भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 104

९४ भक्तिसुधा वेधा द्वेधा भ्रमं चक्रे कान्तासु कनकेषु च। तासु तेष्वप्यनासक्तः साक्षाद् भर्गो नराकृतिः ॥ ऐसे आवरणसे अपने श्रीअंगको आवृतकर भगवान् श्रीवृन्दारण्यधाममें पधारे। अर्थात् जो भगवान्‌को देखना चाहते हैं, उनके सामने प्रथम मायाकी चमक- दमक आती है, अगर उसे उल्लंघन किया तो ठीक, केवल कनकके समान ही नहीं, अपितु अग्नितप्त सुवर्णसदृश देदीप्यमान चमकीले पीतवर्णवाले पीताम्बरसे अपने श्रीअंगको आवृत किया। पीताम्बरकी चमक कई तरहकी होती है, कोई कहते हैं सुवर्णवर्ण, कोई दिव्य-दीप्तिमान् विद्युत्के सदृश, कोई कदम्ब-किंजल्क- सदृश, कोई रविकरसदृश, यहाँ तो बिजलीसे भी शतगुणित सहस्रगुणित देदीप्यमान पीताम्बर है, वह प्रभुके श्रीअंगको विलक्षण शोभा देता है, जैसे इन्द्रनीलमणिके पर्वतपर दामिनी दमके, वैसे श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके महेन्द्र-नीलमणिको लज्जित करनेवाले स्वरूपपर पीताम्बर दामिनीके समान दमक रहा है। अद्भुत शोभा दे रहा है, किंवा जिस रीतिसे सजल नीलाम्बुदपर—मेघश्यामपर दामिनी दमकती है, वैसे प्रभुके श्रीअंगपर पीताम्बर देदीप्यमान होता है, उसमें भी यह सजल नीलजलद जल देनेवाला है, श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द तो आनन्दरस—अनुरागरसवर्षी हैं, प्रेमानन्दमयरसवर्षी हैं, यह कोई अद्भुत सुधामय जलद है, अतएव अद्भुत दामिनीके दमकको लज्जित करनेवाले पीताम्बरसे आवृत है, श्यामल जलद जलमय ही होता है, यहाँ भी श्रीकृष्णचन्द्र उद्‌बुद्ध उभयविध शृंगाररसस्वरूप ही हैं, शृंगाररसके अधिष्ठात्री देवता विष्णु श्याम और शृंगाररस स्वरूपवर्णनमें उस रसका वर्ण भी श्याम ही कहा है एवं प्रकारसे पीताम्बर प्रभुके श्रीअंगपर अद्भुत छवि दे रहा है। भावुक कहते हैं यह माया है, पर यह प्राकृत माया नहीं, अपितु यह एवंगुणविशिष्ट पीताम्बर श्रीवृषभानुनन्दिनी ही हैं, किं बहुना—श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके श्रीअंगपर यावान् भूषण हैं, सब श्रीवृषभानुनन्दिनी ही हैं, इसी प्रकार श्रीवृषभानुनन्दिनीके श्रीअंगपर जो भूषण हैं, वह सब श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द ही हैं। श्रवसोः कुवलयमक्ष्णोरञ्जनमुरसो महेन्द्रमणिदाम । वृन्दावनतरुणीनां मण्डनमखिलं हरिर्जयति ॥ वृषभानुनन्दिनीके तथा व्रजांगनाओंके कानोंमें जो कमलके फूल हैं, वे रात्रिविकासी स्थलोद्भव कमलविशेष कुवलय होते हैं, वह श्रीकृष्ण अर्थात् उनके श्रोत्रभूषण भगवान् श्रीकृष्ण। वे अपनी आँखोंमें जो अंजन लगाती हैं, वह क्या प्राकृत अंजन है? नहीं! वह श्यामसुन्दर व्रजेन्द्रनन्दन ही अंजन होकर उनके नयनोंमें विराजमान हैं, काष्ठपाषाणमय भूषण उनके नहीं। ईदृशा पुरुषभूषणेन या भूषयन्ति हृदयं न सुभ्रुवः । धिक् तदीयकुलशीलयौवनं धिक् तदीयगुणरूपसम्पदः ॥ ऐसे पुरुषभूषणसे जो सुभ्रू अपने हृदयको नहीं भूषित करती; उनके कुल, शील, यौवन और गुणरूप सम्पत्तिको धिक्कार है। श्यामसुन्दर पुरुषभूषण, पूर्णतम पुरुषोत्तम श्रीकृष्णचन्द्रसे जिन्होंने अपनेको भूषित नहीं किया, वह अपनेको कंकड़-पत्थरोंसे भूषित करे। श्रीकृष्णचन्द्रके पादपंकजपरागको ही अंजन- रूपसे लगाती हैं, उनके हृदयमें महेन्द्रनीलमणिकी माला भी श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्द ही हैं, संसारकी अन्य युवती भले ही कंकड़-पत्थरोंसे अपनेको भूषित करें, पर वृन्दावनतरुणियोंका मण्डन तो एक श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द ही हैं। वैसे श्रीकृष्ण परमानन्दकन्द मनमोहन मदनमोहन श्यामसुन्दर भगवान् उनके हृदयमें हैं ही, पर बाहर भी वही, हृदयके बाहर-भीतर एक ही हो। श्रीव्रजांगनाओंके, श्रीवृषभानुनन्दिनीके अन्तरात्मा, अन्तःकरण, प्राण, इन्द्रियाँ, रोम-रोम सबमें, उपरिष्टात् अधस्तात् सर्वतः श्रीकृष्ण-ही- श्रीकृष्ण। श्रीवृषभानुनन्दिनीके श्रीअंगपर जो नील साड़ी, नील अद्भुत दिव्य निचोल, इन्द्रनील चूड़ी, हृदय विलिंपित मृगमद कस्तूरिका सब भगवान्-ही- भगवान्। सबका वर्णन कहाँतक किया जाय, अतः संक्षेपमें बताया कि 'मण्डनमखिलं हरिर्जयति', 'ये