरोध, आसक्तिनिरोध और व्यसननिरोध। प्रेमनिरोध-सम्पन्नको देवभोग्या, आसक्ति- निरोध-सम्पन्नको भगवद्भोग्या और व्यसननिरोध- सम्पन्नको सर्वाभोग्या कहा गया है। ये सिद्धान्त श्रीवल्लभाचार्यजीने बताये हैं। यह देव कौन हैं? श्रीमद्भागवतके दशमस्कन्धमें निरोध, एकादश-स्कन्धमें मुक्ति और द्वादशस्कन्धमें मुक्ति-आश्रय ब्रह्म है। निरोध-वर्णन होनेसे दशम ही मुख्य है, क्योंकि श्रीकृष्णचन्द्रमें मनोलय होना ही सब कुछ है। इनके मतमें मुक्ति बड़ी विलक्षण है। कहते हैं—पूर्णतम पुरुषोत्तम परमानन्दमें जो मुक्त हुए जीव जाकर मिल जाते हैं, ऐसा जो मुक्तत्व उसकी मुक्ति मुक्ति है। परमपुरुषार्थ तो श्रीकृष्णचन्द्रका लीलारसास्वादन है। जो मुक्त हो गये, वे क्या लीलारसास्वादन कर सकते