भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 106, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ें९६ भक्तिसुधा है, भावुकका मन मधुकरके समान है, मधुकर जैसे अनेक पुष्पोंसे मधु लेता है, उसी तरह भावुक भगवान्की मूर्ति इन तत्त्वोंको लेकर बनाता है। भगवान्की भूषणमयी शोभा भगवान्के अद्भुत अलंकारसहित मूर्तिका वर्णन क्या किया जाय, कोटि सूर्योंके समान दिव्य रत्नोंसे जड़ित अद्भुत मोरपिच्छयुक्त मुकुट, देदीप्यमान कुण्डलोंकी झलक, सुगन्धित पुष्पोंकी माला, श्यामल कपोलपर सुन्दर कुण्डल। कपोलोंपर लटकती हुई श्यामल स्निग्ध सचिक्कण अद्भुत अलकावलीकी शोभा तो अवर्णनीय है, जैसे श्यामल नागोंके शिशु अमृतमय चन्द्रमाका रस लेनेके लिये गये हों, किंवा जैसे नीलकमलकोशपर भ्रमरवृन्द आकर रसास्वादनके लिये निश्चल निस्तब्ध विराजमान हों, अथवा सुन्दर टेढ़े-टेढ़े घुँघुराले अलकोंकी वह अलकावली ! स्निग्ध सचिक्कण श्यामल अमृतमय नीलाम्बुजपर पराग- लोभसे बैठे मानो भ्रमरवृन्द ही हैं। फिर गुंजारव क्यों नहीं ? कारण यह कि वह अद्भुत मादक मकरन्दपानकर उन्मत्त होकर चंचलतारहित होकर स्तब्ध हो गये, ऐसा मुखचन्द्र ! अग्र हाथीके बच्चेके शुण्डसदृश गोल सुडौल सुचिक्कण दीप्तिमय योग्य चढ़ाव-उतारके श्रीभुज हैं, दिव्य कुंकुम-मिश्रित हरिचन्दनसे विलिंपित भुजा है। भगवान्के श्रीअंगपर कुंकुममिश्रित हरिचन्दन इस तरह सुशोभित होते हैं, जैसे चन्द्रमाकी चन्द्रिकासे व्याप्त इन्द्रनीलमणि। अंगद-कंकणादि, हस्तांगुलिदलोंमें मुद्रिका, नखोंमें अरुणिमा ऐसे श्रीहस्तोंसे वेणुको उठाकर अधरपर रखकर अधरसुधापूरित कर रहे हैं। वेणुवादन रन्ध्रान् वेणोरधरसुधया पूरयन्— वेणुके छिद्रोंको अधरसुधासे पूरित करते हुए भगवान् वृन्दावनधाममें पधारे, मानो श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दकी रुचि है वेणुच्छिद्रोंको अधरसुधासे पूरित करनेकी। नटनागर नटवरवपु श्रीकृष्णकी रुचि भी नटखट, इसलिये कि लोग हमारे वेणुमें दूषण बतलाते हैं। छिद्रोंको दूषण कहते ही हैं—'छिद्रेष्वनर्था बहुलीभवन्ति' एक छिद्र कहीं हो तो अनर्थ होता है, यहाँ तो सात छिद्र हैं। इस सप्तछिद्रयुक्त वेणुको लोग निन्दित, कलंकित समझेंगे, इसलिये हम उसे अपनी सुमधुर अधरसुधासे पूरित कर दें। यानी परमानन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्रके श्रीहस्तारविन्दमें रहनेवाले, उनके अधरपर विराजमान वेणु सच्छिद्र रहे, यह ठीक नहीं, ऐसी भगवान्की रुचि है, इसीलिये 'रन्ध्रान् वेणोरधरसुधया पूरयन्' (श्रीमद्भा० १०।२१।५)—अधर-सुधाने सोचा अरे जड़ वेणु ! मैं अपने अद्भुत प्रभावसे तुझे सप्राण बना दूँ! बस, इस अभिप्रायसे सुमधुर अधरसुधाने वेणुको सप्राण बनाना चाहा और वह अधर-सुधाके संस्पर्शसे सप्राण होकर सुमधुर गीतका विस्तार करने लगी। अब अधरसुधाने सोचा कि वेणु तो जड़-की-जड़ ही रह गयी। अधरसुधाके परंप्रवीण सम्बन्धसे वृक्षोंसे मधुधारा बहने लगी, सरोवरसरसी, कमल-कमलिनी, कुमुद-कुमुदिनी रोमांचित हो गये, यमुना रुकी, पाषाण द्रवरूप हो गया, मगर वेणु सूखी-की-सूखी ही रही। वेणु सच्छिद्र है, पोली है, रसशून्य है, हृदयशून्य है, इसीलिये इसपर अधरसुधारसका प्रभाव न पड़ा। इसका प्रभाव सहृदयपर ही पड़ता है, अहृदयपर नहीं। कहते हैं—मलयाचलपर चन्दन वृक्षके सम्पर्कसे सम्पूर्ण वृक्ष चन्दन हो जाते हैं, मगर बाँस, बाँस ही रह जाता है। औरोंमें हृदय है, और सब पोले, हृदयशून्य सच्छिद्र नहीं हैं, बाँस हृदयशून्य निःसार है। कहते हैं—ग्रन्थि रहना अच्छा नहीं। एक चिज्जड़ ग्रन्थि न जाने कबकी है। यह ग्रन्थि मिटना कठिन है। कहते हैं—अमुक बड़े गठीले चित्तके हैं। बाँसमें तो गाँठ-ही-गाँठ है। एक छिद्र हो तो सहस्रों अनर्थ उत्पन्न होते हैं, यहाँ तो सात छिद्र हैं, अतः उसपर प्रभाव नहीं पड़ता। इसलिये अधरसुधाने यह सोचकर, वेणुछिद्रोंमें रस भरकर उसे सप्राण किया था, पर उस वेणुको छोड़कर वह व्रजांगनाओंके निरावरण कर्ण कुहरोंद्वारा वेणुगीतरूपमें उनके हृदयोंमें पहुँचा। यहीं उसने अपना सब विक्रम, सब माधुर्य व्यक्त किया। यहाँपर चक्रवर्तीने ऊपरके कुछ थोड़े