भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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भाव कहे हैं। अथवा 'अधरा नीचीना (तुच्छा, अपकृष्टा) सुधा अपि यस्याः सकाशात् सा अधरसुधा,' श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दकी अधरसुधामें ऐसी मधुरिमा है, जिससे सुधा भी अति तुच्छ मालूम हो। अर्थात् देवताओंके, चन्द्रमाके और धन्वन्तरिके अमृतको अपकृष्ट बनानेवाली, यह जो अधरसुधा है, उससे भगवान् वंशीको पूरित करने लगे। वंशीमें सुमधुर अधरसुधा प्रविष्ट होती है, वह भी स्वयं अमूर्त है। छिद्रमें आकाश भरा है। अमूर्त पदार्थसे आकाश निश्छिद्र नहीं होता। अतः अमूर्त रससे वंशी निश्छिद्र न हुई। वास्तवमें वेणुको भगवान्ने अधरसुधा दी ही नहीं, केवल सम्पर्क होनेसे क्या होता है? प्रभुकृपासे वह जिसको मिले, उसपर ही प्रभाव होता है। उसी जलमें जोंक, उसीमें कमल, उसीमें मछली रहती है। अधिकारी, योग्य पात्र ही वस्तुको ग्रहण करता है, अर्थात् वेणुको वास्तवमें अधरसुधाका सम्प्रदान ही नहीं हुआ। वह केवल वेणुपात्रद्वारा व्रजांगनाओंको भेजी गयी। दर्वीसे रस चलाया जाय, परोसा जाय, परंतु दर्वीको रसास्वाद थोड़े ही आता है। वह तो रसोपभोगकी सामग्री है। वेणुपात्रद्वारा अधररस गोपांगनाओंको दिया गया, इसलिये कि गोपांगनाएँ सन्निहित नहीं थीं। वृन्दावनस्थ श्रीकृष्ण परमानन्दकन्दकी अधरसुधाका सम्भोग व्रजस्थिता व्रजांगनाओंको कैसे हो? अतः अधरसुधाको साधनभूत वेणुके छिद्रोंमें भरकर व्रजांगनाओंके हृदयमें पहुँचाया। वेणु दर्वीके समान होनेसे सूखी, सच्छिद्र ही रह गयी। यहाँ केवल श्रीप्रभुकी इच्छा ही कारण है, वेणु सबके लिये समान है। जैसे—स्वातिबिन्दु बाँसमें वंशलोचन, गोमें गोरोचन, शुक्तिमें मुक्ता, गजकर्णीमें गजमुक्ता होता है, वैसे ही अधरसुधा भिन्न-भिन्न पात्रोंमें पड़ती है, वेणु केवल उसको विभिन्न-विभिन्न पात्रोंमें पहुँचानेवाली हुई। यहाँ कई पक्ष हैं। यों तो जब श्रीव्रजांगना वेणुपर प्रसन्न हों, तब प्रशंसा ही करती हैं, 'याचेऽहं वंशदेहम्'। कहती थी—'सखि! हम तो वंशदेहकी याचना करती हैं। यदि विधाता हमारे ऊपर प्रसन्न हों तो हमें वंशदेह दें। गोपांगनादेहमें हमें कृतार्थता नहीं है। यदि वंशदेह होता तो सम्भव था कि कभी भगवान्के अधरपर सोती, अधरसुधाका आस्वादन करती, पर हम तो कुलांगना ठहरीं, हमें यह अवसर प्राप्त नहीं हो सकता।' जब गोपांगना वेणुसे ईर्ष्या करती, तब तो उसके दोष-ही-दोष कहती थी। अस्तु, यह आया कि षट्धर्मसहित रसरूप धर्मीको वेणुछिद्रोंद्वारा व्रजांगनाओंके हृदयमें पहुँचाना वेणुका कार्य था। 'ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः।' इत्यादि भगवान्में छः धर्म हैं। अर्थात् सम्पूर्ण षट्भगसम्पन्न, अचिन्त्य, अखण्ड, अनन्त, रसधर्मी, पूर्णतम, पुरुषोत्तम भगवान् हैं। वेणुमें सप्तछिद्र हैं। अतः षट्छिद्रोंद्वारा एक-एक भगधर्म एवं सातवें छिद्रद्वारा षट्धर्मसहित भगवान् अधरसुधाद्वारा वंशीमें प्रवेशकर, तद्द्वारा श्रीव्रजांगनाओंके हृदयमें प्रवेश करते हैं, ऐसा भावुकोंने कहा है। तीन तरहकी अधरसुधाएँ हैं और उसके सम्भोगाधिकारी भी तीन हैं। जिन्हें निरोध सम्पन्न हुआ, वे ही सुधाके अधिकारी हैं। निरोध यानी सम्पूर्ण विश्वविस्मरणपूर्वक श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दमें मनका लय होना। वह भी तीन प्रकारका है—प्रेमनिरोध, आसक्तिनिरोध और व्यसननिरोध। प्रेमनिरोध-सम्पन्नको देवभोग्या, आसक्ति- निरोध-सम्पन्नको भगवद्भोग्या और व्यसननिरोध- सम्पन्नको सर्वाभोग्या कहा गया है। ये सिद्धान्त श्रीवल्लभाचार्यजीने बताये हैं। यह देव कौन हैं? श्रीमद्भागवतके दशमस्कन्धमें निरोध, एकादश-स्कन्धमें मुक्ति और द्वादशस्कन्धमें मुक्ति-आश्रय ब्रह्म है। निरोध-वर्णन होनेसे दशम ही मुख्य है, क्योंकि श्रीकृष्णचन्द्रमें मनोलय होना ही सब कुछ है। इनके मतमें मुक्ति बड़ी विलक्षण है। कहते हैं—पूर्णतम पुरुषोत्तम परमानन्दमें जो मुक्त हुए जीव जाकर मिल जाते हैं, ऐसा जो मुक्तत्व उसकी मुक्ति मुक्ति है। परमपुरुषार्थ तो श्रीकृष्णचन्द्रका लीलारसास्वादन है। जो मुक्त हो गये, वे क्या लीलारसास्वादन कर सकते