भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 105, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ेंयथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।' (गीता ४।११) ऐसे प्रभुके सिद्धान्त ही हैं। पूर्णतम पुरुषोत्तम श्यामसुन्दरको भी वृषभानुनन्दिनीके अतिरिक्त भूषण ही नहीं, जिन्हें भगवान् अपना भूषण बनायें। श्रीव्रजांगनाओंके तथा श्रीवृषभानुनन्दिनीके भूषण भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द तो भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके भी सब आभूषण श्रीवृषभानुनन्दिनी श्रीव्रजांगना ही हैं, श्रीप्रभुका अन्तरंगस्वरूप श्रीवृषभानु- नन्दिनी तथा श्रीवृषभानुनन्दिनीके अन्तरंगस्वरूप श्रीभगवान्। तभी कहा—'उभयोर्भयभावात्मा' जैसे भक्तमनोभावनामय भगवान्, वैसे भगवन्मनोभावनामय भक्त। भक्तके हृदय भगवान्, भगवान्के हृदय भक्त, इसी दृष्टिसे पीताम्बरसे आवृत हैं। जैसे अद्भुत अनन्त परमानन्द सुधा-सिन्धुमें मधुरिमा होती है, उसी रीतिसे श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द निखिलरसामृतसिन्धुमें माधुर्याधिष्ठात्री श्रीवृषभानुनन्दिनी और उनकी अंशभूता श्रीव्रजांगना। श्रीकृष्ण परमानन्दकन्द एक तरुणतमाल हैं, श्रीवृषभानुनन्दिनी सुवर्णलता हैं, जैसे सुवर्णवर्णा लतासे परिवेष्टित तरुणतमाल सुशोभित हो, वैसे श्रीवृषभानुनन्दिनीसे परमानन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्र। दोनोंका अद्भुत अविघटित सुस्थिर सम्बन्ध है। भगवान्के श्रीकण्ठमें वैजयन्ती- मालाकी शोभा भगवान्के श्रीकण्ठमें वैजयन्ती। 'वै निश्चयेन जयन्ती जयशालिनी', मानो कन्दर्पने जिस धनुषसे निखिल विश्वको विजय किया और उसने उसे छोड़ दिया, वही है यह वैजयन्ती माला। श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके नखमणिमय चन्द्रिकाके दर्शनसे कन्दर्प मूर्च्छित हुआ, अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायक कन्दर्प- दर्पदलनपटु भगवान्के गलेकी यह पंचवर्णपुष्पग्रथित अम्लान पुष्पमाला अद्भुत सौगन्ध्यसे युक्त है। श्रीभगवान्के पास तीन शक्तियाँ हैं—उद्बोधक, आच्छादक, विक्षेपक। कानोंके कर्णिकार उद्बोधक, पीताम्बर आच्छादक है, ब्रह्मस्वरूपोपलब्धिमें वह विघ्न है, परंतु रसज्ञोंके लिये रस भी है और ततोऽप्यधिक विक्षेपक वैजयन्ती, व्रजांगना उद्विग्न हो जाती है। वह समझती है, हमारे श्यामसुन्दरके ये सब आवरण हैं, क्योंकि रसास्वादनपरायण रसिक निर्विघ्न निरुपद्रव निरावरण रसास्वादन चाहता है, क्या उनको पीताम्बरका व्यवधान, वैजयन्तीका व्यवधान सह्य होगा ? जहाँ हार-कंचुकका भी व्यवधान असह्य वहाँ पीताम्बरका, वैजयन्तीका व्यवधान कैसे सह्य होगा ? ऐसा है श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दका अद्भुत दिव्य स्वरूप। इन सबसे दुर्लभता सूचित है, दुर्लभतामें ही रस है। चकारात् वनमाला भी, श्रीकण्ठसे मधुर मनोहर पादारविन्दतक। इन सबसे श्रीअंग आवृत हैं, जैसे ज्योतिर्मय जलदावृत नभोमण्डल आच्छादित हो जाता, वैसे श्यामल, महोमय, आनन्दरसमय वपु अनेक आवरणोंसे आवृत हो अस्पष्ट ज्योति हो गया, उस पीताम्बरके माध्यमसे श्रीअंगकी देदीप्यमान श्यामलता चमकती है। जैसे विद्युत्से आवृत होनेपर भी इन्द्रनीलमणि पर्वतकी श्यामलता चमकती है, वैसे ही 'सो जानइ सपनेहुँ जेहिं देखा।।' (रा०च०मा० १।१९९।१२) जिनको स्वप्नमें भी एक बिन्दुमात्र भी आस्वादन करनेको मिला, वे ही जान सकते हैं। आपके सर्व अलंकारोंकी झलक जिसके मनमें आयी, वह सदाके लिये बिक गया। श्यामलता कैसी ? 'कृष्णवर्णं त्विषाकृष्णम्' (श्रीमद्भा० ११।५।३२) श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्द-कन्दका वपु है तो अतसीपुष्प- सदृश, नीलाम्बुज, नील नीरधरके समान तब भी वह 'त्विषाकृष्णम्' एक अद्भुत दीप्तिमें छिपा है। अतएव श्यामल महोमय कहा जाता है। तेज दो प्रकारके एक श्याम तेज, एक गौर तेज, श्याम तेज भगवान् श्रीकृष्ण